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FTA की डगर नहीं आसान! नीलेश शाह बोले: भारत-ईयू करार को जमीन पर उतरने में लगेगा वक्त

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शाह ने कहा कि फिलहाल उम्मीदों को वास्तविकता के धरातल पर रखना चाहिए। किसी भी भारत-ईयू व्यापार समझौते को यूरोपीय संघ के सभी 28 सदस्य देशों की मंजूरी जरूरी होगी।

Last Updated- January 28, 2026 | 3:08 AM IST
Nilesh Shah, Kotak AMC
कोटक महिंद्रा एएमसी के प्रबंध निदेशक नीलेश शाह | फाइल फोटो

बाजारों के लिए यह सप्ताह काफी व्यस्त रहने वाला है। उन्हें बजट प्रस्तावों, भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) और देश में कॉरपोरेट आय सीजन के बीच बदलती भूराजनीतिक स्थिति जैसी अनिश्चितताओं से दो-चार होना है। कोटक महिंद्रा एएमसी के प्रबंध निदेशक नीलेश शाह ने पुनीत वाधवा को टेलीफोन इंटरव्यू में बताया कि अब भारतीय बाजारों की मूल्यांकन रेटिंग में बड़ा बदलाव मुश्किल लग रहा है। बातचीत के अंश:

बाजारों के लिए भारत-यूरोपीय संघ करार कितना जरूरी है?

फिलहाल उम्मीदों को वास्तविकता के धरातल पर रखना चाहिए। किसी भी भारत-ईयू व्यापार समझौते को यूरोपीय संघ के सभी 28 सदस्य देशों की मंजूरी जरूरी होगी। यह एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है। इसमें ही छह से बारह महीने लग सकते हैं। इसलिए, अगर कोई समझौता होता भी है, तो उसे तुरंत लागू नहीं किया जाएगा। लागू होने में समय लगेगा। 

बाजार के नजरिये से समझौते की घोषणा खुद उतनी जरूरी नहीं है जितनी उसकी बारीकियां। अभी, दोनों तरफ से बहुत सारे संकेत दिए जा रहे हैं, मोटे तौर पर यह बताने के लिए कि वैकल्पिक व्यापार भागीदारी बनी हुई है। लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या यह समझौता आखिरकार सच में एक संतुलित और दोनों के लिए फायदेमंद करार में बदल पाएगा।

उदाहरण के लिए, ईयू के नजरिए से, भारत या बांग्लादेश से कपड़े खरीदने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता। वैसे, ईयू के पास बांग्लादेश को निर्यात करने की बहुत कम संभावना है, जबकि भारत एक बड़ा और उभरता उपभोक्ता बाजार है। अगर इस समझौते से भारतीय निर्यात, जैसे कपड़ों, के लिए बेहतर पहुंच सुनिश्चित होती है और साथ ही भारतीय बाजार को भी सतर्कता के साथ खोला जाता है, तो यह ज्यादा मजबूत आर्थिक रिश्ता बना सकता है। इस तरह के लेनदेन से दोनों पक्ष ज्यादा मजबूत स्थिति में होंगे।

क्या इससे भारत-अमेरिका व्यापार करार के और लटक जाने से जुड़ी बजार की चिंताएं बढ़ जाएंगी?

सचमुच नहीं। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में देरी को बाजार पहले ही मान चुका है। निवेशक अब केवल समय-सीमाओं पर प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं। एक बार फिर से मुख्य निर्णायक कारक समझौते की गुणवत्ता होगी।

यदि कोई ऐसा समझौता होता है जिसे भारत के लिए प्रतिकूल माना जाता है, तो बाजार सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं देंगे, भले ही इसे कितना भी जल्द पूरा किया जाए। दूसरी ओर, भले ही समझौते में तीन महीने की और देरी हो जाए, लेकिन अंतिम परिणाम स्पष्ट रूप से भारत के लिए फायदेमंद हों, तो बाजार इसे सकारात्मक रूप से देखेंगे। इस लिहाज से, इसे लागू करने की रफ्तार से कहीं अधिक महत्त्व करार का है।

क्या आने वाले महीनों में बाजारों के सीमित दायरे में रहने की संभावना है?

इस समय, अधिकांश नकारात्मक खबरों का बाजार में पहले ही असर देखा जा चुका है। अब बाजार के मूल्यांकन में बड़ा सुधार मुश्किल लगता है। आय में वृद्धि बाजार रिटर्न का प्राथमिक चालक होगी।

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First Published - January 27, 2026 | 10:21 PM IST

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