इक्कीसवीं सदी का वित्त मंत्रालय
बीस साल से भी पहले तत्कालीन वित्त मंत्री जसवंत सिंह ने विजय केलकर की अध्यक्षता में एक समिति गठित की, जिसने एक रिपोर्ट ‘इक्कीसवीं सदी का वित्त मंत्रालय’ पेश की। अच्छा वित्त मंत्रालय बनाने का विचार आज भी उसी रिपोर्ट से शुरू होता है। वित्त अर्थव्यवस्था का दिमाग होता है और वित्त मंत्रालय केंद्र सरकार […]
कारगर बनें बजट के सुधार उपाय
पिछले लगभग एक दशक से भारत में नियम-कायदों से जुड़े झमेले और झंझट बहुत बढ़ गए हैं। वित्त वर्ष 2025-26 के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इन्हें दूर करने के लिए कुछ दिलचस्प उपायों की घोषणा की। वित्तीय क्षेत्र के लिए वित्तीय स्थायित्व एवं विकास परिषद (एफएसडीसी) के अंतर्गत एक प्रक्रिया शुरू करने […]
भारत के वित्तीय बाजार के शिल्पकार मनमोहन
दिवंगत डॉ. मनमोहन सिंह को भारत में बुनियादी बदलाव करने वाले योगदान के लिए सराहा जाता है। उन्होंने संसाधनों को असली अर्थव्यस्था में लाने में आधुनिक प्रतिभूति बाजार अहम भूमिका समझ ली थी, जिसके बाद उन्होंने इस बाजार का खाका तैयार किया और इसकी नींव डाली। बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) का […]
आरबीआई की कामयाबी के लिए सरकार का एजेंडा
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के नए गवर्नर को मुझ जैसे तमाम स्तंभकार उन अहम सवालों के बारे में सलाह दे रहे हैं, जो उनके सामने हैं। मगर इस समय की खास बात यह है कि गवर्नर की सफलता की जिम्मेदारी सरकार पर है। अधिकतर केंद्रीय बैंकों का काम मौद्रिक नीति पर ध्यान देना ही होता […]
केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच बढ़ता असंतुलन
सांविधिक नियामकीय प्राधिकारों द्वारा विधायी शक्तियों का इस्तेमाल संघवाद को सीमित करता है और इसमें सुधार करने की आवश्यकता है। बता रहे हैं के पी कृष्णन भारतीय संविधान राज्य के काम को चार हिस्सों में विभाजित करता है: (क) केंद्रीय सूची, (ख) राज्य सूची, (ग) समवर्ती सूची जो केंद्र और राज्यों की साझा जिम्मेदारी है […]
Opinion: मुद्रा विनिमय दर में अनिश्चितता का अर्थव्यवस्था से ताल्लुक, क्या स्थिरता का जिक्र RBI के लिए वाकई उपलब्धि?
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने हाल में सार्वजनिक तौर पर सीना चौड़ा कर पिछले कुछ वर्षों में मुद्रा विनिमय दरों में स्थिरता का जिक्र किया। क्या यह वाकई ऐसी उपलब्धि है जिस पर आरबीआई इतरा सकता है? कंप्यूटर क्रांति की भाषा में पूछें तो यह खूबी है या खामी? आइए, पहले तथ्यों पर विचार करते […]
कौन निभाएगा संरक्षकों की रक्षा का दायित्व? संसद रेगुलेटर्स के लिए स्थापित करे निगरानी तंत्र
भारतीय राज्य तीन बराबर शाखाओं में विभाजित है- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। जब शक्तियों का यह विभाजन बरकरार रहता है, जब तीनों भूमिकाएं धुंधली नहीं पड़तीं, तब एक सक्षम और जवाबदेह राज्य बनाना आसान होता है। परंतु जीवन इतना सहज नहीं है। ऐसे हालात भी आते हैं जिनके बारे में राजनीतिक विचारकों ने कहा है […]
नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने के लिए बिजली क्षेत्र में सधी रणनीति की जरूरत
कार्बन (जीवाश्म ईंधन) का युग समाप्त होने को है। अब हम इस बात पर चर्चा कर सकते हैं कि भारत में जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल कब बंद होगा। परंतु वर्ष 2070 तक विशुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त करना है तो वर्ष 2050 तक कार्बन रहित ऊर्जा तंत्र मजबूती से खड़ा करना होगा। एक […]
डेरिवेटिव कारोबार पर नियंत्रण और अर्थव्यवस्था पर असर
आधुनिक एवं सक्षम बाजार अर्थव्यवस्था में मूल्य में होने वाले बदलाव की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच मिलने वाले संकेतों से मांग एवं आपूर्ति के मोर्चों पर हरकत होने लगती है। ये उतार-चढ़ाव दीर्घ अवधि में असहज एवं नुकसानदेह हो सकते हैं। मगर वित्तीय डेरिवेटिव बाजार ऐसे माध्यम तैयार करते हैं […]
भारत में नियामकीय सुधार का एजेंडा
सर्वशक्तिमान नियामक देश की अर्थव्यवस्था और नागरिकों के जीवन पर बहुत प्रभावकारी स्थिति में हैं। उनके संचालन में सुधार करना नई सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। बता रहे हैं के पी कृष्णन नियमन हमारे जीवन को हमारे सोच से अधिक प्रभावित करते हैं। हम नाश्ते पर जो कॉफी पीते हैं, बाहर जाने के लिए […]









