चीन के आधिकारिक सांख्यिकीविदों ने घोषणा की है कि निर्यात की महाशक्ति माने जाने वाले इस देश का व्यापार अधिशेष 2025 में रिकॉर्ड 1.2 लाख करोड़ डॉलर हो गया। ऐसा तब हुआ जबकि घरेलू कमजोरी, वैश्विक वृद्धि में धीमापन और अमेरिका की नई सरकार द्वारा चीन के निर्यात को निशाना बनाए जाने जैसे प्रतिकूल हालात सामने थे।
ज्यादातर समय में इसे अर्थव्यवस्था की मजबूती के रूप में देखा जाता लेकिन यह समय वैसा नहीं है। वास्तव में यह चीन के शीर्ष नेतृत्व की कमजोरी को दर्शाता है। वे देश की अर्थव्यवस्था को इस तरह से पुनर्गठित करने के अनिच्छुक या कहें कि ऐसा करने में अक्षम रहे हैं जो स्वयं उनके लिए और विश्व के लिए दीर्घकालिक स्थिरता, दृढ़ता और विकास प्रदान कर सके।
चीन का विकास मॉडल कुछ वर्ष पहले अपनी गति खो चुका है। यह राज्य निर्देशित निवेश और निर्यात पर आधारित था। इसे वित्तीय दमन से मदद पहुंच रही थी जिसके अंतर्गत परिवार और कामगार अपनी जरूरत से कहीं अधिक बचत करते और सरकार नियंत्रित वित्तीय प्रणाली उन्हें इस बात के लिए विवश करती कि वे अपनी अतिरिक्त बचत सरकार के हवाले कर दें। यह निवेश प्रधान और उपभोग की कमी वाला मॉडल बचत के अधिशेष की मांग करता है जो व्यापक आर्थिक नजरिये से एक विशाल व्यापार अधिशेष की गारंटी देता है।
चीन के पास इसे हल करने का मौका था लेकिन इसके लिए घरेलू स्तर पर वास्तविक राजनीतिक और आर्थिक सुधारों की जरूरत होगी। स्थानीय सरकार और बड़े राज्य संस्थान तब शक्ति खो देंगे जब उनके पास अतिरिक्त बचत का सहारा नहीं रहेगा। ऐसे में निजी क्षेत्र की शक्ति बढ़ेगी और पार्टी के अधीनस्थों के पास गृहस्वामी और कामगार के रूप में अधिक आर्थिक अधिकार होंगे। वे खुद को या अपनी नियति का संचालक भी मान सकते हैं बजाय कि राज्य नियंत्रित मॉडल के लाभार्थी के। यह व्यवस्था चलाने वाले लोगों के हित में कतई नहीं होगा। यही वजह है कि उसने बार-बार लगातार संकटों का सामना प्रोत्साहन के जरिये किया है। इसके लिए पूंजी को बार-बार उन्हीं जर्जर माध्यमों में डाला गया है जिन्होंने कभी वृद्धि को मदद दी थी।
इसके चलते चीन ट्रेड मिल जैसे हालात में फंस गया है। उसे लगातार भागते रहना है और वृद्धि हासिल करने के लिए निर्यात में और अधिक इजाफा करते रहना है। सुधार में नाकामी के अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक विकास पर गंभीर परिणाम हुए हैं। एक परिणाम यह हुआ है कि अमेरिका और पश्चिम के अन्य हिस्सों में लोकलुभावन राजनीति उभर आई है, जिसने वैश्विक व्यापार प्रणाली को अस्थिर कर दिया है।
इस बीच, विकास की प्राकृतिक सीढ़ी ध्वस्त हो गई है जिसमें देश मूल्य श्रृंखला में ऊपर चढ़ते हैं और फिर अपने से गरीब देशों को निम्न-स्तरीय विनिर्माण संभालने के लिए जगह छोड़ते हैं। चीन की पूंजी को यदि उसके हाल पर छोड़ दिया जाए तो वह स्वयं देश से बाहर अपने ही निर्यात के लिए प्रतिस्पर्धी तैयार करेगी। इस बीच, उसकी घरेलू मांग दबाव में बनी हुई है और उसके उपभोक्ताओं को अपनी कमाई को वैश्विक वस्तुओं पर खर्च करने की अनुमति नहीं है, जबकि वही पुनर्संतुलन का सही तरीका होता।
यह हमेशा नहीं चल सकता। इस असंतुलन की प्रकृति संकट की ओर ले जाने वाली है। डॉनल्ड ट्रंप द्वारा शुल्क वृद्धि भी ऐसा ही एक संकट है। हालांकि इसके प्रभावों ने चीन को अपना रास्ता बदलने पर विवश नहीं किया है बल्कि उसने अपने व्यापार के लिए अन्य रास्ते तलाश लिए हैं और चोरी-चुपके पश्चिमी बाजारों का रुख कर रहा है। अन्य प्रतिक्रियाएं मसलन यूरोपीय प्रतिबंध आदि भी समान कारणों से उत्पन्न हुई हैं। आने वाला वर्ष निस्संदेह ऐसे संकटों की बढ़ोतरी देखेगा, जिनमें विकासशील विश्व भी शामिल होगा। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहेगी जब तक चीन की कम्युनिस्ट पार्टी अपना रुख नहीं बदलती।