हाल में जारी एशिया मैन्युफैक्चरिंग इंडेक्स (एएमआई) 2026 में भारत 11 एशियाई देशों के बीच छठे पायदान पर है। इससे पता चलता है कि भारत को अपनी रफ्तार बढ़ानी होगी। एएमआई 8 प्रमुख स्तंभों और 43 उप-मापदंडों के आधार पर प्रमुख विनिर्माण अर्थव्यवस्थाओं में प्रतिस्पर्धात्मकता का आकलन करता है।
हॉन्ग कॉन्ग की सलाहकार फर्म डेजन शिरा ऐंड एसोसिएट्स ने लगातार तीसरे साल यह सूची जारी की है। इसमें वैश्विक स्तर पर विनिर्माण की दौड़ में भारत प्रमुख एशियाई प्रतिस्पर्धियों से पीछे है। इस सूचकांक में मलेशिया ने वियतनाम को पछाड़कर पहली बार दूसरे पायदान पर पहुंचा है। वियतनाम फिसलकर तीसरे पायदान पर आ गया है।
विकसित अर्थव्यवस्थाओं के बीच सिंगापुर एक पायदान चढ़कर चौथे स्थान पर पहुंच गया। उसने दक्षिण कोरिया को पीछे छोड़ दिया जो फिसलकर पांचवें स्थान पर चला गया है। अध्ययन में कहा गया है कि इन बदलावों से क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा बढ़ने का पता चलता है।
सूची में भारत के बाद इंडोनेशिया सातवें पायदान पर है जबकि थाईलैंड ने दो पायदान की छलांग लगाई है। वह 2025 में 10वें पायदान पर था जबकि 2026 की सूची में आठवें स्थान पर है। फिलीपींस 10वें पायदान पर और जापान नौवें स्थान पर है। चीन लगातार तीसरे साल शीर्ष स्थान पर बरकरार रहते हुए अपना वर्चस्व कायम रखा है। अध्ययन में शामिल 11 देशों के बीच बांग्लादेश अंतिम स्थान पर है।
यह सूचकांक जिन 8 प्रमुख स्तंभों पर गौर करना है उनमें अर्थव्यवस्था, राजनीतिक जोखिम, व्यापार माहौल, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, कर नीति, बुनियादी ढांचा, कार्यबल और नवाचार शामिल हैं। प्रत्येक स्तंभ को उप-मापदंडों में विभाजित किया गया है और 100 के पैमाने पर अंक दिए गए हैं। इस प्रकार प्राप्त उच्च अंक दमदार प्रदर्शन का संकेत देते हैं।
साल 2024 की पहली रिपोर्ट में भारत 8 देशों के बीच चौथे पायदान पर था। मगर 2025 में भारत 11 देशों के बीच फिसलकर छठे पायदान पर आ गया था। साल 2026 के अध्ययन में भी 11 देशों को शामिल किया गया है।
इस सूची में भारत की स्थिति के बारे में बताया गया है कि देश बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स एवं प्रशासनिक जटिलता में ढांचागत बाधाओं के साथ एक अनोखी दुविधा: विशाल बाजार और दमदार नीतिगत रफ्तार से जूझ रहा है।’ हालांकि छठे पायदान पर भारत की मौजूदगी दमदार आर्थिक बुनियादी बातों की ओर इशारा करती है, लेकिन लंबे समय से चली आ रही बाधाएं विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता पर दबाव डाल रही हैं।
हालांकि भारत के लिए कई अच्छी खबरें भी हैं। भारत की अर्थव्यवस्था जाहिर तौर पर फलफूल रही है और वह वियतनाम एवं चीन के बाद कुल मिलाकर तीसरे स्थान पर है। उसे आर्थिक वृद्धि के मामले में सबसे अधिक अंक मिला है जो अर्थव्यवस्था स्तंभ के तहत एक प्रमुख उप-मापदंड है। इतना ही नहीं भारत आर्थिक पैमाने पर भी केवल चीन से पीछे दूसरे पायदान पर है।
इस वृद्धि को कार्यबल की ताकत से रफ्तार मिल रही है। श्रम बल के आकार एवं वृद्धि, जनसांख्यिकीय ढांचे, श्रम लागत और शैक्षणिक उपलब्धि सहित विभिन्न उप-मानदंडों के आधार पर भारत 11 देशों के बीच पहल पायदान पर है। बुनियादी ढांचे के मामले में भारत चौथे और नवाचार के मामले में पांचवें पायदान पर है। इन क्षेत्रों में सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों से लगातार सुधार होने की उम्मीद है।
मगर भारत के लिए कई चुनौतियां भी दिख रही हैं। कर नीति, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और राजनीतिक जोखिम के लिहाज से भारत नौवें पायदान पर है। जहां तक कर दरों की बात है तो भारत को 11 देशों के बीच सबसे कम अंक मिला है। कर प्रोत्साहन के मामले में वह चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम (सबसे अधिक अंक) और थाईलैंड से पीछे है।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के मामले में भारत को मुक्त व्यापार समझौता एकीकरण जैसे मापदंडों पर कमजोर अंक मिला है जहां चीन, इंडोनेशिया, जापान, मलेशिया, सिंगापुर और वियतनाम का प्रदर्शन काफी बेहतर रहा है। लॉजिस्टिक्स के मामले में भी भारत का प्रदर्शन कमजोर है और वह छह देशों के बाद सातवें पायदान पर है। इस श्रेणी में सिंगापुर अग्रणी है।
राजनीतिक जोखिम भी एक प्रमुख चिंता बनी हुई है। भ्रष्टाचार संबंधी धारणा के मामले में भारत छह देशों से पीछे है। इसमें सिंगापुर को सबसे कम भ्रष्ट माना गया है। संस्थागत स्थिरता के लिहाज से भी भारत को कम अंक मिले हैं। यह एक ऐसा कारक है जिस पर बहुराष्ट्रीय कंपनियां निवेश करते समय ध्यान देती हैं।