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Editorial: केंद्र प्रायोजित योजनाओं की छंटनी पर जोर

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इसके पीछे इरादा यह है कि एक दूसरे का अतिक्रमण करने वाली योजनाओं का विलय किया जाए और क्रियान्वयन की दक्षता में सुधार किया जाए

Last Updated- January 08, 2026 | 10:05 PM IST
Nirmala Sitharaman

वित्त मंत्रालय ने सभी सरकारी विभागों और मंत्रालयों से कहा है कि वे केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित योजनाओं और केंद्रीय योजनाओं को तर्कसंगत बनाएं। इसके पीछे इरादा यह है कि एक दूसरे का अतिक्रमण करने वाली योजनाओं का विलय किया जाए और क्रियान्वयन की दक्षता में सुधार किया जाए। सरकार 54 केंद्र प्रायोजित योजनाएं चलाती है जबकि केंद्रीय योजनाओं की संख्या 260 है। योजनाओं के लाभ पर जहां विवाद हो सकता है वहीं यह कहना उचित ही होगा कि केंद्र सरकार कुछ ज्याद ही संख्या में योजनाओं का संचालन करती है जिससे शायद नतीजे प्रभावित होते हैं।

ऐसे में योजनाओं को जारी रखने के लिए समय-समय पर समीक्षा आवश्यक है। वर्ष 2016 के बजट में की गई घोषणा के मुताबिक योजनाओं को वित्त आयोग के चक्र के साथ सुसंगत किया गया और इसलिए योजनाओं की समय-समय पर समीक्षा आवश्यक है। चूंकि यह अभ्यास अभी किया जा रहा है इसलिए सरकार, विशेषकर वित्त मंत्रालय, को प्रत्येक योजना की सावधानीपूर्वक जांच करने की सलाह दी जाएगी।

योजनाओं, खासकर केंद्र प्रायोजित योजनाओं की समीक्षा के पक्ष में कई तर्क हो सकते हैं। हालिया बदलावों की आलोचना में एक यह है कि विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025 जो एक केंद्र प्रायोजित योजना है, उसके तहत दिए जाने वाले ग्रामीण रोजगार गांरटी कार्यक्रम में राज्यों पर अतिरिक्त राजकोषीय बोझ बढ़ गया है। अब राज्य सरकारों को योजना के व्यय में 40 फीसदी हिस्सेदारी करनी होगी। पुरानी योजना एक केंद्रीय योजना थी और उसे काफी हद तक केंद्र सरकार फंड करती थी। कई राज्य शायद इस हालत में ही न हों कि वे व्यय बढ़ा सकें।

केंद्र प्रायोजित योजनाएं जहां केंद्र द्वारा बनाई जाती हैं, वहीं उन्हें आंशिक फंडिंग राज्य भी करते हैं। इससे राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता पर असर पड़ता है। शायद वे उन योजनाओं पर अधिक व्यय न कर सकें जिन पर करना चाहते हैं। इस बात को रिजर्व बैंक ने भी राज्यों के वित्त संबंधी अपने अध्ययन में जाहिर किया है। दिसंबर 2024 के रिजर्व बैंक के अध्ययन में कहा गया है, ‘बहुत ज्यादा केंद्रीय योजनाएं राज्य सरकारों के व्यय के लचीलेपन को समाप्त करती हैं और सहकारी राजकोषीय संघवाद की भावना को क्षति पहुंचाती हैं।’

इस प्रकार, केंद्र प्रायोजित योजनाओं को तर्कसंगत बनाना संघ और राज्य दोनों स्तरों पर वित्तीय गुंजाइश को संभावित रूप से सुधार सकता है, जिससे समग्र व्यय दक्षता बढ़ सकती है। इसके अलावा, भारतीय राज्य विकास के विभिन्न स्तरों पर हैं और उनकी आवश्यकताएं भी अलग-अलग हैं। उदाहरण के लिए, शिक्षा क्षेत्र में जो किया जाना चाहिए, वह उत्तर भारतीय राज्यों में दक्षिणी राज्यों की तुलना में बहुत भिन्न हो सकता है।

राज्य सरकारें राज्य-स्तरीय चुनौतियों से निपटने के लिए बेहतर रूप से सक्षम हैं। इसके अतिरिक्त, ऐसी योजनाओं में अक्सर श्रेय लेने के लिए अनावश्यक राजनीतिक खींचतान होती है। बेहतर परिणामों के लिए, अधिकांश विकासात्मक और सामाजिक क्षेत्र की योजनाएं राज्य सरकारों द्वारा ही तैयार और संचालित की जानी चाहिए क्योंकि वे ऐसा करने की बेहतर स्थिति में हैं।

इस प्रकार, राज्यों के लिए अधिक वित्तीय सशक्तीकरण का मामला बनता है। बदले में राज्य सरकारों को स्थानीय निकायों को सशक्त करना चाहिए। यह देखना दिलचस्प होगा कि सोलहवें वित्त आयोग ने इस मुद्दे को कैसे संबोधित किया है। व्यापक नीतिगत स्तर पर इस बात पर बहस हो सकती है कि क्या भारत को तेज वृद्धि और विकास हासिल करने के लिए राजकोषीय संसाधनों के आवंटन पर पुनर्विचार करना चाहिए। इस संदर्भ में यह चर्चा करनी भी आवश्यक है कि राज्य सरकारें अपने वित्त का प्रबंधन कैसे करें। कई राज्यों पर भारी कर्ज है लेकिन यह उन्हें लोकलुभावन योजनाएं शुरू करने से नहीं रोक रहा है।

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First Published - January 8, 2026 | 9:58 PM IST

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