Budget 2026: हर साल जब कही बाढ़, भूस्खलन या तूफान आता है, तो तस्वीर एक जैसी होती है। आपको वहां की तस्वीरों में टूटी सड़कें, उजड़े घर और राहत के इंतजार में बैठे लोग ही दिखते होंगे। मदद पहुंचती भी है, लेकिन अक्सर तब, जब नुकसान हो चुका होता है और जिंदगी पटरी से उतर चुकी होती है। जलवायु परिवर्तन ने आपदाओं की न सिर्फ रफ्तार तेज की है, बल्कि इसे अधिक महंगा और अनिश्चित भी बना दिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आपदा के बाद दी जाने वाली राहत अब काफी है, या फिर देश को पहले से तैयार रहने की जरूरत है?
Budget 2026 इसी सवाल के जवाब की ओर इशारा कर सकता है। चर्चा है कि सरकार अब राहत से आगे बढ़कर क्लाइमेट इंश्योरेंस जैसे समाधान पर सोच सकती है, जहां नुकसान का इंतजार नहीं, बल्कि खतरे के संकेत मिलते ही मदद अपने आप मिल जाए। अगर ऐसा होता है, तो यह सोच में बड़ा बदलाव होगा; जहां आपदा के बाद सहारा नहीं, बल्कि आपदा से पहले सुरक्षा तैयार होगी।
Plutas.ai के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर अंकुर इंद्रकुश का कहना है कि अब समय आ गया है कि सरकार प्री-फंडेड क्लाइमेट इंश्योरेंस को आधिकारिक पॉलिसी का हिस्सा बनाए।
इंद्रकुश कहते हैं कि 2024 में केरल के वायनाड में आई भयानक लैंडस्लाइड ने सबको हिला दिया। अनुमानित नुकसान 2200 करोड़ रुपये के आसपास था, लेकिन केंद्र सरकार ने सिर्फ 260 करोड़ रुपये की राहत मंजूर की। इससे साफ पता चलता है कि मौजूदा राहत सिस्टम में देरी और कमी है। विश्व बैंक जैसी संस्थाओं की रिसर्च बताती है कि पैरामीट्रिक इंश्योरेंस से क्लेम सेटलमेंट का समय 90% तक कम हो सकता है।
इंद्रकुश का कहना है कि अब तक की राहत मुख्य रूप से घर-जमीन के नुकसान का आकलन करती है। इसके लिए सर्वे, कागजात और कई स्तरों पर मंजूरी चाहिए। इस सबमें समय लगता है। गरीब मजदूर, छोटे किसान और अनौपचारिक कामगारों के लिए कुछ दिनों की देरी भी बहुत भारी पड़ती है। खाना, कर्ज चुकाना, रोजमर्रा की जरूरतें सब प्रभावित होता है।
वायनाड जैसे हाल के हादसों में देखा गया कि प्रभावित परिवारों में से सिर्फ आधे को ही समय पर मदद मिल पाई। राहत के नियम भी पुराने हैं, जो आज के खर्च और कमाई के हिसाब से मेल नहीं खाते।
इंद्रकुश बताते हैं कि सामान्य इंश्योरेंस में नुकसान की जांच, फोटो, कागजात सब देखकर पैसे मिलते हैं, जिसमें महीनों लग जाते हैं। लेकिन पैरामीट्रिक इंश्योरेंस अलग है। इसमें पहले से तय ट्रिगर होते हैं, जैसे ज्यादा बारिश, तेज हवा या बहुत ज्यादा गर्मी। जैसे ही सैटेलाइट या ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन से ये डेटा आता है, पैसे अपने आप ट्रांसफर हो जाते हैं। इसमें कोई जांच-परख नहीं, कोई झगड़ा नहीं। लागत भी कम, और पैसे कुछ दिनों में मिल जाते हैं।
भारत में SEWA (Self Employed Women’s Association) ने 2024 में हीट इंश्योरेंस का पायलट चलाया। इसमें 46,000 से ज्यादा अनौपचारिक महिला कामगारों को गर्मी के ट्रिगर क्रॉस होने पर हफ्तों के अंदर पैसे मिले वो बिना किसी क्लेम फॉर्म के!
इंद्रकुश कहते हैं, “बिल्कुल! खासकर उन लोगों के लिए जिनकी कमाई रोज बदलती है, न कि घर-जमीन खोने का डर ज्यादा है। भारत में अभी गिग वर्कफोर्स करीब 77 लाख है, जो दशक के अंत तक 2.3 करोड़ से ज्यादा हो जाएगी। ये ज्यादातर बाहर काम करने वाले लोग हैं जैसे डिलीवरी, रेहड़ी-पटरी, मजदूरी आदि। हीटवेव और बाढ़ से उनकी कमाई सीधे प्रभावित होती है। पैरामीट्रिक इंश्योरेंस अच्छा है क्योंकि इसमें नौकरी के कागज या इनकम प्रूफ की जरूरत नहीं। SEWA का पायलट दिखाता है कि छोटी लेकिन तेज मदद से परिवार कर्ज से बच सकते हैं और जरूरी चीजें खरीद सकते हैं।”
अंकुर इंद्रकुश ने 5 ठोस सुझाव दिए हैं ताकि क्लाइमेट इंश्योरेंस पूरे देश में फैले:
इंद्रकुश का कहना है कि ये कदम अगर बजट 2026 में आएं तो पायलट प्रोजेक्ट से पूरे देश की क्लाइमेट रेजिलिएंस मजबूत हो सकती है। अब समय आ गया है कि राहत से आगे बढ़कर तैयारी और तेज मदद पर सरकार को फोकस करना चाहिए।