जब अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति ने पश्चिमी गोलार्ध में अपने लक्ष्यों को ‘एनलिस्ट ऐंड एक्सपैंड’ (सूचीबद्ध और विस्तारित करना) के रूप में रेखांकित किया, तो दुनिया ने इसकी गंभीरता और तेजी की कल्पना भी नहीं की थी। घोषणा के मुताबिक ही ट्रंप ने अमेरिकी सैन्य लक्ष्य को आसपास के क्षेत्रों में दोबारा केंद्रित किया और ऑपरेशन एब्सॉल्यूट रिजाल्व के माध्यम से वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को उनके देश से एक तरह से अगवा कर लिया।
ट्रंप काफी समय से वेनेजुएला को निशाने पर लिए हुए थे। मादुरो को अपना लक्ष्य बनाते हुए उन्होंने कराकस के पास अमेरिका की सबसे बड़ी नौसैनिक टुकड़ियों में से एक को तैनात किया था और उस देश के भीतर घातक अभियानों को अंजाम देने के लिए केंद्रीय खुफिया एजेंसी (सीआईए) को अधिकृत किया। परंतु अमेरिका की ताजा कार्रवाई ने खुद अमेरिका में और दूसरे देशों में चिंता बढ़ा दी है।
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इस अभियान की वैधता से जुड़े सवालों ने देशों को एक या दूसरे पक्ष में खड़ा कर दिया है। अमेरिकी कांग्रेस को जल्दी ही प्रमुख संवैधानिक और निगरानी संबंधी प्रश्नों का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि सांसद विभाजित दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका की विकसित होती महा-रणनीति पर मोनरो सिद्धांत में एक नए ट्रंप-शैली के मोड़ का भय गहराई से मंडरा रहा है, जिससे नए देशों और जगहों पर अमेरिकी प्रभाव नए सिरे से परिभाषित हो सकता है।
सबसे अहम प्रश्न अमेरिका के भविष्य से जुड़ा है और अमेरिका की विदेश नीति अब शायद ट्रंप की रणनीतिक घोषणाओं को लागू करने का माध्यम बन गई है, जबकि उसे पहले कई लोग काफी समय तक लागू न किए जाने लायक राजनीतिक सनक घोषित करते रहे हैं।
वेनेजुएला में ट्रंप के कदम मुख्य रूप से तीन बातों पर केंद्रित हैं। पहला मादक पदार्थ विरोधी कार्रवाई का तर्क। दूसरा वेनेजुएला का विशाल तेल भंडार, लीथियम और अन्य संसाधन जो उसे दुनिया में बहुत महत्त्वपूर्ण बनाते हैं। और तीसरा, पश्चिमी गोलार्ध की ओर एक नवीनीकृत रणनीतिक झुकाव जो दर्शाता है कि अमेरिका अपने पास-पड़ोस में भी अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सैन्य कार्रवाई करने को तैयार है।
मादक पदार्थों के विरुद्ध कार्रवाई और अभियान वेनेजुएला के समुद्री इलाकों के आसपास लगातार बढ़ रहे हैं, जो अटलांटिक से लेकर प्रशांत महासागर तक फैले हुए हैं। ट्रंप प्रशासन का मादक पदार्थ-निरोधी तर्क अपनी सैन्य कार्रवाइयों को सीधे सैन्य आक्रमण के बजाय कानून प्रवर्तन के दायरे में रखने के लिए तैयार किया गया है। यह ढांचा अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कितना टिकाऊ साबित होता है, यह देखना बाकी है। विशेषकर अमेरिका और विश्व स्तर पर सामने आ रही प्रतिक्रियाओं को देखते हुए। न्याय विभाग की मौन स्वीकृति और 1989 से ऐतिहासिक कानूनी नजीर जब अमेरिका ने पनामा में मैनुएल नॉरिएगा को निकालने के लिए ऐसी ही कार्रवाई की थी, उसे औचित्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है। हालांकि तब हालात अलग थे।
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ट्रंप प्रशासन का कहना है कि अब अमेरिका वेनेजुएला का प्रभारी है। मादुरो को हटाना एक सोचा-समझा कदम प्रतीत होता है, जिसे संपूर्ण सत्ता परिवर्तन से बचने के लिए डिजाइन किया गया है। राजनीतिक नेता को पकड़कर, जबकि उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज को छोड़ दिया गया है, ऐसा लगता है कि अमेरिका अधिक उग्र राजनीतिक बदलाव के बाद उत्पन्न होने वाली अस्थिरता से बचना चाहता है। मादुरो के उत्तराधिकारी के रूप में मारिया कोरीना मचाडो को स्थापित न करना यह दिखाता है कि संभावित नतीजों का आकलन कर सतर्कता बरती गई है। इनमें वेनेजुएला के भीतर राजनीतिक असहमति और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया से लेकर गृहयुद्ध के जोखिम और देश के भीतर विखंडित कमांड संरचनाओं जैसे नतीजे शामिल हैं।
सैन्य कार्रवाई की सीमित प्रकृति ने आसपास के देशों और व्यापक अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सावधानीपूर्वक अपनी स्थिति तय करने का अवसर दिया है, जिसमें वे ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की आलोचना को अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और संयुक्त राष्ट्र चार्टर में निहित सिद्धांतों के समर्थन के साथ संतुलित कर रहे हैं। क्यूबा, कोलंबिया, ब्राजील और मेक्सिको जैसे आसपास के देशों ने अमेरिकी कार्रवाइयों की आलोचना की है, जबकि यूरोप ने अधिक सतर्क रुख अपनाया है और कड़ी निंदा से परहेज किया है।
वैश्विक प्रतिक्रियाएं यह आकलन करने में भी अहम हैं कि न केवल वेनेजुएला के लिए बल्कि व्यापक क्षेत्र और उससे परे, ट्रंप की विस्तृत होती विदेश नीति की रूपरेखा के तहत आगे क्या होगा। ट्रंप ने कोलंबिया और ईरान को भी धमकी दी है और उनके खिलाफ कदम उठाने के संकेत दिए हैं। ताकत के इस्तेमाल का यह बढ़ता सिलसिला वैश्विक समुदाय के लिए अत्यधिक चिंताजनक है। ईरान में इस्लामिक शासन के खिलाफ प्रदर्शन जारी हैं, ऐसे में पश्चिम एशिया में एक नई सैन्य कार्रवाई से इनकार नहीं किया जा सकता है।
भले ही ट्रंप एक ही समय में व्यापारिक संपर्क को फिर से शुरू करने और अब्राहम समझौते के दूसरे चरण को पुनर्जीवित करने की ओर संकेत करते हैं लेकिन ईरान के क्षेत्रीय सहयोगी कमजोर हो चुके हैं और गाजा की स्थिति अब भी अनसुलझी है, ऐसे में यह क्षेत्र आगे अमेरिकी हस्तक्षेप के लिए एक माकूल स्थान हो सकता है।
ट्रंप प्रशासन ने वेनेजुएला के नेता को हटाकर भले ही अपना तात्कालिक उद्देश्य हासिल कर लिया हो लेकिन बड़ी चुनौती अभी आगे है। अमेरिका वेनेजुएला के बाकी राजनीतिक ढांचे के साथ कैसा रिश्ता कायम करता है, उसके साथ कैसे जुड़ता है, क्षेत्रीय प्रतिक्रियाओं का प्रबंधन कैसे करता है, और शक्ति को वैधता के साथ कैसे संतुलित करता है, यही बातें तय करेंगी कि यह घटना केवल शक्ति का एक बारगी प्रदर्शन है या अमेरिकी वैश्विक रणनीति में एक अधिक दबावपूर्ण चरण की शुरुआत।
इससे वैश्विक समुदाय, विशेषकर भारत और विकासशील देश रणनीतिक अनिश्चितता के किनारे पर खड़े हैं। क्षेत्रीय स्थिरता, तनाव बढ़ने, आपूर्ति श्रृंखलाओं और संपर्क व्यवधानों को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। भारत ने वेनेजुएला पर सावधान रुख अपनाया है, चिंता व्यक्त की है और संकट का कूटनीतिक समाधान तलाशने का आह्वान किया है।
(लेखक क्रमशः ओआरएफ में उपाध्यक्ष और फेलो (अमेरिका) हैं। ये उनके निजी विचार हैं)