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ट्रंप का टैरेफ तूफान: पूरी दुनिया को झकझोरने वाली रणनीति

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ट्रंप के पल-पल बदलते मिजाज एवं अजीबोगरीब मांगों से दुनिया में रणनीतियां बनेंगी और बिगड़ेंगी तथा अनिश्चितता जारी रहेगी। बता रहे हैं देवाशिष बसु

Last Updated- April 09, 2025 | 11:22 PM IST
India's own strategy in view of the possibility of US-China trade war अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध की आशंका को देखते हुए भारत की अपनी रणनीति

अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अप्रैल के आरंभ में उन देशों एवं समूहों पर भारी भरकम शुल्क लगा कर पूरी दुनिया में खलबली मचा दी, जो अमेरिका से आयात कम करते हैं और उसे निर्यात ज्यादा करते हैं। इनमें चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) शामिल हैं। ट्रंप का यह कदम उलझन में डालने वाला है और इसके नतीजे भी अबूझ हैं।

महीने भर पहले मैंने कहा था, ‘अगर कुछ बदलता नहीं है तो ट्रंप बहुत बड़ा खतरा हैं, जो पूरी तरह समझ भी नहीं आ रहे हैं।’ मैंने तो मध्य नवंबर में ही लिख दिया था, ‘यह मान लेना आत्मघाती होगा कि ट्रंप अपने वादों से पीछे हट जाएंगे और अगर उन्होंने अपने कुछ वादे भी पूरे कर दिए तो पूरी दुनिया में तूफान आ जाएगा।’ जिसका डर था वह हो गया है। अर्थशास्त्री, नीति निर्धारक और कारोबार खतरनाक एवं अनिश्चित भविष्य के लिए तैयार तो हो रहे हैं मगर पहले वे ट्रंप की सनक को समझने की कोशिश कर रहे हैं। आखिर ट्रंप चाहते क्या हैं? देखते हैं कि ट्रंप के समर्थक क्या बता रहे हैं।

1. यील्ड नीचे रखनाः अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चिंता उस पर चढ़ा 36 लाख करोड़ डॉलर कर्ज है, जिसमें से 9.2 लाख करोड़ डॉलर उसे नया कर्ज लेकर 2025 में ही चुकाने होंगे। इसका फौरी तरीका यील्ड कम रखना है, जिससे सरकार को ब्याज कम चुकाना होगा। जब महंगाई नीचे नहीं आ रही है तो ट्रंप यील्ड कम कैसे करेंगे या अमेरिकी बॉन्ड की खरीदारी कैसे बढ़ाएंगे? इसके लिए शुल्क बढ़ाने होंगे, जिससे अनिश्चितता बढ़ जाएगी। शुल्क बहुत अधिक हो जाएं तो घबराहट बढ़ जाती है और जोखिम से बचने के लिए निवेशक शेयर बेचकर अमेरिकी बॉन्ड खरीदने लगते हैं। इस तरह यील्ड नीचे आ जाती है। इसके साथ फेडरल रिजर्व ब्याज दर घटा दे तो सोने पर सुहागा ही हो जाए। इसीलिए ट्रंप शुक्रवार को फेड के संवाददाता सम्मेलन के दौरान उसके चेयरमैन जेरोम पावेल पर दरें घटाने का दबाव डाल रहे थे।

2. घाटे में कमी: यील्ड नीचे आने से कर्ज घटाने में कोई मदद नहीं मिलती। इसीलिए ट्रंप का दूसरा पत्ता होगा अमेरिकी बजट से ‘बेजा खर्च और फर्जीवाड़ा’ खत्म कर घाटा कम करना। यह काम ईलॉन मस्क की अगुआई वाले सरकारी दक्षता विभाग (डोज) को सौंप दिया गया है। डोज 6.75 लाख करोड़ डॉलर के अमेरिकी बजट में 2 लाख करोड़ डॉलर की कटौती करना चाहता है।

3. शुल्क से कमाई: ट्रंप की रणनीति का तीसरा पहलू राजस्व जुटाना है, जिसका तरीका उनके लिए शुल्क के अलावा कुछ नहीं है। ट्रंप गुट का कहना है कि शुल्कों से सालाना 600-700 अरब डॉलर जुटाए जा सकते हैं।

4. भू-राजनीतिः तीसरा मकसद यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देशों को अमेरिकी व्यापार तथा निवेश के लिए फायदेमंद शर्तों पर बात के लिए मजबूर करना है क्योंकि ये देश सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर रहते हैं। ट्रंप की टीम ने इसी वजह से सबसे पहले इन्हें निशाने पर लिया है।

5. अमेरिका में विनिर्माण: इस रणनीति का आखिरी दांव है निर्यातकों को अमेरिका में उत्पादन के लिए मजबूर करना। अभी यह तो नहीं पता कि इससे कितना निवेश आएगा और कितना रोजगार मिलेगा मगर अभी तक ताइवान सेमीकंडक्टर, ह्युंडै मोटर्स, एनवीडिया और ऐपल जैसी कुछ कंपनियों ने ही इसका वादा किया है।

दांव काम नहीं आए तो? अगर इसे सोची समझी रणनीति मान लें तो भी यह आंख पर पट्टी बांधकर रस्सी पर चलने जैसी जोखिम भरी है। पहली बात, शुल्क फौरन लागू हो रहे हैं और इतने ज्यादा हैं कि उनसे बढ़ी लागत महंगे उत्पादों की शक्ल में अमेरिकी उपभोक्ताओं और व्यापार को परेशान करेंगे। इससे महंगाई बढ़ सकती है और रोजगार घट सकता है। महंगाई बढ़ी तो फेडरल रिजर्व ब्याज दर बढ़ा सकता है, जिससे यील्ड कम रखने की योजना नाकाम हो जाएगी।

मंदी आई तो फेड ब्याज दरें कम कर सकता है मगर उससे नौकरियां जाएंगी और कर राजस्व भी घटेगा। ऐसे में डोज का बचत का लक्ष्य अधूरा रह सकता है और अमेरिका के भीतर उथलपुथल मच सकती है। एक ही समय व्यापार समझौते करना, शुल्क थोपना, रोजगार बढ़ाना और विनिर्माण अमेरिका में लाना ट्रंप के वश में नहीं है। व्यापार सौदे हो गए तो विनिर्माण बढ़ाने की जरूरत नहीं रह जाएगी। विनिर्माण बढ़ाने में की साल लग जाएंगे।

एल्कोआ को चेयरमैन कह ही चुके हैं कि कंपनी बड़ा निवेश 30-40 सालों को ध्यान में रखकर करती है कुछ महीनों या साल के लिए नहीं। जब राष्ट्रपति का कार्यकाल ही केवल चार साल का होता है तो कोई भी कंपनी उनके कहने पर अमेरिका में इतना लंबा निवेश क्यों करेगी?

सबसे बड़ी समस्या यह मान लेना है कि ट्रंप मनमानी करते रहेंगे और सब कुछ उनके हिसाब से बदलता जाएगा। ऐसा नहीं होगा। चीन इतना ताकतवर है कि शुल्कों से मिली तकलीफ झेल सकता है मगर दुनिया के ज्यादातर लोकतांत्रिक देश ऐसा नहीं कर सकते। चीन ने अमेरिका से आयात पर शुल्क 34 प्रतिशत बढ़ा दिया है और कई अमेरिकी कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग के लिए जरूरी दुर्लभ खनिजों को निर्यात भी उसने रोक दिया है।

दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा अमेरिकी बॉन्ड चीन के पास हैं, जिन्हें बेचकर वह यील्ड बढ़ा सकता है। पीपल्स बैंक ऑफ चाइना ने कहा है कि डिजिटल सीमा पार निपटान प्रणाली 10 आसियान देशों और पश्चिम एशिया के 6 देशों से पूरी तरह जुड़ी रहेगी। इसका मतलब है कि दुनिया में हो रहे कुल व्यापार का 38 प्रतिशत हिस्सा अमेरिकी डॉलर के दबदबे वाली स्विफ्ट प्रणाली को ठेंगा दिखा देगा। खबरों के अनुसार स्विफ्ट तीन से पांच दिन में सीमा पार भुगतान पूरा कर देती है। मगर चीन की भुगतान प्रणाली 7 सेकंड में यानी पलक झपकते ही यह काम कर देती है। इससे दुनिया भर के देश डॉलर में भुगतान करना बंद कर सकते हैं।

मगर ये सौदे बेढंगे होंगे, लंबी बातचीत के बाद होंगे और मनमानी शर्तों पर होंगे। जब दुनिया को सौदों पर हो रही बातचीत की खबर ट्रंप के सोशल मीडिया हैंडल से फौरन मिलने लगेगी तो जैसे-जैसे उनकी मांगें बदलेंगी देशों को रणनीति भी बदलनी पड़ेंगी। अपनी बात को वजह देने के लिए ट्रंप झूठ बोलने से भी नहीं हिचकेंगे। इसका नतीजा ऊंचे शुल्क ही हो सकते हैं जो अभी लगे शुल्कों से कम होंगे मगर उनके साथ आर्थिक सुस्ती भी आएगी। इससे दुनिया भर में मंदी आएगी, अमेरिका में कर राजस्व कम हो जाएगा, नए व्यापार गठबंधन चीन के इर्दगिर्द होंगे और अनिश्चितता बनी रहेगी। कोविड के बाद से दुनिया की वृद्धि और स्थिरता पर ऐसा गंभीर खतरा नहीं मंडराया है। कारोबार और अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़े शेयर बाजारों में में भी बार-बार जबरदस्त उतार-चढ़ाव आएगा। तो कमर कसकर बैठिए।

(लेखक मनीलाइफडॉटइन के संपादक और मनीलाइफफाउंडेशन में ट्रस्टी हैं)

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First Published - April 9, 2025 | 11:22 PM IST

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