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Editorial: राजकोषीय घाटा 5% तक पहुंचने की आशंका, पटरी से उतर सकता है देश का बजट

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कच्चे तेल की कीमतों और पश्चिम एशिया संकट ने भारत के राजकोषीय गणित को बिगाड़ दिया है। आयात कम करने और विदेशी मुद्रा बचाने की अपील अब जरूरी हो गई है

Last Updated- May 12, 2026 | 10:47 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईंधन और सोने सहित कई वस्तुओं की खपत कम करने की अपील की है जिसके चलते देश में एक दिलचस्प बहस आरंभ हो गई है। प्रधानमंत्री की इस अपील के पीछे इरादा यह है कि आयातित वस्तुओं पर निर्भरता कम की जाए और विदेशी मुद्रा बचाई जाए। कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा होने के कारण हमारा चालू खाते का घाटा यानी सीएडी बढ़ रहा है। कुछ अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि सीएडी चालू वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के दो फीसदी से अधिक हो सकता है जबकि वर्ष 2025-26 में यह जीडीपी के एक फीसदी के भीतर था।

वैश्विक अनिश्चितता के कारण पूंजी भी देश से बाहर जा रही है। इसका नतीजा बाहरी खाते पर दबाव के रूप में सामने आ रहा है। रुपये के मूल्य में गिरावट में इसे महसूस किया जा सकता है। बाहरी खाते पर बहुत अधिक ध्यान है लेकिन पश्चिम एशिया संकट के केंद्रीय बजट पर पड़ रहे प्रभाव का आकलन भी आवश्यक है।

हालांकि, यह दलील दी जा सकती है कि वित्त वर्ष की शुरुआत में ही बजट मान्यताओं पर पुनर्विचार करना जल्दबाजी होगी। लेकिन इस चरण में समायोजन प्रक्रिया शुरू करना मददगार साबित होगा। केंद्र सरकार चालू वर्ष में राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.3 फीसदी तक सीमित करने का लक्ष्य रख रही थी जो अब विभिन्न कारणों से कठिन लगता है। नई श्रृंखला में जीडीपी का आधार थोड़ा नीचे की ओर संशोधित किया गया है।

सरकार ने तेल कंपनियों को राहत देने के लिए पेट्रोल और डीजल पर विशेष उत्पाद शुल्क कम कर दिया है, जिससे अनुमानित रूप से सालाना लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान होगा।

यह भी बताया गया है कि उर्वरक सब्सिडी इनपुट कीमतों में वृद्धि के कारण 20 फीसदी तक बढ़ने के आसार हैं। इसके अलावा तेल कंपनियां जो कॉरपोरेट टैक्स और लाभांश के माध्यम से केंद्र सरकार के राजस्व में महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं, वे भी इस वर्ष अधिक योगदान नहीं कर पाएंगी। इन सभी तत्वों को मिलाकर यह संकेत मिलता है कि राजकोषीय घाटा बढ़कर जीडीपी के लगभग 5 फीसदी तक जा सकता है।

गौर करने की बात यह है कि ऊंचे ईंधन मूल्य और सीमित गैस उपलब्धता आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर रहे हैं। इससे कुल कर संग्रहण कम हो सकता है और बजट पर और दबाव पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक वृद्धि दर दबाव में है, लेकिन अपेक्षित उच्च मुद्रास्फीति दर सामान्य वृद्धि दर को ऊपर धकेल सकती है और बजट पर संकट के कुछ दुष्प्रभावों को सीमित कर सकती है। बजट पर अंतिम प्रभाव इस पर निर्भर करेगा कि कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति कितने समय तक बाधित रहती है। वर्तमान स्थिति में यह स्पष्ट नहीं है कि होर्मुज स्ट्रेट कितने समय तक अवरुद्ध रहेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि उसके खुलने के बाद भी सामान्य आपूर्ति बहाल होने में समय लग सकता है। इससे कीमतें कुछ समय तक ऊंची बनी रहेंगी।

इसलिए सरकार के लिए समायोजन शुरू करना उचित होगा। ईंधन कीमतों को तुरंत समायोजित करने की आवश्यकता है। बताया जाता है कि तेल कंपनियों को प्रति माह लगभग 30,000 करोड़ रुपये की अंडर-रिकवरी का सामना करना पड़ रहा है। यह स्पष्ट रूप से टिकाऊ नहीं है और अंततः सरकार को उन्हें सहारा देना होगा। इसका बजट पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा।

सरकार को अपनी खर्च योजनाओं में भी समायोजन करना पड़ सकता है। यहां उद्देश्य पूंजीगत व्यय में कटौती करने का नहीं होना चाहिए क्योंकि यह वृद्धि को सहारा देगा। संभावना है कि कुछ परियोजनाओं में कच्चे माल की लागत बढ़ने के कारण लागत वृद्धि देखी जाए। यह भी महत्त्वपूर्ण होगा कि सरकार अपनी विनिवेश योजनाओं को न छोड़े। विदेशी निवेशक बिकवाली कर रहे हैं, लेकिन घरेलू प्रवाह मजबूत बने हुए हैं और बाजार को सहारा दे रहे हैं।

वास्तव में, स्थिति सुधरने पर सरकार को संकट के प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए विनिवेश लक्ष्य बढ़ाने पर विचार करना चाहिए। महामारी के उच्च स्तर से ऋण और घाटा दोनों कम हुए हैं लेकिन वे अभी भी ऊंचे स्तर पर हैं और नीतिगत गुंजाइश को सीमित करेंगे। इसलिए मध्यम अवधि के जोखिमों को न्यूनतम करने के लिए राजकोषीय घाटे को लक्ष्य के करीब रखना महत्त्वपूर्ण होगा।

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First Published - May 12, 2026 | 10:38 PM IST

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