हर नौकरीपेशा व्यक्ति की सैलरी स्लिप में एक लाइन होती है, जिसे देखकर सबसे पहले माथा ठनकता है वो है CTC। और जब ये CTC 12 लाख रुपये को पार कर जाती है तो ज्यादातर लोग मान लेते हैं कि अब टैक्स देना तो तय है। कई बार तो यह सोचकर ही खुशी आधी रह जाती है कि मोटी सैलरी का बड़ा हिस्सा टैक्स में चला जाएगा। लेकिन सच इससे थोड़ा अलग है।
हकीकत यह है कि CTC और टैक्स के बीच का रिश्ता उतना सीधा नहीं जितना दिखता है। सही जानकारी और थोड़ी समझदारी से की गई टैक्स प्लानिंग से ऐसा भी हो सकता है कि 14 लाख रुपये तक की CTC होने के बावजूद इनकम टैक्स जीरो रहे। सरकार के नए टैक्स नियमों, स्टैण्डर्ड डिडक्शन और कुछ कानूनी छूटों ने इस रास्ते को आसान बना दिया है।
यह कोई जुगाड़ या नियमों से बचने की चाल नहीं है, बल्कि वही सुविधाएं हैं जो खुद टैक्स सिस्टम में दी गई हैं। बस जरूरत है इन्हें सही तरीके से समझने और इस्तेमाल करने की।
ClearTax की टैक्स एक्सपर्ट CA शेफाली मुद्रा कहती हैं कि न्यू टैक्स रिजीम (Section 115BAC) के तहत FY 2025–26 में, 14 लाख रुपये की CTC वाले सैलरी कर्मचारी अपनी टैक्स जिम्मेदारी को काफी कम कर सकते हैं, क्योंकि 12.75 लाख रुपये तक की इनकम असल में टैक्स‑फ्री हो जाती है।
ये इसलिए संभव है क्योंकि सभी सैलरीधारक 75,000 रुपये का स्टैण्डर्ड डिडक्शन लेने के हकदार हैं। अगर इस डिडक्शन के बाद टैक्सेबल इनकम 12 लाख रुपये या उससे कम हो, तो Section 87A की छूट के तहत (अधिकतम 60,000 रुपये तक) पूरा टैक्स ऑफसेट हो जाता है और टैक्स जीरो हो जाता है।
इसके अलावा, एम्प्लॉयर का EPF में योगदान (बेसिक सैलरी का 12% तक) और NPS में योगदान (बेसिक सैलरी का 14% तक, Section 80CCD(2) के तहत डिडक्टेबल) टैक्स‑फ्री होता है और टैक्सेबल इनकम में शामिल नहीं होता।
हालांकि, ओल्ड टैक्स रिजीम की तरह 80C या 80D जैसी कटौतियां न्यूज रिजीम में नहीं मिलतीं, लेकिन स्टैण्डर्ड डिडक्शन, कम स्लैब दरें, पूरी Section 87A छूट और टैक्स‑फ्री एम्प्लॉयर योगदान के कॉम्बिनेशन से अगर 14 लाख रुपये की CTC का कुछ हिस्सा EPF और NPS में रखा जाए, तो टैक्सेबल इनकम 12 लाख रुपये या उससे नीचे आ सकती है। इससे 12.75 लाख रुपये तक की कुल सैलरी असल में टैक्स‑फ्री हो जाती है।
शेफाली मुद्रा कहती हैं कि हां, न्यूज टैक्स रिजीम में EPF और NPS में एम्प्लॉयर योगदान का सही इस्तेमाल करके पूरी टैक्स जिम्मेदारी जीरो की जा सकती है, बशर्ते सैलरी स्ट्रक्चर ऐसा हो।
अभी के नियमों के अनुसार, एम्प्लॉयर का EPF में योगदान (बेसिक का 12%) और एम्प्लॉयर का NPS में योगदान (बेसिक का 14% निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए, Section 80CCD(2) के तहत डिडक्टेबल) टैक्स‑फ्री हैं और इसलिए टैक्सेबल इनकम में नहीं जुड़ते, भले ही ये CTC का हिस्सा हों।
इस ट्रिक को काम में लाने के लिए बेसिक सैलरी जरूरी है, क्योंकि EPF और NPS दोनों योगदान बेसिक सैलरी का प्रतिशत होते हैं। अगर CTC में बेसिक सैलरी का एक हिस्सा ठीक से रखा जाए और उसका कुछ हिस्सा EPF और NPS में रूट किया जाए, तो स्टैण्डर्ड डिडक्शन के साथ मिलाकर टैक्सेबल इनकम 12 लाख या उससे नीचे आ सकती है, जिससे पूरी Section 87A छूट मिल जाती है और टैक्स बिल जीरो हो जाता है।
असल में, टैक्स बचत का असर भत्तों या रिइम्बर्समेंट से नहीं, बल्कि रिटायरमेंट‑लिंक्ड एम्प्लॉयर के योगदान से आता है जो बेसिक सैलरी पर निर्भर करता है।
शेफाली का कहना है कि एक सैलरीधारक न्यू टैक्स रिजीम में स्टैण्डर्ड डिडक्शन + टैक्स‑फ्री एम्प्लॉयर योगदान (EPF और NPS) का सही कॉम्बिनेशन करके 14 लाख रुपये CTC को टैक्स‑फ्री बना सकता है।
उदाहरण के लिए, अगर किसी कर्मचारी की CTC 14 लाख रुपये है और बेसिक सैलरी 7 लाख रुपये है:
ये दोनों टैक्स‑फ्री योगदान माने जाते हैं। इसके अलावा, कर्मचारी 75,000 रुपये का स्टैण्डर्ड डिडक्शन भी ले सकता है।
इन सबके कॉम्बिनेशन से टैक्सेबल इनकम 12 लाख रुपये या उससे नीचे आ जाती है और इस तरह 14 लाख रुपये की CTC असल में टैक्स‑फ्री बन जाती है।
| Particulars | Amount |
| Total CTC | ₹14,00,000 |
| Less: Standard deduction | (₹75,000) |
| Less: Employer EPF (12% of basic) | (₹84,000) |
| Less: Employer NPS (14% of basic, Sec 80CCD(2)) | (₹98,000) |
| Taxable income | ₹11,43,000 |
शेफाली बताती हैं चूंकि टैक्सेबल इनकम 12 लाख रुपये से काफी कम है, इसलिए जो भी टैक्स कंप्यूट होता है, उसे Section 87A की छूट पूरी तरह ऑफसेट कर देती है। नतीजा यह होता है कि टैक्स बिल जीरो हो जाता है।
सार में, अगर कोई कर्मचारी 14 लाख की CTC ले रहा है और उसकी CTC का कुछ हिस्सा एम्प्लॉयर द्वारा EPF और NPS योगदान में रखा गया है, खासकर 14% एम्प्लॉयर NPS का हिस्सा सही तरीके से इस्तेमाल किया गया हो, तो न्यू टैक्स रिजीम में वह कानूनी तरीके से कोई इनकम टैक्स नहीं देगा।
न्यू टैक्स रिजीम में कटौती केवल एम्प्लॉयर के EPF और NPS योगदान पर मिलती है, कर्मचारी के खुद के योगदान पर नहीं।
इसलिए न्यू रिजीम में टैक्स‑बचत का बड़ा रास्ता सिर्फ एम्प्लॉयर का योगदान (EPF और NPS) है, कर्मचारी के खुद के योगदान से नहीं।
शेफाली मुद्रा कहती हैं कि अगर आप अपनी CTC में बेसिक सैलरी और अलाउंस का स्ट्रक्चर बदलते हैं, तो इसका असर टैक्स बचत और रिटायरमेंट फंड दोनों पर पड़ता है।
इस तरह, बेसिक सैलरी बढ़ाकर (और अलाउंस घटाकर) कर्मचारी टैक्स बचा सकता है और रिटायरमेंट फंड भी बड़ा बना सकता है, भले ही हर महीने टेकर‑होम रकम थोड़ी कम हो।
शेफाली बताती हैं कि अगर एम्प्लॉयर NPS नहीं देता, तो 14 लाख रुपये तक CTC वाले कर्मचारी के पास टैक्स बचाने के कुछ विकल्प अभी भी हैं, लेकिन सीमित हैं क्योंकि न्यू रिजीम में 80C और 80D जैसी कटौतियां नहीं मिलती।
अगर एम्प्लॉयर NPS नहीं देता, तो टैक्स‑बचत के तरीके में सिर्फ स्टैण्डर्ड डिडक्शन और एम्प्लॉयर का EPF ही रह जाता है। इसके अलावा कर्मचारी या तो कुछ टैक्स देने के लिए तैयार होगा या ओल्ड टैक्स रिजीम में जाएगा।
ओल्ड रिजीम में 80C (EPF/PPF/ELSS), 80D (हेल्थ इंश्योरेंस), और 80CCD(1B) (NPS पर अतिरिक्त 50,000 रुपये) जैसी कटौतियां मिलती हैं। इन कटौतियों से टैक्सेबल इनकम बहुत कम हो सकती है (जैसे 80C से 1.5 लाख रुपये + 80CCD(1B) से 50,000 रुपये), इसलिए अक्सर दोनों रिजीम को चेक करना फायदेमंद होता है।