पिछले कुछ दिनों में रुपये में तेज गिरावट के कारण भारत की उर्वरक सब्सिडी में और इजाफा हो सकता है। विशेषज्ञों और उद्योग जगत के लोगों का कहना है कि कंपनियां इस अतिरिक्त बोझ को उपभोक्ताओं पर नहीं डाल पाएंगी, खासकर यूरिया और डीएपी जैसे उर्वरकों के मामले में, जिनकी कीमतें पहले से निर्धारित होती हैं।
उद्योग जगत के आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल से अक्टूबर 2025 के बीच, भारत ने पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 137 प्रतिशत अधिक यूरिया आयात किया है, जबकि डीएपी का आयात भी अप्रैल–अक्टूबर 2024 की तुलना में लगभग 69 प्रतिशत अधिक रहा है। इसी अवधि में एनपी/एनपीकेएस के आयात में भी लगभग 81 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कमजोर रुपया न केवल विनिर्मित वस्तुओं के आयात को महंगा करेगा बल्कि घरेलू उत्पादन की लागत भी बढ़ेगी। खासतौर पर यूरिया की क्योंकि उसकी उत्पादन लागत का 85 से 90 फीसदी आयातित गैस है जिसकी कीमत डॉलर में होती है।
डाई-अमोनिया फॉस्फेट (डीएपी) बनाने में लगने वाला कच्चा माल, यानी रॉक फॉस्फेट या फॉस्फोरिक एसिड, महंगा हो जाएगा। भारत डीएपी बनाने के लिए जरूरी सभी रॉक फॉस्फेट और फॉस्फोरिक एसिड का आयात करता है।