कभी आपने अपनी क्रेडिट रिपोर्ट खोली और वहां SMA लिखा देखा होगा तो मन में यही ख्याल आया होगा कि ये अब क्या नया झंझट है। दरअसल, SMA कोई पेनल्टी नहीं, बल्कि बैंक की तरफ से दिया गया एक ‘अर्ली वार्निंग सिग्नल’ है। जैसे मोबाइल की बैटरी लो होने पर नोटिफिकेशन आता है, वैसे ही जब आपकी EMI या क्रेडिट कार्ड का बिल समय पर नहीं जाता, तो बैंक अलर्ट हो जाते हैं।
आज के दौर में, जब एक-दो दिन की देरी भी रिकॉर्ड हो जाती है और क्रेडिट स्कोर आपकी फाइनेंशियल पहचान बन चुका है, तब SMA को समझना बहुत जरूरी हो गया है। RBI के नए नियमों के बाद तो क्रेडिट रिपोर्ट और भी तेजी से अपडेट हो रही है, यानी गलती भी जल्दी दिखेगी और सुधार भी।
SMA कोई NPA नहीं है, लेकिन वहां पहुंचने से पहले का आखिरी इशारा जरूर है। अगर इसे वक्त रहते संभाल लिया, तो लोन, क्रेडिट कार्ड और कम ब्याज वाले ऑफर आपके हाथ में रह सकते हैं। यही वजह है कि SMA को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है।
SMA का फुल फॉर्म ‘स्पेशल मेंशन अकाउंट’ है। ये बैंक या NBFC के लिए एक तरीका है कि वो उन अकाउंट्स को पहचानें जहां पेमेंट में थोड़ी-बहुत दिक्कत आ रही है, लेकिन अभी पूरी तरह खराब नहीं हुआ। जैसे, अगर आपका लोन EMI या क्रेडिट कार्ड का मिनिमम अमाउंट 90 दिन तक लेट हो जाता है, तो ये SMA के रूप में क्रेडिट रिपोर्ट में नजर आता है। बैंक इसे तीन कैटेगरी में बांटते हैं: SMA-0, SMA-1 और SMA-2। ये RBI के गाइडलाइंस के मुताबिक है, जो लोन की स्ट्रेस को ट्रैक करने के लिए बने हैं।
SMA-0 तब आता है जब पेमेंट 1 से 30 दिन लेट हो। ये शुरुआती स्टेज है, जहां बैंक सोचते हैं कि शायद कोई छोटी समस्या है, जैसे कैश फ्लो इश्यू। फिर SMA-1 में ये 31 से 60 दिन तक जाता है, मतलब दिक्कत बढ़ रही है। और SMA-2 सबसे सीरियस, 61 से 90 दिन लेट, जहां NPA बनने का खतरा सबसे ज्यादा होता है। क्रेडिट रिपोर्ट में ये Days Past Due (DPD) के साथ दिखता है, जो CRIF हाई मार्क या CIBIL जैसे क्रेडिट इंफॉर्मेशन कंपनीज अपडेट करती हैं। अगर आपकी रिपोर्ट में SMA दिखा, तो नए लोन या क्रेडिट कार्ड मिलना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि लेंडर इसे रिस्क के तौर पर देखते हैं।
RBI ने सितंबर 2025 में एक ड्राफ्ट जारी किया था, जिसमें क्रेडिट स्कोर को हफ्ते में अपडेट करने की बात कही गई थी। पहले ये हर 15 दिन में होता था, लेकिन अप्रैल 2026 से ये 7वें, 14वें, 21वें, 28वें और महीने के आखिरी दिन होगा। इसका मतलब, SMA जैसी बदलाव जल्दी रिपोर्ट होंगे, और आपका स्कोर फास्ट अपडेट होगा। अगर आपने पेमेंट कर दी, तो अच्छा असर जल्दी दिखेगा, लेकिन देरी हुई तो नेगेटिव भी जल्दी। बैंक अब इंक्रीमेंटल डेटा भेजेंगे, जैसे SMA-0 से SMA-1 में शिफ्ट। ये बॉरोअर्स (उधार लेने वाले व्यक्ति या संस्था) के लिए अच्छा है, क्योंकि बेहतर स्कोर पर लोन जल्दी मिल सकता है, जैसे कम इंटरेस्ट रेट पर।
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SMA को तीन भागों में बांटा गया है, जो देरी के दिनों पर आधारित है। SMA-0 में, अगर EMI 30 दिन से कम लेट है, तो ये शुरुआती साइन ऑफ स्ट्रेस है। बैंक इसे मॉनिटर करते हैं, लेकिन अभी NPA नहीं। SMA-1 में, 30 से ज्यादा लेकिन 60 दिन से कम, मतलब प्रॉब्लम बढ़ रही है। यहां बैंक आपको नोटिस भेज सकते हैं कि पेमेंट करो। फिर SMA-2, 60 से ज्यादा लेकिन 90 दिन से कम, जहां रिस्क हाई है। 90 दिन पार होते ही ये NPA बन जाता है, जो Non-Performing Asset है, मतलब बैंक के लिए वो लोन अब कमाई नहीं कर रहा।
क्रेडिट रिपोर्ट में SMA DPD के साथ आता है। जैसे, अगर 45 दिन लेट है, तो SMA-1 दिखेगा। ये रिपोर्ट CICs (क्रेडिट की जानकारी देने वाली कंपनियां) को जाती है, और आपका स्कोर कैलकुलेट होता है। पर्सनल लोन में डिफॉल्ट होने पर ये जल्दी SMA में जाता है। अगर आपने रिस्ट्रक्चरिंग रिक्वेस्ट की, तो बैंक देखेंगे, लेकिन SMA रहता है जब तक फुल पेमेंट न हो। NPA होने पर ये सबस्टैंडर्ड, डाउटफुल या लॉस कैटेगरी में जा सकता है, जो 12 महीने से ज्यादा NPA होने पर। लेटेस्ट में, RBI के ड्राफ्ट से SMA चेंजेस को इंक्रीमेंटल रिपोर्टिंग में शामिल किया गया है, जिससे बैंक बेहतर रिस्क मैनेज कर सकें। इससे बॉरोअर्स को फायदा कि अगर पेमेंट अपडेट की, तो स्कोर 750 से ऊपर होने पर नए क्रेडिट ऑप्शंस जल्दी खुलेंगे।
SMA का सबसे बड़ा नेगेटिव इंपैक्ट क्रेडिट स्कोर पर पड़ता है। क्रेडिट स्कोर में पेमेंट हिस्ट्री का वेटेज सबसे ज्यादा है, करीब 30-35%। जैसे ही SMA आता है, स्कोर गिरता है: SMA-0 में थोड़ा, SMA-1 में ज्यादा, और SMA-2 में बहुत। अगर अधिक से अधिक अकाउंट्स में SMA है, तो स्कोर और नीचे। उदाहरण के लिए, अगर आपका स्कोर 750 था, तो SMA-2 से ये 600 के नीचे जा सकता है, जिससे नए लोन रिजेक्ट हो सकते हैं।
NPA होने पर तो स्कोर और खराब, क्योंकि ये रिपोर्ट में सालों तक रहता है। लीगल साइड से, बैंक रिकवरी नोटिस भेजते हैं, जहां आउटस्टैंडिंग अमाउंट और डेडलाइन होती है। अगर नहीं चुकाया, तो कोर्ट केस, और आपके एसेट्स जैसे सेविंग्स अकाउंट या FD अटैच हो सकते हैं। लेकिन SMA स्टेज में ही अगर पेमेंट कर दो, तो स्कोर रिकवर हो सकता है। RBI के नए नियम से, वीकली अपडेट्स से ये प्रोसेस फास्ट होगा, मतलब, पेमेंट की तो स्कोर जल्दी सुधरेगा। बैंक अब लेटेस्ट डेटा से लोन अप्रूव करेंगे, जैसे इंटरेस्ट रेट या अमाउंट तय करने में। अगर आप फाइनेंशियल दिक्कत में हैं, तो बैंक से रिस्ट्रक्चरिंग बात करो, लेकिन SMA रिपोर्ट में रहेगा जब तक क्लियर न हो।
एक्सपर्ट के मुताबिक, SMA से बचना आसान है अगर आप प्लानिंग करें। ऑटो-डेबिट सेट करें, और ड्यू डेट से कुछ दिन पहले अकाउंट में बैलेंस रखें। रेगुलर क्रेडिट रिपोर्ट चेक करते रहें, फ्री में साल में एक बार मिलती है। अगर SMA आ गया, तो जल्दी पेमेंट करें, ओवरड्यू अमाउंट चुकाते ही स्टेटस अपडेट होता है। CICs को ये इंफो जाती है, और रिपोर्ट से हट जाता है।
अगर पर्सनल लोन में SMA है, तो बैंक नोटिस भेजेंगे। रिस्ट्रक्चरिंग ऑप्शन यूज कर सकते हैं अगर सही समस्या हो तो। लेकिन याद रखें, SMA स्कोर को ड्रॉप करता है, जिससे फ्यूचर क्रेडिट महंगा या मुश्किल हो जाता है। RBI के 2026 से आने वाले साप्ताहिक अपडेट्स से, फायदा जल्दी मिलेगा, जैसे कम रेट पर लोन। NPA होने से पहले SMA को हैंडल करो, क्योंकि उसके बाद लीगल ट्रबल बढ़ जाता है, जैसे कोर्ट ऑर्डर से एसेट्स सीज। कुल मिलाकर, SMA एक वार्निंग है इसलिए इसे इग्नोर करना भारी पड़ सकता है।