भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा पेटीएम पेमेंट्स बैंक का लाइसेंस रद्द करने के निर्णय के साथ ही हमारे लिए यह आवश्यक हो गया है कि हम रिजर्व बैंक की विभिन्न पहलों पर नजर डालें, इस पहल के इरादे को परखें और देखें कि इसे कैसे डिजाइन किया गया था। यह हमें यह समझने का अवसर देगा कि क्यों अक्सर ‘लबों तक आते-आते प्याला फिसल जाता है’ यानी जब सफलता बहुत करीब हो, तब भी चीजें गलत हो सकती हैं, इसलिए समझदारी इसी में है कि हम काम पूरा होने तक इंतजार करें और फिर जश्न मनाएं। जब तक डिजाइन उद्देश्य के अनुकूल न हो, कोई भी व्यक्ति अपनी मंशा पूरी नहीं कर सकता। अभी हम तीन पहलों पर चर्चा करते हैं।
1990 के दशक के मध्य में, जब बैंकिंग क्षेत्र निजी क्षेत्र के लिए खोला गया, तब रिजर्व बैंक ने स्थानीय क्षेत्रीय बैंकों (एलएबी) को खोलने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए। इन एलएबी का संचालन क्षेत्र तीन सटे हुए जिलों तक सीमित था। प्रत्येक जिले के मुख्यालय में केवल एक शाखा खोली जा सकती थी और अन्य सभी शाखाएं गांवों और कस्बाई क्षेत्रों में स्थापित की जानी थीं। इनकी पूंजी आवश्यकताएं कम थीं। एलएबी निजी क्षेत्र के लिए एक विकल्प थे ताकि वे 1975 में शुरू हुए क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी) से प्रतिस्पर्धा कर सकें। आरआरबी और एलएबी दोनों का मुख्य उद्देश्य बाजार का विकास था जबकि वाणिज्यिक लाभ द्वितीयक उद्देश्य था।
इसका परिणाम जाना पहचाना था। इसके कई आवेदक थे। जो 10 सैद्धांतिक लाइसेंस दिए गए उनमें से केवल छह ने परिचालन शुरू किए। इन छह में से आज केवल दो संचालित हो रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या एलएबी का डिजाइन सही था? क्योंकि इनका परिचालन क्षेत्र सीमित था।
तब तक के आंकड़े यह संकेत तो नहीं देते थे कि इसी तरह के प्रारूप में काम करने वाले ग्रामीण बैंकों ने सफलता का सूत्र खोज लिया है और वे इतने लाभदायक हो गए हैं कि निजी क्षेत्र का निवेश आकर्षित कर सकें। आज भी सीमित क्षेत्र का प्रयोग केवल उन्हीं स्थानों पर सफल है जहां आर्थिक गतिविधि सशक्त है। ऐसा प्रारूप पूरी तरह राज्य के क्षेत्राधिकार में आता है। सरकार इन बैंकों को बार-बार पूंजी दे सकती है और उन्हें चालू रख सकती है, भले ही वे वाणिज्यिक लाभ न कमा रहे हों, क्योंकि उनका उद्देश्य बाजार विकास है।
इसके साथ ही बाजार, विकास के सिद्धांतों पर नहीं चलता। यह इस बात से समझ सकते हैं कि बाजार नए बैंकों के लाइसेंस पाने के लिए कितना उत्सुक था जबकि रिजर्व बैंक ने एलएबी के लिए आगे कोई लाइसेंस जारी नहीं किया। दो नवोदित बैंक अलग श्रेणी के रूप में चलते रहे, जिससे नियामकीय बोझ बढ़ा। अब समय आ गया है कि केंद्रीय बैंक यह स्वीकार करे कि एलएबी का प्रयोग असफल रहा और इन बैंकों का विलय किसी इच्छुक पक्ष के साथ कर दे। इस मामले में डिजाइन की खामी यह थी कि अधिकतम लाभ करने वाले मॉडल को ऐसे बाजार में रखा गया जो सीमित था। विकास में भौगोलिक बाधाएं, उच्च संकेन्द्रण और सह विसंगति का जोखिम। राज्य ऐसे जोखिमों को वहन कर सकता है, लेकिन बाजार नहीं।
आरआरबी के एकीकरण और ‘एक राज्य-एक आरआरबी’ की ओर बढ़ने से यह दिखता है कि राज्य भी बाजार विकास की लागत वहन करने को तैयार नहीं है और बड़े संचालन क्षेत्र देकर इसे क्रॉस-सब्सिडी करना पसंद करता है।
दूसरा मॉडल है पेमेंट्स बैंक। इनके पास स्पष्ट राजस्व मॉडल नहीं है। ये जनता से जमा स्वीकार कर सकते हैं लेकिन ऋण नहीं दे सकते। इन्हें निवेश करके ही पैसा कमाना होता है। एक अर्थ में ये म्युचुअल फंड जैसे हैं, लेकिन बाजार में कारोबार का लचीलापन इनके पास नहीं है क्योंकि ये बैंक हैं। इनकी एकमात्र आय प्रेषण (रेमिटेंस) से हो सकती थी, जिसे यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) ने समाप्त कर दिया। तो फिर 42 संस्थाओं ने बैंकिंग लाइसेंस के लिए आवेदन क्यों किया? संभवतः इसके पीछे विचार यह था कि लेनदेन के आंकड़ों का उपयोग दूसरों को ऋण देने के लिए ग्राहक सुझाने में किया जा सकता है। यानी राजस्व मॉडल डेटा था न कि विशुद्ध बैंकिंग।
यह जटिल है, क्योंकि डेटा उपयोग, शोषणकारी ऋण और डेटा गोपनीयता पर मानदंड लगातार बदल रहे हैं। आश्चर्य नहीं कि 11 लाइसेंस जारी होने के बावजूद तीन तो जल्द ही पीछे हट गए। शेष आठ में से पांच का कारोबार अब भी जारी हैं। इनमें से एक खुद को छोटे वित्त बैंक (स्माॅल फाइनैंस बैंक या एसएफबी) में बदलने की कोशिश कर रहा है। अन्य अपने बड़े समूह व्यवसायों में गहराई से जुड़े हुए हैं और एसएफबी बनने की उम्मीद भी नहीं कर सकते। केवल एक स्वतंत्र प्रतिभागी एसएफबी बनने की कोशिश कर रहा है।
पेमेंट्स बैंकों के मामले में यह स्पष्ट था कि उनका व्यापार मॉडल कभी भी ग्राहक के साथ मूल लेनदेन पर आधारित नहीं था। इस मॉडल का दबाव में आना तय था और अंततः असफल होना भी। जबकि इसे भुगतान का समाधान कहा गया। यह किसी भी भुगतान एग्रीगेटर से बेहतर सेवा नहीं दे पाया और जनता की जमा राशि के लिए बेहतर और सुरक्षित विकल्प मौजूद थे।
दशकों तक रेजुडियरी यानी अवशिष्ट गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (आरएनबीएफसी जिनमें सहारा सबसे प्रमुख थी) चलाने के बाद और उन्हें बंद करने से पहले रिजर्व बैंक को उस अनुभव से सीख लेनी चाहिए थी। पेमेंट्स बैंक अपने व्यवसाय के एक पक्ष यानी जमा लेने के मामले में आरएनबीएफसी से अलग नहीं थे।
लेकिन आरएनबीएफसी के मामले में नियम यह था कि उन्हें एकत्रित जमा का 80 फीसदी सुरक्षित सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करना होता था, जिससे उन्हें छह महीने का अतिरिक्त नकदी प्रवाह मिलता और शेष 20 फीसदी जमा को ऋण देने और कमाई करने के लिए उपयोग किया जा सकता था। सहारा जैसी संस्थाएं गरीब ग्राहकों द्वारा नियमों का पालन न करने पर उनकी जमा राशि जब्त करने पर भी निर्भर करती थीं, जिससे उन्हें अतिरिक्त सुरक्षा मिलती थी। पेमेंट्स बैंकों के पास तो ऐसा लाभ भी नहीं था।
तीसरा व्यवसाय जहां रिजर्व बैंक ने नियमन में चुस्ती दिखाई, वह पीयर-टू-पीयर (पी2पी) लेंडिंग मॉडल था। पी2पी प्लेटफॉर्म में कोई व्यावसायिक तर्क नहीं है जब तक कि इसे डेटा बेस के रूप में उपयोग न किया जाए। पी2पी प्लेटफॉर्म को ऋणदाताओं (बचतकर्ताओं) और उधारकर्ताओं के बीच क्लियरिंग हाउस के रूप में काम करने की उम्मीद की जाती है तथा मध्यस्थता केवल डेटा और आकलन पर आधारित होती है। इसका अर्थ है कि एक व्यक्तिगत निवेशक किसी ऐसे व्यक्ति को ऋण देने का निर्णय ले रहा है जिसे वह नहीं जानता। वह ऐसा केवल उस जानकारी के आधार पर कर रहा है जो एक मध्यस्थ द्वारा दी गई है और जो देनदारी में चूक का जोखिम शुल्क लेकर बचतकर्ता पर डाल रहा है। यह मॉडल बड़े पैमाने पर कैसे कारगर हो सकता है?
ऐसे प्रयोग का स्वागत है और हमें नए रोचक मॉडल आजमाने चाहिए। लेकिन नियामक के रूप में रिजर्व बैंक को शायद पारंपरिक प्रश्न पूछने चाहिए। यह कैसे काम करता है? क्या यह इतना सरल है कि बड़ी संख्या में लोग इसे समझ सकें? क्या राजस्व मॉडल स्पष्ट है, या किसी और चीज में छिपा हुआ है? सहकारी बैंकों की क्षमता बढ़ाने वाली ‘सक्षम’ नामक नई पहल की घोषणा के साथ डर यह है कि रिजर्व बैंक नए सहकारी बैंकों के लिए नए लाइसेंस भी खोल सकता है। हम इसकी समीक्षा एक दशक बाद करेंगे! कभी-कभी पुराना ढंग अपनाना ही बेहतर होता है।
(लेखक भारतीय प्रबंध संस्थान बेंगलूरु के सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी में प्रोफेसर हैं)