होर्मुज स्ट्रेट की लगातार नाकाबंदी और ट्रंप द्वारा लगाए गए शुल्क के कारण बाहरी क्षेत्र पर जो दबाव बना है उसे देखते हुए भारत के लिए यह महत्त्वपूर्ण है कि वह मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) के माध्यम से अपने बाजार विविधता के प्रयासों को गति प्रदान करे। खासकर वे जो उसने ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ किए हैं। अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को भी तार्किक निष्कर्ष तक ले जाना आवश्यक है। हालांकि दोनों ही मामलों में कुछ चुनौतियां हैं।
अमेरिका के साथ बातचीत फिर से शुरू हो गई हैं। ऐसे में कई कारक परिणामों पर अनिश्चितता की छाया डालते रहेंगे। सबसे प्रमुख बात यह कि 7 फरवरी को घोषित अंतरिम व्यापार समझौते के ढांचे का आधार यानी 25 फीसदी जवाबी शुल्क अमान्य हो गया है क्योंकि अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम (आईईईपीए) के तहत लगाए गए शुल्क को पलट दिया है। अमेरिकी व्यापार अधिनियम की धारा 122 के तहत सभी व्यापार भागीदारों पर लगाया गया 10 फीसदी का समान शुल्क 24 जुलाई को समाप्त होने वाला है।
दिलचस्प बात यह है कि यह कानूनी जांच का सामना भी कर रहा है, क्योंकि अमेरिका फिलहाल किसी ‘भुगतान संतुलन’ संकट का सामना नहीं कर रहा है, जो धारा 122 के तहत शुल्क लगाने की आवश्यक शर्त है।
जवाबी शुल्क की जगह अमेरिका ने अमेरिकी व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत ‘अनुचित व्यापार प्रथाओं’ पर त्वरित आधार पर जांच शुरू की है, जो कई व्यापार भागीदारों को लक्षित करती है। भारत को ‘औद्योगिक अतिरिक्त क्षमता’ और ‘बंधुआ मजदूरी’ के लिए इन जांचों में शामिल किया गया है। भारत ने इस महीने की शुरुआत में अमेरिका को अपनी लिखित टिप्पणियों में एक सशक्त जवाब दिया है। भारत को इसे चल रही व्यापार समझौता वार्ताओं में प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाना होगा।
यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि धारा 301 के तहत, यदि जांच व्यापार भागीदार की भेदभावपूर्ण व्यापार प्रथाओं की पुष्टि करती है, तो अमेरिका आयात प्रतिबंधों और व्यापार समझौता रियायतों की वापसी या निलंबन सहित बहुत व्यापक सुधारात्मक कार्रवाइयां लागू कर सकता है।
इस धारा के तहत लगाए गए शुल्क पर धारा 122 जैसी सीमा नहीं होती, और इस अधिनियम के तहत अमेरिका की कार्रवाई की अवधि चार वर्ष तय है लेकिन उसे कांग्रेस की मंजूरी के बिना भी आगे बढ़ाया जा सकता है। इस संदर्भ में यह याद करना उपयोगी होगा कि ट्रंप द्वारा राष्ट्रपति पद के पहले कार्यकाल के दौरान चीन पर धारा 301 के तहत लगाए गए शुल्क न केवल राष्ट्रपति जो बाइडन द्वारा बरकरार रखे गए थे, बल्कि उन्हें सेमीकंडक्टर और सौर पैनलों जैसे अन्य रणनीतिक अमेरिकी आयात तक भी विस्तारित किया गया था।
धारा 232, जिसके तहत अमेरिका पहले ही इस्पात और एल्युमीनियम पर उच्च शुल्क लगा चुका है, उसे इन धातुओं से बनी चीजों तक भी विस्तारित कर दिया गया है। सेमीकंडक्टर और औषधियों के लिए भी नई जांच शुरू की गई है। अमेरिका के साथ चल रही वार्ताओं में भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि इन वस्तुओं पर भविष्य में उच्च शुल्क की संभावनाओं के विरुद्ध रियायतें प्राप्त हों, क्योंकि ये मौजूदा और संभावित निर्यात संभावनाओं के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
उदाहरण के लिए, दक्षिण कोरिया ने पिछले वर्ष अमेरिका के साथ अपने व्यापार समझौते में धारा 232 की वस्तुओं पर पूर्व रियायतें हासिल करने में सफलता पाई। ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ एफटीए, यद्यपि गहरे और संभावित रूप से लाभकारी हैं, निर्यातकों को कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (सीबीएएम) के प्रतिकूल प्रभाव से निपटने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा।
ब्रिटेन 1 जनवरी, 2027 से छह वस्तुओं पर सीबीएएम लागू करेगा। ये हैं एल्युमीनियम, सीमेंट, उर्वरक, हाइड्रोजन, और लोहा व इस्पात। भारत-यूके एफटीए जिसे अगले महीने लागू किया जाना है उसमें सीबीएएम पर कोई प्रावधान शामिल नहीं है, लेकिन बताया गया है कि भारत ने एक ‘रीबैलेंसिंग मैकेनिज्म’ पर बातचीत की है जिसके विवरण ज्ञात नहीं हैं। हालांकि, चूंकि ब्रिटेन के आयातकों को कार्बन उत्सर्जन के लिए वास्तविक सत्यापित डेटा या सरकारी डिफॉल्ट मान का उपयोग करने का विकल्प मिलेगा, सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सत्यापकों की संख्या बढ़ाने में मदद करनी चाहिए ताकि भारत के निर्यात को आसान और बेहतर बनाया जा सके।
यह विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए प्रासंगिक है, जो बड़े उत्पादकों के विपरीत वैश्विक सत्यापकों का खर्च वहन नहीं कर सकते। यह यूरोपीय संघ के सीबीएएम के दृष्टिकोण से भी महत्त्वपूर्ण है, जो पहले से ही प्रभावी है। वास्तव में भारत को यूरोपीय संघ के साथ अपने एफटीए में सीबीएएम से कोई छूट या रियायत नहीं दी गई है।
जनवरी में छह वस्तुओं पर सीबीएएम लागू करने के बाद, यूरोपीय संसद अब कवरेज को 180 वस्तुओं तक बढ़ाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। विस्तारित सूची का उद्देश्य मूल्य श्रृंखला में उत्पादों के साथ-साथ अप्रत्यक्ष उत्सर्जन को भी शामिल करना है। उदाहरण के लिए, इस्पात और एल्युमीनियम से बनी वस्तुएं जैसे वाहन और वाहन कलपुर्जे, चैसी, इंजन, सस्पेंशन सिस्टम और गियरबॉक्स आदि विस्तारित सूची में सीबीएएम के तहत शामिल हैं। ये उन महत्त्वपूर्ण निर्यातों में से हैं जहां भारत आगे विस्तार की उम्मीद कर रहा है, क्योंकि उसने द्विपक्षीय एफटीए के तहत महत्त्वपूर्ण शुल्क रियायतें हासिल की हैं।
बिजली और परिवहन जैसी वस्तुओं को विस्तारित सूची में शामिल करने का अर्थ है कि अंतर्निहित उत्सर्जन को भी सीबीएएम के तहत लाया जाएगा। इससे उत्पादकों और नियामक अधिकारियों, दोनों के लिए अतिरिक्त जटिलता और लागत उत्पन्न होगी। इसलिए, अधिक ऊर्जा-कुशल उत्पादन विधियों के साथ-साथ, एमएसएमई क्षेत्र को मार्गदर्शन और आवश्यक बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होगी ताकि मूल्य श्रृंखला में अंतर्निहित कार्बन उत्सर्जन का आकलन किया जा सके। अतः उत्पादकों के लिए अतिरिक्त लागत का पूर्व अनुमान लगाना आवश्यक है ताकि उन्हें तैयार किया जा सके और वे यूरोपीय संघ के साथ एफटीए से संभावित व्यापार लाभों का उपयोग कर सकें।
कपड़ा और परिधान क्षेत्र में भी भारत यूरोपीय संघ जैसे बड़े बाजारों में लाभ के लिए शुल्क रियायतों पर निर्भर है। डिजिटल प्रोडक्ट पासपोर्ट (डीपीपी) की शुरुआत जुलाई 2027 से होगी और संभवतः यह भारत-यूरोपीय संघ एफटीए के कार्यान्वयन के साथ मेल खाएगा। यूरोपीय संघ के सतत उत्पाद विनियमन के लिए ईको डिजाइन का हिस्सा होने के नाते, डीपीपी एक अद्वितीय डिजिटल उत्पाद पहचानकर्ता है, जिसका उद्देश्य परिधान क्षेत्र के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए मूल्य श्रृंखला में स्थिरता और पारदर्शिता को बढ़ाना है। उत्पादक, चाहे वह कहीं भी स्थित हो, उसको उपयोग की गई सामग्री की उत्पत्ति और संरचना, उत्पादन प्रक्रियाएं, कार्बन फुटप्रिंट, रसायनों का उपयोग और श्रम स्थितियों पर व्यापक डेटा प्रदान करना होगा।
भारत का वस्त्र और परिधान क्षेत्र इन विनियमों के प्रति जागरूकता और अपने उत्पादों को उभरते डीपीपी मानकों के अनुरूप बनाने के लिए गहन तैयारी की आवश्यकता रखता है। डेटा संग्रह और दस्तावेजीकरण के लिए आवश्यक डिजिटल बुनियादी ढांचे का निर्माण तुरंत शुरू होना चाहिए ताकि उत्पादकों को विशेष रूप से श्रम-प्रधान क्षेत्रों में एफटीए के तहत शुल्क रियायतों से अपेक्षित लाभ प्राप्त करने में बेहतर सक्षम बनाया जा सके।
भारत की तात्कालिक व्यापार नीति प्राथमिकताओं को इस आवश्यकता से परिभाषित किया जाना चाहिए कि भारतीय निर्यातक ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ एफटीए से संभावित व्यापार लाभों को अधिक से अधिक बढ़ा सकें और अमेरिका द्वारा अनुचित शुल्क लगाए जाने से उत्पन्न अनिश्चितताओं के कारण होने वाले नुकसान को कम कर सकें।
(लेखिका जेएनयू के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र में प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं)