बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) सहित भारतीय कंपनियों ने साल 2025 में सिंडिकेटेड ऋण के जरिये विदेश से रिकॉर्ड 32.5 अरब डॉलर की राशि जुटाई है। यह मुख्यत: प्रायोजित फाइनैंसिंग, वित्तीय फर्मों से मजबूत मांग और अधिग्रहण गतिविधियों में तेजी की वजह से हुई।
उद्योग के सूत्रों ने कहा कि भारतीय फर्में 2026 में भी अधिग्रहण की खातिर धन जुटाने के लिए सिंडिकेटेड ऋण लेना जारी रख सकती हैं। अमेरिका में ब्याज दर में कमी की बढ़ती उम्मीद के बीच डॉलर बॉन्ड बाजार में भी गतिविधि बढ़ने की उम्मीद है।
एचएसबीसी इंडिया के प्रबंध निदेशक और डेट फाइनैंसिंग के प्रमुख चेतन जोशी ने कहा, ‘हमारे हिसाब से सिंडिकेटेड ऋण बाजार 2026 में काफी व्यस्त रह सकता है क्योंकि भारतीय कंपनियां अधिग्रहण के लिए इस बाजार का रुख कर सकती हैं। साथ ही बाह्य वाणिज्यिक उधारी (ईसीबी) दिशानिर्देशों को उदार बनाने के प्रस्ताव से भी इस क्षेत्र में गतिविधियां बढ़ सकती हैं।’
उन्होंने कहा कि बैंक बाजार में आने वाले विकास के अवसरों का लाभ उठाने की कोशिश करेगा। जोशी के अनुसार साल 2025 भारत में विदेशी सिंडिकेटेड ऋण बाजार के लिए रिकॉर्ड वर्ष रहा। अंतरराष्ट्रीय बैंकों द्वारा उच्च गुणवत्ता वाली भारतीय कंपिनयों की व्यापक स्वीकार्यता के कारण विदेशी मुद्रा में नई उधारी के लिए स्प्रेड भी काफी कम हुआ, जिससे ज्यादा ऋण लिया गया। एचएसबीसी 2025 में विदेशी सिंडिकेटेड ऋण बाजार में शीर्ष बुक रनर था।
आंकड़ों से पता चलता है कि साल 2025 में भारतीय कंपनियों द्वारा जुटाई गई 32.5 अरब डॉलर में से 12.5 अरब डॉलर से अधिक रकम कॉरपोरेट फाइनैंसिंग के लिए जुटाई गई थी, जबकि वित्तीय संस्थानों ने 10 अरब डॉलर से अधिक का कर्ज जुटाया और प्रायोजित इवेंट सौदों के लिए 9 अरब डॉलर से अधिक जुटाए गए।
प्रायोजित फाइनैंसिंग के तहत पीई, वेंचर कैपिटल या निवेश फंड्स अधिग्रहण आदि के लिए ऋण जुटाते हैं। सिंडिकेटेड ऋण बाजार में वित्तीय संस्थानों का दबदबा रहा और कुल विदेशी निर्गम में इनकी हिस्सेदारी 42 फीसदी रही। इनमें एनबीएफसी सबसे आगे रहीं जिनके विदेशी ऋण में रिकॉर्ड 108 फीसदी की वृद्धि हुई। विशेषज्ञों ने बताया कि सिंडिकेटेड ऋण बाजार का रुख करने वाली नई कंपनियों की संख्या बढ़ रही है।
साल 2024 में सिंडिकेटेड लोन के माध्यम से लगभग 26 अरब डॉलर जुटाए गए थे जो 2023 में जुटाए गए 31.6 अरब डॉलर से कम है। जोशी के अनुसार निकासी और पूर्व भुगतान में लचीलेपन की वजह से भारतीय फर्में सिंडिकेटेड ऋण को प्राथमिकता दे रही हैं। बॉन्ड बाजार को आम तौर पर लगभग 30 करोड़ डॉलर के न्यूनतम आकार की आवश्यकता होती है। साल 2025 में कई उधारकर्ता थे जिन्होंने 10 से 30 करोड़ डॉलर के दायरे में ऋण हासिल किया।
विशेषज्ञों का कहना है बॉन्ड निश्चित दर वाले होते हैं जबकि ऋण फ्लोटिंग दर पर होते हैं। ऐसे में विशेष रूप से डॉलर राजस्व वाली कंपनियां फ्लोटिंग दर वाले ऋण को लेना पसंद करती हैं। खास तौर पर जब अमेरिका में ब्याज दर में कटौती की उम्मीद है, ऐसे में कर्ज लेने वालों को आगे फायदा मिल सकता है जबकि बॉन्ड में ऐसा नहीं होता है और उसकी दर निर्धारित होती है।
जोशी का मानना है कि डॉलर बॉन्ड बाजार में भी 2026 में वृद्धि होने की संभावना है। ईसीबी दिशानिर्देशों में नियामकीय बदलाव, निवेशकों से टाली हुई मांग और अमेरिकी ब्याज दर में गिरावट से बॉन्ड बाजार में गतिविधियां बढ़ सकती हैं।
रॉकफोर्ट फिनकैप के संस्थापक और मैनेजिंग पार्टनर वेंकटकृष्णन श्रीनिवासन ने कहा, ‘पिछले साल विदेशी बाजार से जुटाए गए सिंडिकेटेड ऋण, खास तौर पर ईसीबी, घरेलू बॉन्ड निर्गम और विदेशी बॉन्ड बाजार दोनों की तुलना में पसंदीदा फंडिंग विकल्प के रूप में उभरे हैं। यह प्रवृत्ति सबसे स्पष्ट रूप से वित्तीय संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में देखी गई है।
श्रीनिवासन ने कहा, ‘एक महत्त्वपूर्ण कारक विदेशी बॉन्ड की तुलना में सिंडिकेटेड ऋण का मूल्य निर्धारण लाभ है। विदेशी मुद्रा बॉन्ड में उधारकर्ता के लिए अस्थिर वैश्विक माहौल, उच्च निर्गम और अनुपालन लागत तथा बाजार की स्थिति बिगड़ने पर प्रतिकूल मूल्य निर्धारण का जोखिम होता है। इसके विपरीत ईसीबी से जुड़े सिंडिकेटेड लोन बड़े पैमाने पर संबंधों पर आधारित होते हैं और बैंक की अगुआई में यह कर्ज जुटाया जाता है।’