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मुद्रा ऋण से जुड़ी कल्पना और उसकी वास्तविकता

Last Updated- December 12, 2022 | 2:16 AM IST

भारतीय महिला बैंक लिमिटेड एक ऐसी पहल है जिस पर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार को गर्व नहीं होगा। छह वर्ष पुरानी मुद्रा योजना को लेकर ऐसी ही भावना भारतीय जनता पार्टी के मन में आ सकती है। भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) के पूर्ण स्वामित्व वाली इस अनुषंगी की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अप्रैल 2015 में की थी।
इसका लक्ष्य है छोटे उपक्रमों का विकास करने के लिए सूक्ष्म वित्त संस्थानों, बैंकों और सूक्ष्म इकाइयों को ऋण देने वाले अन्य संस्थानों को वित्तीय तथा अन्य सहायता मुहैया कराना।
ऐसे ऋण के लिए एक और योजना है: प्रधान मंत्री मुद्रा योजना (पीएमएमवाई)। पीएमएमवाई ऋण के तीन प्रकार हैं- शिशु (50,000 रुपये तक), किशोर (50,001 से 500,000 रुपये) और तरुण (500,001 से 1000,000 रुपये तक)। ये ऋण आय उत्पादन से जुड़े गैर कृषि क्षेत्र को दिए जाते हैं जिनमें डेरी और पोल्ट्री शामिल हैं। ऐसे ऋण को मुद्रा के जरिये वित्त पोषित करने की आवश्यकता नहीं है। बैंकों या गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) द्वारा दिए जाने वाले हर ऋण को मुद्रा ऋण कहा जा सकता है। मार्च 2016 में समाप्त पहले वर्ष में करीब 3.49 करोड़ मुद्रा खाते खोले गए और बकाया ऋण का पोर्टफोलियो 1.09 लाख करोड़ रुपये रहा। शिशु श्रेणी के 3.24 करोड़ खातों में 46,811 करोड़ रुपये कर्ज दिया गया। किशोर में 20.7 लाख खातों में 36,612 करोड़ रुपये और तरुण में 4.1 लाख खातों में 25,860 करोड़ रुपये का ऋण दिया गया।
रिजर्व बैंक के 2015 के 200,000 रुपये तक के छोटे ऋण के आंकड़ों के अनुसार करीब 3.5 करोड़ कर्जदार थे और बैंकों तथा सूक्ष्म वित्त संस्थानों (एमएफआई) पर 79,209 करोड़ रुपये की राशि बकाया थी। एक वर्ष बाद पीएमएमवाई का 500,000 रुपये से कम का ऋण (शिशु एवं किशोर श्रेणी) 83,424 करोड़ रुपये था जो 3.51 करोड़ खातों में वितरित था। यदि 80 फीसदी किशोर ऋण 200,000 रुपये तक का था तो 3.40 करोड़ ग्राहकों पर 76,101 करोड़ रुपये की राशि बकाया थी। यानी अगर सभी सूक्ष्म ऋण को मुद्रा ऋण करार दिया जाए तो भी 200,000 रुपये तक के कम ऋण का स्तर 2016 में पिछले वर्ष से कम हो गया। तब से वृद्धि असमान रही है। 2016 के 3.49 करोड़ खातों और 1.09 लाख करोड़ रुपये ऋण से बढ़कर 2017 में आंकड़ा 3.97 करोड़ खातों और 1.38 लाख करोड़ रुपये ऋण तक पहुंचा। 2018 में यह बढ़कर क्रमश: 4.81 करोड़ खातों और 2.02 लाख करोड़ रुपये ऋण तक पहुंचा।
यह सिलसिला 2019 में भी जारी रहा लेकिन 2020 में ऋण 3 फीसदी से भी कम बढ़कर 2.67 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा। कोविड प्रभावित 2021 में ऋण खातों और ऋण वितरण दोनों में भारी कमी आई। वित्त वर्ष की बकाया ऋण राशि सार्वजनिक नहीं है लेकिन वितरण बताता है कि यह 6 फीसदी घटकर 3.11 लाख करोड़ रुपये रह गया है।
सरकारी बैंकों का 4.92 फीसदी फंसा कर्ज मुद्रा खातों में है और वे उत्साहित नहीं हैं क्योंकि सरकारी योजना के कारण कर्जदारों में डिफॉल्ट की प्रवृत्ति है। यह बात एमएफआई पर भी लागू है। 2020 में 1.96 करोड़ एमएफआई ऋण खातों की 57,865 करोड़ रुपये की राशि मुद्रा में वर्गीकृत की गई। एमएफआई का कहना है कि उन्हें शायद ही मुद्रा से कोई फंड मिलता है फिर इन्हें मुद्रा ऋण क्यों कहा जा रहा है? सिडबी ने मुद्रा की शुरुआत एनबीएफसी के रूप में की थी जिसे नाबार्ड और राष्ट्रीय आवास बैंक के तर्ज पर विकास वित्त संस्थान और पुनर्वित्तीकरण एजेंसी बनाने का विचार था लेकिन ऐसा नहीं हो सका। जनवरी 2016 तक सरकार ने इसे एनबीएफसी के बजाय बैंक बनाने का निर्णय लिया लेकिन आरबीआई ने नकार दिया क्योंकि एनबीएफसी बिना लाइसेंस के बैंक नहीं बन सकती।
पुनर्वित्तीकरण एजेंसी के रूप में मुद्रा का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं है। 2016 में 3,337 करोड़ रुपये के पुनर्वित्तीकरण में एमएफआई की हिस्सेदारी 18.5 फीसदी थी। 2017 में यह बढ़कर 22 फीसदी हुई लेकिन अगले दो वर्ष में 5 फीसदी गिरावट के बाद 2020 में दोबारा बढ़कर 23.3 फीसदी पहुंची और मुद्रा पुनर्वित्तीकरण 4,000 करोड़ रुपये रहा। सन 2020 में पांच वर्ष में उसने 25,494.65 करोड़ रुपये की राशि वितरित की जिसमें से 3,018.5 करोड़ रुपये यानी 11.84 फीसदी राशि एमएफआई को गई। इस अवधि में मुद्रा का पुनर्वित्तीकरण पीएमएमवाई के सभी कर्जदाताओं द्वारा वितरित ऋण का 2.13 फीसदी थी।
आरबीआई ने 2019 में एक निगरानी में पाया कि प्राइऑॅरिटी सेक्टर शॉर्टफाल फंड (पीएसएसएफ) के तहत मुद्रा को उसकी शुरुआत के बाद से 40,000 करोड़ रुपये की राशि दी गई लेकिन केवल 22,500 करोड़ रुपये की राशि निकाली गई। सन 2021 तक पीएसएसएफ से निकाली गई राशि घटकर 20,084 करोड़ रुपये रह गई। महामारी के वर्ष में जब आरबीआई और सरकार आर्थिक गतिविधियों के लिए हालात सहज बनाने में लगे हुए थे तब जमीनी हकीकतों से बेखबर मुद्रा के पास पैसों का भारी भंडार था जिसकी मदद से एमएफआई, एनबीएफसी और अन्य संस्थानों की मदद की जा सकती थी। बैंकों को अपना 40 फीसदी ऋण छोटे और मझोले उपक्रमों, कृषि और प्राथमिकता वाले अन्य क्षेत्रों को देना होता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति से बची जो राशि नाबार्ड और सिडबी को दी जाती थी वह मुद्रा को दी जाती है। सिडबी ने अपनी शाखा सिडबी फाउंडेशन फॉर माइक्रो क्रेडिट (एसएफएमसी) को 2019 में भंग कर दिया और 271 करोड़ रुपये की राशि माइक्रोफाइनैंस इक्विटी फंड (आईएमईएफ) से मुद्रा को हस्तांतरित कर दी गई। फाउंडेशन की शुरुआत 1999 में सूक्ष्म वित्त क्षेत्र के विकास के लिए की गई थी। मुझे नहीं लगता मुद्रा ने किसी एमएफआई की सहायता की है।
कह सकते हैं कि मुद्रा एक ऐसी एजेंसी है जो पीएसएसएफ के जरिये सूक्ष्म कर्जदाताओं को वित्तीय मदद देती है। यानी वही काम जो सिडबी और नाबार्ड करते हैं। वास्तव में क्या हमें एक और पुनर्वित्तीकरण एजेंसी की आवश्यकता है? इसके न रहने पर किसी को दुख नहीं होगा।

First Published - July 30, 2021 | 11:41 PM IST

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