सरकारों में विशेषतौर पर राज्य सरकारों में उन मंत्रियों का शामिल होना कोई असामान्य बात नहीं है जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक आरोप हैं। महाराष्ट्र में अब यह लगभग आम बात लगती है। राज्य में 2019 के विधानसभा चुनावों के बाद शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में महाराष्ट्र विकास आघाडी (एमवीए) गठबंधन की सरकार सत्ता में आई। इस चुनाव के तुरंत बाद जारी की गई एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (एडीआर) की रिपोर्ट में कुछ अहम तथ्यों की ओर इशारा किया गया। इसके मुताबिक राज्य मंत्रिमंडल के 43 मंत्रियों में से 27 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे और 18 गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे थे।
एडीआर ने 288 विधायकों के हलफनामों (जिनमें से मंत्रियों की नियुक्ति की जाती है) का विश्लेषण किया है और इससे पता चला है कि इनमें से 40 फीसदी पर हत्या, हत्या के प्रयास और अपहरण सहित गंभीर आपराधिक मामलों के आरोप थे। वाम दलों को छोड़कर महाराष्ट्र विधानसभा में ऐसा कोई दल मौजूद नहीं है जिनसे आपराधिक मामलों वाले विधायक नहीं जुड़े हैं।
ऐसे में यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि देश में लोगों ने पिछले सप्ताह महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख के खिलाफ जबरन वसूली और धनशोधन मामले की खबर अखबारों में पढ़ी। देशमुख को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने गिरफ्तार भी किया और वह न्यायिक हिरासत में भी थे। अपराध में उनके अन्य कथित साझेदार पूर्व पुलिस इंस्पेक्टर सचिन वाझे हैं जो पहले से ही जेल में हैं और उनकी हिरासत अवधि बढ़ा दी गई है। पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह को अभी नहीं खोजा जा सका है।
यह सब बिल्डर और होटल मालिक विमल अग्रवाल की शिकायत पर किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि वाझे ने दो बार और रेस्तरां पर छापे न मारने के लिए उनसे 9 लाख रुपये ऐंठ लिए जिसे वह साझेदारी में चला रहे थे और उन्हें करीब 2.92 लाख रुपये के दो स्मार्टफोन खरीदने के लिए भी मजबूर किया। यह कथित घटना जनवरी 2020 से मार्च 2021 के बीच हुई थी जब परमबीर सिंह पुलिस आयुक्त थे।
अब इस घटना के पात्रों के किरदार पर गौर करें: कुछ महीने पहले तक गृहमंत्री और पुलिस से जुड़े सभी मामलों के प्रभारी रह चुके शख्स अब जेल में हैं। राज्य में वरिष्ठतम पुलिस अधिकारी, पुलिस आयुक्त का पता नहीं लगाया जा सका है और राज्य सरकार उन्हें भगोड़ा घोषित करने के लिए अदालत तक गई है। इसके अलावा जेल में एक इंस्पेक्टर भी है जिस पर गृहमंत्री की ओर से पैसे वसूलने का आरोप है और उसे हत्या के एक अतिरिक्त आरोप में गिरफ्तार किया गया था।
इस पूरे घटनाक्रम में और भी बहुत कुछ जुड़ा है: एक क्रूज जहाज में मौजूद मादक पदार्थों के जटिल मामले को स्वापक नियंत्रण ब्यूरो (एनसीबी) की मुंबई इकाई संभालने में असमर्थ है और इसलिए इस मामले को दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया है। उपमुख्यमंत्री अजित पवार पर हाल ही में आयकर छापे के बाद महाराष्ट्र में तीन मंत्रियों की केंद्रीय एजेंसियों द्वारा पूछताछ की जा रही है जिनमें पवार और अनिल देशमुख के अलावा परिवहन मंत्री अनिल परब भी हैं।
आखिर क्या चल रहा है?
दाऊद इब्राहिम और महाराष्ट्र में राजनेताओं के साथ अंडरवल्र्ड के संपर्क पर एक किताब लिखने वाले सेवानिवृत पुलिस आयुक्त नीरज कुमार ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘हम नए निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि केंद्र बनाम राज्य प्रतिद्वंद्विता का राज्य सरकार का आरोप गलतबयानी है। लेकिन जब एक पुलिस आयुक्त का पता नहीं लगाया जा सकता है और राज्य उसे भगोड़ा घोषित करने के लिए कदम उठाती है तो यह एक अभूतपूर्व और आश्चर्यजनक बात है।’ वह कहते हैं, ‘हालांकि यह महाराष्ट्र के लिए कोई नई या अजीब बात नहीं है।’
राज्य सरकार का दृढ़ विश्वास है कि केंद्र का बरताव उन राज्यों में काफी नरम है जहां इसी पार्टी की सरकार है जबकि महाराष्ट्र जैसे विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों को दंडित करने के मकसद से अलग बरताव किया जा रहा है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने विजयादशमी के अपने भाषण में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की हिंदुत्व के प्रति प्रतिबद्धता पर सवाल उठाने के अलावा केंद्र-राज्य के रिश्ते पर भी बात करते हुए कहा कि उनकी सरकार केंद्र के सामने नहीं झुकेगी। निश्चित रूप से एमवीए अपने भागीदार दलों पर केंद्रीय एजेंसियों के बार-बार हमले को एक के बजाय सभी पर किए गए हमले के तौर पर देख रहा है। अब तक एमवीए के घटक दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) ही केंद्र द्वारा चलाए जा रहे आपराधिक जांच की सबसे कमजोर कड़ी साबित हो रही है।
दूसरी ओर महाराष्ट्र में राजनीति-अपराधियों का गठजोड़ कोई नया नहीं है। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुंबई को हिलाकर रख देने वाले 1993 के बम धमाकों के तुरंत बाद गठित एन एन वोहरा समिति ने 5 अक्टूबर, 1993 को केंद्रीय गृह मंत्रालय को 100 पृष्ठों की एक रिपोर्ट सौंपी थी। अगस्त 1995 में संसद में इस रिपोर्ट के सिर्फ 11 पृष्ठों को ही सार्वजनिक किया गया था।
रिपोर्ट में कहा गया था कि धमाकों की साजिश रचने वाले दाऊद इब्राहिम और महाराष्ट्र के एक बहुत वरिष्ठ राजनीतिक नेता के बीच ‘निश्चित’ रूप से गठजोड़ था। एक पूर्व मुख्यमंत्री का नाम भी इसमें लिया गया था। इसके रिपोर्ट में पैसे से जुड़ा ब्योरा भी संलग्न है जिसमें दाउद इब्राहिम ने मुख्यमंत्री के एक रिश्तेदार (जो रिश्तेदार बाद में नेता बन गए) को दो बार 5 करोड़ रुपये का ‘दान’ दिया है। रिपोर्ट के सार्वजनिक भाग में सरकार में आपराधिक गिरोहों के प्रभाव के बारे में स्पष्ट बात की गई है। एनएन वोहरा कमेटी की सिफारिशें करीब 30 साल पुरानी हैं। लेकिन महाराष्ट्र में मौजूदा घटनाक्रम को देखते हुए यह समझा जा सकता है कि यहां अब भी ज्यादा कुछ नहीं बदला है।