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चीन का उच्चतम स्तर और भारत की रफ्तार…

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आज जीडीपी के संदर्भ में भारत का आकार चीन के 20 फीसदी है। चीन 2006 में अमेरिका के सामने इसी स्थिति में था।

Last Updated- December 06, 2023 | 10:29 PM IST
Middle east war impact on china

अगर आने वाले वर्षों में चीन की वृद्धि दर में धीमापन भी आता है तो भी भारत को उसकी बराबरी करने के लिए असाधारण प्रदर्शन करना होगा। बता रहे हैं आकाश प्रकाश

इन दिनों ऐसा एक भी सप्ताह नहीं बीतता जब ऐसी शोध रिपोर्ट या यूट्यूब चर्चा देखने को न मिलती हो कि आखिर क्यों चीन आर्थिक और भूराजनीतिक दृष्टि से अपनी उच्चतम अवस्था को प्राप्त कर चुका है। कोविड महामारी के बाद कमजोर वापसी, शेयर बाजार के खराब प्रदर्शन, प्रॉपर्टी क्षेत्र में डिफॉल्ट और वृद्धि पर कम ध्यान देने वाले राजनीतिक नेतृत्व के कारण चीन को लेकर संदेह उत्पन्न हो रहे हैं।

देश में मिजाज पूरी तरह बदल चुका है। अधिकांश विशेषज्ञ 2021 तक मानते थे कि 2030 के दशक के मध्य तक चीन अमेरिका को पछाड़कर सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। कई लोग मानते हैं कि उसका आर्थिक मॉडल जो दीर्घकालिक नियोजन और स्पष्ट औद्योगिक नीतियों से बना था वह सफलता की आसान राह था।

चीन में दशकों से दो अंकों की आर्थिक वृद्धि हो रही थी और इससे पहले किसी देश ने चीन की तरह गरीबी दूर नहीं की थी। चीन ने 2006 से 2021 के बीच लगभग हर वर्ष डॉलर के संदर्भ में अमेरिका की तुलना में अधिक सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी तैयार किया। उसका आकार भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था के 20 फीसदी से बढ़कर उसके 76 फीसदी के बराबर हो गया।

यह सब 2022-23 में बदल गया जब चीन की धीमी वृद्धि, मुद्रा अवमूल्यन और मजबूत अमेरिकी अर्थव्यवस्था के कारण अमेरिका तेजी से आगे निकल गया। बीते दो वर्षों में अमेरिका की नॉमिनल डॉलर जीडीपी चीन की तुलना में दो लाख डॉलर ज्यादा बढ़ी।

अमेरिका के बेहतरीन प्रदर्शन ने बीते 15 वर्षों में चीन को हासिल करीब 40 फीसदी लाभ को पलट दिया। अमेरिका में यह तेजी टिकाऊ नहीं है और इसके पीछे मजबूत डॉलर, भारी राजकोषीय और मौद्रिक प्रोत्साहन आदि प्रमुख वजह थीं।

यह रुझान टिकाऊ है या नहीं इससे इतर चीन का हालिया कमजोर प्रदर्शन हर किसी को शुबहे में डालने में कामयाब रहा कि क्या वह कभी अमेरिकी अर्थव्यवस्था को पछाड़ भी पाएगा या नहीं? कई अनुमानों के मुताबिक चीन धीरे-धीरे 0-2 फीसदी के वृद्धि पथ पर स्थिर हो जाएगा।

उनकी दलील इस तथ्य पर आधारित है कि चीन की आबादी घट रही है, उसकी अर्थव्यवस्था बहुत नकदीकृत है और उसका संपत्ति क्षेत्र विफल हो चुका है जबकि वह उसके जीडीपी के 30 फीसदी के लिए जिम्मेदार रहा है। इन बातों के अलावा बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने चीन में निवेश रोक दिया है और दुनिया भर में चीनी वस्तुओं के खिलाफ व्यापारिक कदम उठाए जा रहे हैं। तकनीक हस्तांतरण पर अमेरिकी रोक भी इसे प्रभावित करेगी।

चीन का नेतृत्व भी स्थिरता के लिए वृद्धि का त्याग करने को तैयार नजर आता है। उपरोक्त बातें सही हो सकती हैं लेकिन मेरा मानना है कि चीन आने वाले दशक में 3-4 फीसदी की वृद्धि हासिल करेगा। हालांकि यह उसकी पुरानी वृद्धि दर तथा भारत की संभावित वृद्धि से कम होगी।

तथ्य यह है कि उसके मौजूदा प्रति व्यक्ति जीडीपी के स्तर के अन्य एशियाई देशों की मजबूत वृद्धि जारी है। आज भी तमाम प्रगति के बावजूद चीन का आकार प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में अमेरिका के एक बटा पांच से अधिक नहीं है। आय का यह स्तर वैसा ही है जैसा जापान में 1980 में था।

दक्षिण कोरिया और ताइवान तब करीब एक दशक तक 5 से 6 फीसदी की वृद्धि हासिल करने में कामयाब रहे थे। यहां तक कि जापान भी इस स्तर पर एक दशक से अधिक समय तक 4 फीसदी से अधिक वृद्धि हासिल कर सका। यानी चीन में समृद्धि का मौजूदा स्तर ऐसा नहीं है जहां अन्य देश ठहर गए थे या धीमे पड़े थे। चीन के पास अभी भी संभावनाएं हैं।

चीन की आबादी की उम्र बढ़ रही है लेकिन अभी भी वह दुनिया की सबसे बड़ी श्रमशक्ति है। 50 वर्ष की आयु के बाद श्रम शक्ति भागीदारी की दर में तेजी से कमी आती है और आज भी औसत चीनी श्रमिकों की शिक्षा का स्तर पश्चिम से काफी कम है। अगर चीन 50 वर्ष की आयु के बाद काम करने वाले और श्रमिक जुटा सका तो वह श्रम शक्ति में कमी से निपट सकता है।

वैश्विक विनिर्माण क्षमता में 30 फीसदी हिस्सेदारी और विनिर्मित वस्तुओं के निर्यात में 20 फीसदी की हिस्सेदारी के साथ चीन दुनिया भर में विनिर्माण का पावरहाउस बना हुआ है। अब यह भी सच नहीं है कि चीन का निर्यात बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भरोसे है। आज वहां 70 फीसदी से अधिक निर्यात स्थानीय कंपनियां तैयार करती हैं जो एक दशक पहले 50 फीसदी था।

चीन में नवाचार की क्षमता भी है। भविष्य की कई तकनीकों के क्षेत्र में चीन ने नेतृत्व किया है, मसलन इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा, 5जी और तेज गति से चलने वाली ट्रेनें। वह विश्वस्तरीय उत्पाद पेश कर रहा है। जापान और जर्मनी को पछाड़कर अब वह दुनिया में कारों का सबसे बड़ा निर्यातक है।

हम देखते हैं कि चीन की कंपनियों ने विनिर्माण की अपनी छाप को संतुलित किया है और अब वे टैरिफ और कोटा को पार करने में सक्षम हैं। बाजार में चीनी उत्पाद नजर आते हैं लेकिन वे थाईलैंड, तुर्किये, वियतनाम तथा अन्य देशों के रास्ते आते हैं। व्यापार बाधाओं के चलते चीन का निर्यात नहीं रुकने वाला है।

तकनीक बाधाएं आमतौर पर सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में आती हैं जहां चीन ने सभी चिप्स के मामले में अंतर कम कर लिया है। एकदम उन्नत संस्करणों के अलावा वह हर तरह की चिप बना रहा है। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के अलावा अन्य विनिर्माण कामों में उच्चस्तरीय हाई एंड ग्राफिक प्रोसेसिंग यूनिट की जरूरत नहीं होती।

इसके अलावा जब हम ऐपल जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अपने विनिर्माण संयंत्र को चीन से बाहर ले जाने की बात करते हैं तो याद रखें कि अगर ऐपल 25 फीसदी आईफोन उत्पादन को भारत ले जाता है तो भी शेष 75 फीसदी चीन में रहेगा। चीन में निर्माण की जो पारिस्थितिकी है उसका अनुकरण करना मुश्किल है। यह मानना जल्दबाजी होगी कि चीन अपने उच्चतम स्तर पर है।

आगामी दशक में चीन की वृद्धि धीमी हो सकती है, शायद वह कभी जीडीपी के क्षेत्र में अमेरिका को न पछाड़ पाए लेकिन वह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहेगा। वह कई प्रौद्योगिकी में दुनिया का अगुआ भी रहेगा। वह एक ऐसा देश होगा जिसकी अनदेखी कोई नहीं कर सकता है। फिर चाहे वह बहुराष्ट्रीय कंपनियां हों या वैश्विक आवंटक।

भारत में हम भले ही इसके उलट अपेक्षा करें लेकिन एक समय आएगा जब निवेशक चीन की ओर रुख करेंगे। बाजार सस्ते हैं और कुछ विश्वस्तरीय कंपनियां वहां मौजूद हैं। समय के साथ नेतृत्व और अर्थव्यवस्था की दिक्कतें दूर हो जाएंगी। उभरते बाजार सूचकांक में आज भी चीन की हैसियत भारत से दोगुनी है।

एक अन्य दिलचस्प तथ्य यह है कि भारत को चीन के समक्ष पहुंचने में कितना समय लगेगा। आज जीडीपी के संदर्भ में भारत का आकार चीन के 20 फीसदी है। चीन 2006 में अमेरिका के सामने इसी स्थिति में था। उसे अमेरिका के जीडीपी के 76 फीसदी के स्तर पर पहुंचने में उसे 15 सालों की असाधारण वृद्धि, मजबूत मुद्रा और अमेरिका के कमजोर प्रदर्शन की जरूरत पड़ी।

ऐसा पहले कभी नहीं हुआ और इसे चीन का आर्थिक चमत्कार माना जाता है। हमें चीन की बराबरी करने के लिए वैसा ही कोई चमत्कार करना होगा। क्या एक देश के रूप में हमने उत्पादकता बढ़ाने के लिए उचित कदम उठाए हैं और कारोबारी सुगमता को बढ़ाया है ताकि हम चीन जैसी वृद्धि हासिल कर सकें? क्या हम अपनी मुद्रा को उतना बढ़ने देंगे जितना चीन ने 2006 से 2021 के बीच किया? इन सवालों के जवाब बताएंगे कि हम कितनी जल्दी चीन के स्तर पर पहुंचेंगे।

*(लेखक अमांसा कैपिटल से संबद्ध हैं)

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First Published - December 6, 2023 | 10:27 PM IST

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