वाणिज्य विभाग विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) के नियमों में बड़े बदलावों पर जोर दे रहा है ताकि अमेरिका में भारतीय वस्तुओं के आयात पर लगाए गए 50 फीसदी के भारी-भरकम शुल्क के प्रभाव को कम किया जा सके। इस मामले से जुड़े तीन लोगों ने यह जानकारी दी। अगर नियमों में बदलाव को लागू किया गया तो भारत में मौजूद एसईजेड इकाइयों के लिए घरेलू बाजार में सामान बेचना आसान हो सकता है। वे देसी बाजार में सेवाओं के लिए रुपये में भुगतान हासिल कर सकेंगी और अनुपालन मानदंडों को भी सरल बनाना आसान हो सकता है।
एसईजेड को नियंत्रित करने वाले मौजूदा कानून करीब दो दशक पुराने हैं। उसमें सुधार किए जाने पर करीब 4 साल से चर्चा चल रही है। मगर फिलहाल नियमों में बदलाव पर जोर ऐसे समय में दिया जा रहा है जब ट्रंप शुल्क ने इन इकाइयों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। प्रस्तावों पर अंतिम निर्णय वित्त मंत्रालय द्वारा लिया जाएगा। मंत्रालय इस बात पर भी विचार करेगा कि क्या इन सुधारों को आगामी केंद्रीय बजट में शामिल किया जा सकता है।
भारत में मौजूद एसईजेड इकाइयों से एक तिहाई से अधिक निर्यात अमेरिका को किया जाता है। निर्यात केंद्रित इकाइयों (ईओयू) और एसईजेड के लिए निर्यात संवर्धन परिषद (ईपीसीईएस) द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में एसईजेड से अमेरिका को वस्तुओं का निर्यात एक साल पहले की समान अवधि के मुकाबले 12 फीसदी घटकर 5.46 अरब डॉलर रह गया।
वित्त मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय ने इस संबंध में जानकारी के लिए भेजे गए सवालों का खबर लिखे जाने तक जवाब नहीं दिया।
एक व्यक्ति ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘एसईजेड कानून में बदलाव की घोषणा आगामी बजट में किए जाने से उसके कार्यान्वयन में निश्चितता आएगी। इन बदलावों का उद्देश्य अमेरिका में ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए अतिरिक्त शुल्क के प्रतिकूल प्रभाव को कम करना भी है।’कुछ बदलावों के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र अधिनियम, 2005 में संशोधन करने की आवश्यकता होगी जबकि अन्य बदलावों को केवल नियम बदलकर लागू किया जा सकता है। मगर इस मुद्दे पर वाणिज्य मंत्रालय और वित्त मंत्रालय का राजस्व विभाग फिलहाल एकमत नहीं हैं।
एक व्यक्ति ने कहा कि वाणिज्य विभाग विभिन्न हितधारकों की चिंताओं को दूर करने की कोशिश कर रहा है जिसमें जिनमें वित्त मंत्रालय भी शामिल है। उन्होंने कहा, ‘इन चिंताओं को वैकल्पिक व्यवस्था के जरिये दूर किया जाएगा।’
मौजूदा कानून में बदलाव का एक उद्देश्य एसईजेड में विनिर्मित उत्पादों को घरेलू बाजार में तैयार माल के बजाय शुल्क माफी के साथ कच्चे माल के तौर पर बेचने की अनुमति देना है। फिलहाल अगर तैयार उत्पाद को निर्धारित क्षेत्र से बाहर बेचा जाता है तो सीमा शुल्क का पूरा भुगतान एसईजेड को ही करना पड़ता है। इसे घरेलू टैरिफ क्षेत्र (डीटीए) के रूप में जाना जाता है।
मगर संशोधित विधेयक ‘रिवर्स जॉब वर्क’ की अनुमति देगा। इसका मतलब यह है कि एसईजेड इकाइयां डीटीए इकाइयों के लिए कुछ विनिर्माण कर सकेंगी। इससे विनिर्माताओं को निर्यात मांग में मौसमी उतार-चढ़ाव से निपटने में मदद मिलेगी। प्रस्तावित बदलावों से निष्क्रिय क्षमता का इष्टतम उपयोग करने में मदद मिलेगी। खास तौर पर यह देखते हुए कि निर्यात बाजार में अप्रत्याशित बदलाव और मांग में उतार-चढ़ाव हो सकता है।
एक अन्य बदलाव के तहत स्थानीय कंपनियों को एसईजेड इकाइयों से प्राप्त सेवाओं के लिए भारतीय मुद्रा में भुगतान करने की अनुमति दी जा सकती है। मौजूदा कानून के तहत ऐसी सेवाओं के लिए भुगतान विदेशी मुद्रा में किया जाता है। इस संशोधन से सेवाओं को विनिर्माण क्षेत्र के बराबर लाए जाने की संभावना है।