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स्मॉल फाइनेंस बैंकों को लेकर नवाचार की है दरकार

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लघु वित्त बैंक सक्षम हैं और अच्छी तरह काम कर रहे हैं लेकिन क्या इनसे समावेशन के एजेंडे को आगे बढ़ाने में मदद मिली है। सवाल उठा रहे हैं एमएस श्रीराम

Last Updated- January 16, 2026 | 10:53 PM IST
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इलस्ट्रेशन- अजय मोहंती

लघु वित्त बैंक यानी एसएफबी को लाइसेंस देने की प्रक्रिया शुरू हुए एक दशक से अधिक वक्त बीत चुका है। स्थायित्व और अस्तित्व की दृष्टि से, लघु वित्त बैंकों ने अन्य बैंकों की तुलना में कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है। वर्ष 1991 के सुधारों के बाद, भारतीय रिजर्व बैंक निजी क्षेत्र के बैंकों को लाइसेंस देने के लिए तैयार हुआ और कई लाइसेंस जारी किए गए। कुल मिलाकर बैंकों के लिए तीन चरणों में 14 लाइसेंस दिए गए। इनमें से पहले चरण के 10 बैंकों में से तीन का अन्य बैंकों के साथ विलय हो गया। अगले दो चरणों में दिए गए चार लाइसेंसों में से एक बैंक को अपने व्यापार मॉडल और नैतिक ढांचे में गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा।

इसी प्रकार, 1996 के बजट भाषण में नए स्थानीय क्षेत्रीय बैंकों (एलएबी) की घोषणा के बाद पांच वर्षों में 10 सैद्धांतिक लाइसेंस जारी किए गए। इनमें से केवल छह ने संचालन शुरू किया और दो जल्दी ही बंद हो गए। शेष चार में से केवल दो ही अस्तित्व में हैं। जिनमें से एक सफलतापूर्वक एसएफबी में बदल गया और दूसरा संचालन बंद कर चुका है। लघु वित्त बैंकों के साथ ही भुगतान बैंकों के लिए सैद्धांतिक रूप से 11 लाइसेंस जारी किए गए थे। उनमें से एक को लघु वित्त बैंक में रूपांतरण का सैद्धांतिक लाइसेंस मिला जबकि शेष केवल चार संचालन कर रहे हैं। रिजर्व बैंक नए भुगतान बैंकों और एलएबी के लाइसेंस नहीं जारी कर रहा है।

अन्य श्रेणियों के बैंकों की यदाकदा कामयाबी को देखते हुए कह सकते हैं कि लघु वित्त बैंक काफी कामयाब रहे हैं। सभी सैद्धांतिक लाइसेंस वाले परिचालन कर रहे हैं। फिनकेयर लघु वित्त बैंक ने सहजता से एयू लघु वित्त बैंक में विलय कर लिया। बाद में दो और लघु वित्त बैंक लाइसेंस जारी किए गए। इन वर्षों में किसी लघु वित्त बैंक में कोई संकट नहीं आया।

रिजर्व बैंक द्वारा 17 जुलाई, 2014 को जारी मसौदा दिशानिर्देशों में लघु बैंकों की स्थापना की कल्पना की गई थी, जिनका संचालन सीमित क्षेत्रों में हो, ताकि स्थानीय अनुभव प्राप्त हो सके। इसका उद्देश्य तय भौगोलिक विकास और वित्तीय समावेशन को गहरा करना था। 27 नवंबर, 2014 तक, दिशानिर्देशों में संशोधन कर ऐसे लघु वित्त बैंकों की स्थापना का प्रावधान किया गया, जिनके संचालन क्षेत्र पर कोई प्रतिबंध नहीं था। दिशानिर्देशों में कहा गया था कि उन आवेदकों के वरीयता दी जाएगी जो प्रारंभिक चरण में बैंक की स्थापना कम-बैंकिंग वाले राज्यों/जिलों के समूह में करें, जैसे कि देश के पूर्वोत्तर, पूर्व और मध्य क्षेत्र।

मूल दिशानिर्देशों में क्षेत्रीय फोकस अंतिम दिशानिर्देशों में एक सुझाई गई प्राथमिकता बन गया। अंतिम दिशानिर्देशों में अन्य आवश्यकताएं भी थीं कि बैंक अपने समायोजित शुद्ध बैंक ऋण (एएनबीसी) का 75 फीसदी प्राथमिकता क्षेत्र को देंगे, और उनके ऋण खातों में 50 फीसदी हिस्सा 25 लाख रुपये से कम के ऋण का होगा। लघु वित्त बैंकों का एक उद्देश्य था मुख्य रूप से आबादी के उस हिस्से को बचत साधन उपलब्ध कराना जो अब तक सेवाओं से वंचित या कम सेवा उपलब्धता वाला रहा है। साथ ही प्रौद्योगिकी-आधारित कम लागत वाले संचालन के माध्यम से ऋण प्रदान करना।

लघु बैंक से लघु वित्त बैंक में बदलाव रिजर्व बैंक को सूक्ष्म वित्त लॉबी से मिली राय के आधार पर किया गया। इनमें से अधिकांश सूक्ष्म वित्त संस्थान देश भर में संचालित हैं और वे खुद को बैंकों में बदलना चाहते थे। क्या लघु वित्त बैंक दिशानिर्देशों में तय लक्ष्यों को पा सके? इन बैंकों के 99 फीसदी से अधिक खाते 25 लाख रुपये से कम के ऋणों के हैं। ये मार्च 2025 तक स्वीकृत कुल ऋण सीमा का लगभग 75 फीसदी हैं। यदि हम आंकड़ों को और गहराई से देखें, तो लगभग 92 फीसदी खातों का टिकट साइज यानी रकम 2 लाख रुपये से कम है। ऋणों का औसत टिकट साइज सबसे छोटा है, यहां तक कि समावेशन मानक पर राज्य-स्वामित्व वाले क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी) से भी छोटा।

केंद्रीय, पूर्वी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों पर ध्यान देने के मामले में, लघु वित्त बैंकों ने बैंकिंग औसत से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है। जहां आरआरबी ने केंद्रीय क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है, वहीं पूर्वोत्तर में लघु वित्त बैंक के आंकड़े असाधारण हैं, संभवतः इसलिए भी कि एक लाइसेंसधारी वहीं से है। वास्तव में, यह प्रश्न उठता है कि क्या क्षेत्रीय फोकस वाले लघु बैंकों की मूल रूपरेखा बेहतर होती। बहरहाल, समग्र रूप से, ऋण के मामले में, उद्देश्यों को अपेक्षा से अधिक हासिल किया गया है। हालांकि, जमा की बात करें तो लघु वित्त बैंक बहुत अधिक पकड़ नहीं बना सके। उनका लगभग 45 फीसदी जमा संस्थानों से आता है जिसमें वित्तीय संस्थान शामिल हैं। दूसरी ओर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का 93 फीसदी जमा आम परिवारों से आता है। इसमें भी महिलाओं का जमा पुरुषों से काफी कम है और उसकी तुलना सरकारी बैंकों द्वारा जुटाए गए जमा से की जा सकती है।

इस आधार पर हम कह सकते हैं कि लघु वित्त बैंकों का प्रदर्शन ऋण के मोर्चे पर अच्छा रहा है। 10 में से करीब 8 लघु वित्त बैंक अपने पुराने रूप में यानी सूक्ष्म वित्त संस्थान के रूप में भी ऐसा करते थे। सवाल यह है कि क्या इन बैंकों ने अपने पुराने अवतार से किसी भी मायने में बेहतर प्रदर्शन किया? बचत के क्षेत्र में उन्होंने कुछ भी अनूठा नहीं किया। खासतौर पर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों से तुलना करने पर। ऋण की लागत भी सूक्ष्म वित्त संस्थानों से खास अलग नहीं है। ऐसे में भले ही लघु वित्त बैंक अच्छा काम कर रहे हैं किंतु हमें यह पूछना होगा कि क्या समावेशन के एजेंडे पर वे सूक्ष्म वित्त संस्थानों से कुछ बेहतर कर पाए।

इस बारे में जब रिजर्व बैंक ने हाल ही में प्राथमिकता-क्षेत्र के दायित्वों की आवश्यकता को एएनबीसी के 75 फीसदी से घटाकर 60 फीसदी कर दिया, तो यह प्रश्न उठता है कि क्या नियामक लघु वित्त बैंकों में समावेशन को आगे बढ़ाने के बजाय उन्हें सार्वभौमिक बैंकों की ओर ले जा रहा है। यह समझा जा सकता है कि रिजर्व बैंक ने बचत के संबंध में समावेशन मानकों पर सख्ती नहीं की है, क्योंकि वह बचत के क्षेत्र में किसी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहता। लेकिन क्या लघु वित्त बैंक मॉडल वास्तव में सूक्ष्म वित्त संस्थानों से अलग है? यह विचार करने योग्य प्रश्न है।


(लेखक भारतीय प्रबंध संस्थान बेंगलूरु के लोक नीति केंद्र में प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - January 16, 2026 | 9:30 PM IST

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