अमेरिकी फेडरल रिजर्व की दो दिवसीय मौद्रिक नीति की बैठक के बीच भारत सहित कुछ एशियाई बाजारों में आज अच्छी तेजी देखी गई। दिन के कारोबार के दौरान बेंचमार्क सेंसेक्स 1,000 अंक तक चढ़कर 60,000 के स्तर को पार कर गया था लेकिन यूरोपीय बाजार में गिरावट को देखते हुए कारोबार की समाप्ति पर इसने अपनी कुछ बढ़त गंवा दी।
कारोबार की समाप्ति पर सेंसेक्स 578 अंक चढ़कर 59,719 पर बंद हुआ। निफ्टी भी 194 अंक की तेजी के साथ 17,816 पर बंद हुआ। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की लिवाली से वित्तीय और फार्मा शेयरों में खासी तेजी देखी गई।
एक्सचेंज के अंतरिम आंकड़ों के अनुसार विदेशी निवेशकों ने 1,196 करोड़ रुपये मूल्य के शेयरों की लिवाली की। अमेरिकी सूचकांक में सोमवार को आई बढ़त से सुबह के कारोबार में एशियाई बाजारों में तेजी आई थी। बीते दो दिन में देसी सूचकांकों ने शुक्रवार को हुए बड़े नुकसान की भरपाई कर ली। बीते शुक्रवार को डॉलर के मजबूती के मद्देनजर बेंचमार्क सूचकांक में तीन महीने की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी।
हालांकि फेडरल रिजर्व की बैठक के नतीजों को लेकर अभी अनिश्चितता बनी हुई है और निवेशक जोखिम वाले शेयरों में अपना निवेश कम कर रहे हैं। वैश्विक निवेशक इसका अंदाज लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि नीति निर्माता मुद्रास्फीति को काबू में करने के लिए दर में कितना इजाफा करेंगे।
अनुमान लगाया जा रहा है कि फेडरल रिजर्व ब्याज दर में 75 आधार अंक का इजाफा कर सकता है जिससे अमेरिका में ब्याज दर 4 फीसदी से अधिक हो जाएगी, उसके बाद दरों में बढ़ोतरी थम सकती है।
अल्फानीति फिनटेक के सह-संस्थापक यूआर भट्ट ने कहा, ‘आज की तेजी को राहत की तेजी मान सकते हैं क्योंकि बाजार उम्मीद कर रहा है कि फेडरल रिजर्व 100 आधार अंक से ज्यादा दरें नहीं बढ़ाएगा। ऐसा भी माना जा रहा है कि जिंसों के दाम में नरमी से मुद्रास्फीति नीचे आ सकती है। बाजार में कारोबार के अंतिम समय में गिरावट देखी गई और इसे लेकर आशंका जताई जा रही है कि यह तेजी बनी रहेगी या नहीं। बाजार के लिए दर में बढ़ोतरी ही नहीं बल्कि बैठक के बाद फेडरल रिजर्व का रुख भी उतना ही महत्त्वपूर्ण होगा।’
एंड्रयू हॉलैंड ने कहा कि बाजार को उम्मीद है कि भारत पर वैश्विक आर्थिक संकट का असर नहीं पड़ेगा और देश की अर्थव्यवस्था का बेहतर प्रदर्शन निवेशकों को घरेलू बाजार में आकर्षित कर रहा है।
वैश्विक आर्थिक संकट और कंपनियों की आय के नरम परिदृश्य की वजह से निकट अवधि में बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। 10 वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी का प्रतिफल 3.53 फीसदी पर पहुंच गया जो अप्रैल 2011 के बाद सबसे अधिक है। दो वर्षीय अमेरिकी बॉन्ड का प्रतिफल भी 3.96 फीसदी पर आ गया है जो अक्टूबर 2007 के बाद का उच्च स्तर है। बॉन्ड प्रतिफल ज्यादा रहने से शेयर बाजार पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
जियोजित फाइनैंशियल सर्विसेज में शोध प्रमुख विनोद नायर ने कहा, ‘भारत का बाजार फेड की नीति से ज्यादा चिंतित नहीं है। हालांकि मौजूदा रुझान के बने रहने के लिए वैश्विक बाजार में स्थिरता की जरूरत है।’