बढ़ते वैश्विक तापमान (ग्लोबल वार्मिंग) पर चर्चा 1990 के दशक की शुरुआत से चली आ रही है। कई दशकों तक इसका उल्लेख विभिन्न सम्मेलनों, संधियों और निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) रिपोर्ट तक ही सीमित रही। व्यावहारिक नजरिया रखने वाले लोगों ने अक्सर इसकी अनदेखी की। जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चिंता और इससे समाधान के लिए शुरू हुए प्रयासों का प्रभाव सबसे पहले वैश्विक वित्तीय प्रणाली के बदले हुए व्यवहार के रूप में दुनिया में दिखा।
भारतीय उद्योग जगत के दिग्गज उद्योगपतियों ने जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करनी शुरू कर दी क्योंकि वैश्विक वित्तीय ढांचे ने उन्हें इस बात का एहसास करा दिया कि मुनाफा बढ़ाने का रास्ता अब नवीकरणीय ऊर्जा से होकर गुजरता है। अब हम वास्तविक हालात पर हुए दूसरे बड़े असर के लिए तैयार हैं और वह है कार्बन सीमा शुल्क (कार्बन बॉर्डर टैक्स)। यह व्यवस्था दुनिया में कार्बन उत्सर्जन में कमी का सिलसिला तेज करेगी और बढ़ते वैश्विक तापमान पर अंकुश लगाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। चूंकि, भारत को ग्लोबल वार्मिंग से बहुत अधिक नुकसान होने की आशंका है इसलिए कार्बन सीमा शुल्क हमारे लिए अच्छी खबर है।
जनवरी 2026 में कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (सीबीएएम) यूरोपीय संघ (ईयू) में लागू होना शुरू हो जाएगा। इस तरह, वैश्विक व्यापार प्रणाली एक ऐसे बदलाव से गुजर रही है जिसमें प्रदूषण करने वाली कंपनियां सीधे तौर पर प्रभावित होंगी। सीबीएएम को ध्यान में रखते हुए भारत में भी कारोबारी रणनीति और व्यापार वार्ता में नए सिरे से बदलाव की जरूरत आन पड़ी है। कुछ समूहों में यह गलत धारणा बैठ गई है कि सीबीएएम संरक्षणवाद का ही एक रूप है। मगर इसे मूल्य वर्द्धित कर (वैट) के परिप्रेक्ष्य में देख कर यह धारणा दूर की जा सकती है। वैट एक गंतव्य-आधारित कर है। यह वहां लगाया जाता है जहां उपभोग होता है। इसमें कर तटस्थता का पहलू जुड़ा है यानी यूरोप के उत्पादकों और भारतीय उत्पादकों के साथ यूरोप में उत्पादों की बिक्री के वक्त समान व्यवहार किया जाता है।
सीबीएएम भी इसी तर्क के साथ कार्बन उत्सर्जन पर लागू होता है। ईयू में कार्बन के लिए एक स्थानीय मूल्य निर्धारित किया गया है। अगर कोई भारतीय कंपनी ईयू को इस्पात का निर्यात करती है और भारत में कार्बन शुल्क का भुगतान नहीं करती है तो ईयू अपने यहां प्रचलित कार्बन मूल्य और भारत में कार्बन मूल्य के बीच अंतर के समतुल्य शुल्क लगाता है। यह कर तटस्थता है क्योंकि यूरोपीय उत्पादकों और भारतीय उत्पादकों के साथ यूरोप में सामान बेचते समय समान व्यवहार किया जाता है। इसे संरक्षणवाद नहीं कहा जा सकता है।
वैट की तरह सीबीएएम पर भी तेजी से पहल हो रही है। ब्रिटेन ने पहले ही इस बारे में अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है। हमें उम्मीद है कि अन्य ओईसीडी राष्ट्र भी इसका पालन करेंगे। इससे व्यापार बाधा मानकर लड़ना एक बौद्धिक विफलता है। यह उतना ही बचकाना है जितना किसी व्यापार साझेदार से उसके देश में भारतीय विक्रेताओं के लिए आयात पर वैट से छूट देने के लिए कहना।
यह भारतीय कंपनियों के लिए एक नया ढांचा तैयार करता है। सीबीएएम से पूर्व दुनिया में कोई भी कंपनी ‘प्रदूषण हीरो’ हो सकती थी यानी वह अधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाले ईंधन का इस्तेमाल कर और बाहर से किसी दबाव का सामना किए बिना ऊंचा मुनाफा कमा सकती थी। इस्पात, सीमेंट और एल्यूमीनियम जैसे क्षेत्रों में मौजूदा बहीखाते इस खामी को दर्शाते हैं। भारतीय कंपनियां अपनी वैश्विक प्रतिस्पर्द्धियों से बेहतर दिखती हैं जिसका एक कारण यह भी है कि उनके मामले में प्रदूषण लागत का सही अनुमान नहीं लगाया जाता है।
ऊपर से दिखने वाले ये बहीखाते भ्रामक हैं। सीबीएएम देशों में सामान भेजते समय यह प्रदूषण सब्सिडी गायब हो जाती है। भारतीय निर्यातकों को अक्सर चीन के निर्यातकों की तुलना में नुकसान होता है। इसकी वजह यह है कि चीन में बिजली खपत में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी भारत की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक है। इससे चीन के उत्पादकों को स्वाभाविक रूप से कम अंतर्निहित कार्बन उत्सर्जन मिलता है। भारत में बिजली नीति की विफलताएं अब भारतीय निर्यातकों को नुकसान पहुंचा रही हैं।
वैश्विक व्यापार व्यवस्था इस समय दो गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। इनमें एक है डॉनल्ड ट्रंप और अमेरिका में सरकार की कमजोर क्षमता। दूसरी चुनौती सीबीएएम है। इन दोनों ही मामलों में गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। पहली चुनौती यानी अमेरिकी संरक्षणवाद का जवाब है साझेदारों की फेहरिस्त में विविधता लाना। ईयू का आकार लगभग अमेरिकी अर्थव्यवस्था के बराबर है। ईयू द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आजमाई गई नीतियों के साथ आज भी आगे बढ़ रहा है। भारत को ईयू के साथ एक मजबूत व्यापार समझौता करने की जरूरत है।
व्यापार वार्ताओं में बातचीत की पूंजी एक सीमित संसाधन होती है। हाल के वर्षों में ब्रिटेन के साथ बातचीत में पर्याप्त कूटनीतिक प्रयास हुए जिसका उद्देश्य कार्बन समायोजन से रियायत हासिल करना था। यह प्रयास गलत दिशा में किया गया था। एक मजबूत व्यापार समझौता तब तक नहीं हो सकता जब तक वैट या कार्बन सीमा मूल्य जैसे मूलभूत राजकोषीय सिद्धांत में अपवाद की गुंजाइश तलाशने की कोशिश की जाती रहेगी।
ब्रिटेन के साथ हुए समझौते ने सुर्खियां जरूर बटोरीं मगर यह एक ठोस व्यापार समझौता नहीं था। इस समझौते से बाजार उस रूप में एकीकृत नहीं हो पाया जिससे ऊंचे मूल्य के सौदों के आदान-प्रदान से संबंधित मतभेद दूर हो सकें। ईयू की ओर देखने से पहले हमें इस गलती से बचना चाहिए। ईयू के साथ एक मजबूत एवं टिकाऊ एफटीए करने के लिए हमें सीबीएएम को एक सीमा शर्त के रूप में स्वीकार करना होगा। ईयू से सीबीएएम को छोड़ने के लिए कहना भारतीय नीति निर्धारकों की स्थिति कमजोर बनाता है।
अगर ईयू कार्बन शुल्क लगाता है तो इससे प्राप्त राजस्व ब्रसेल्स को जाएगा। अगर भारत कार्बन शुल्क एकत्र करता है तो इससे हासिल राजस्व उसी के पास रहेगा और निर्यातकों को ईयू सीमा पर अतिरिक्त शुल्क नहीं देना पड़ेगा। लिहाजा, सीबीएएम का वाजिब जवाब एक घरेलू कार्बन मूल्य ढांचे का क्रियान्वयन है।
भारत ने कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (सीसीटीएस) की दिशा में कदम उठाए हैं। मंशा तो अच्छी है मगर इसके लिए जो तौर-तरीके तय किए जाएंगे उनमें सावधानी बरतने की आवश्यकता है।
उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (कैप-ऐंड-ट्रेड सिस्टम) कागजी तौर पर तो ठीक लग रही है मगर संस्थागत रूप से इसमें कुछ त्रुटियां नजर आ रही हैं। यह एक विकसित अर्थव्यवस्था की शैली वाली बौद्धिक क्षमता और सरकारी सक्षमता के लिए उपयुक्त है। अगर सरकार सीसीटीएस पर अडिग रहती है तो इसके बेहतर क्रियान्वयन की जरूरत होगी। एक सुचारू ढंग से चलने वाले कार्बन बाजार के लिए वित्तीय बाजार, लोक नीति, अर्थशास्त्र और अंतरराष्ट्रीय व्यापार कानून में गहरी जानकारी की आवश्यकता होती है। हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि किसी योजना की अधिसूचना जारी करने भर से समाधान निकल आता है। कार्बन कर एक बेहतर विकल्प है। यह प्रशासनिक लिहाज से भी सरल है। इसे जीएसटी के साथ अच्छे ढंग से जोड़ा जा सकता है। यह पूंजीगत व्यय की योजना तैयार करने वाली कंपनियों को मूल्य को लेकर भी आश्वस्त होने का अवसर देता है।
भारत के लिए खुश होने की वजह है और हमें खुश होना भी चाहिए। दुनिया कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन से लड़ने में कदम बढ़ा रही है। पहला चरण वित्तीय प्रणाली था जिसके तहत जीवाश्म ईंधन से मुंह मोड़ लिया गया और इसने भारत के सबसे शक्तिशाली कारोबारी दिग्गजों को पीछे धकेल दिया। अब दूसरा चरण सीबीएएम है। यह व्यवस्था एक मुश्किल वैश्विक हालात के बीच आई है जिसमें एक तरफ अमेरिका की संरक्षणवादी नीति तो दूसरी तरफ ईयू की नियामकीय सख्ती है।
इस स्थिति से निपटने के लिए बौद्धिक एवं वैचारिक स्तर पर स्पष्ट नजरिया अपनाने की जरूरत है। हमें कार्बन समायोजन को अनुचित व्यवहार के रूप में देखना बंद कर देना चाहिए और वैट की तरह ही इसका सम्मान करना चाहिए। यह कंपनियों के मुनाफे में ‘पल्यूशन हीरो’ मॉडल में हस्तक्षेप करेगा। हमें एक ऐसी व्यापार रणनीति की जरूरत है जो ईयू के साथ भारतीय बाजार को मजबूती से जोड़े। इसके साथ ही हमें एक घरेलू राजकोषीय रणनीति की भी जरूरत होगी जो एक सरल एवं मजबूत व्यवस्था, कार्बन कर के जरिये कार्बन मूल्य का आंतरिक स्तर पर निर्धारण करे।