US Tariffs on India: अमेरिका ने जब भारत से आने वाले सामान पर 50 प्रतिशत तक भारी टैरिफ लगाया, तो माना जा रहा था कि भारतीय निर्यातक दबाव में आकर कीमतें घटा देंगे। लेकिन ज़मीनी हकीकत ने इस उम्मीद को गलत साबित कर दिया। भारतीय निर्यातकों ने अपने दाम जस के तस रखे। घाटा उठाने के बजाय उन्होंने अमेरिका को भेजे जाने वाले सामान की मात्रा ही कम कर दी।
जर्मनी के कील इंस्टीट्यूट ऑफ वर्ल्ड इकोनॉमी की नई रिसर्च बताती है कि अमेरिका जाने वाला भारतीय निर्यात 18 से 24 प्रतिशत तक घट गया। इसके उलट यूरोप, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे दूसरे बाजारों में भारतीय निर्यात पर टैरिफ की मार नहीं पड़ी। इससे यह साफ हो गया कि टैरिफ का असर कीमतों पर नहीं बल्कि व्यापार की मात्रा पर पड़ा।
रिसर्च में सबसे अहम सुराग कीमतों से मिला। अगर भारतीय निर्यातक टैरिफ का बोझ खुद उठा रहे होते, तो अमेरिका भेजे गए सामान के दाम दूसरे देशों के मुकाबले गिरते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अमेरिका और यूरोपीय संघ, कनाडा व ऑस्ट्रेलिया को भेजे गए भारतीय सामान के दाम लगभग एक जैसे रहे। इसका मतलब साफ है कि टैरिफ की कीमत अमेरिकी खरीदारों ने चुकाई।
हालांकि यह तस्वीर भारत के लिए पूरी तरह राहत देने वाली नहीं है। दिसंबर में अमेरिका को भारत का निर्यात साल दर साल 1.83 प्रतिशत घटकर 6.88 अरब डॉलर रह गया। इससे भी बड़ा झटका जेम्स और ज्वैलरी सेक्टर को लगा, जहां अप्रैल से दिसंबर के बीच निर्यात 44 प्रतिशत से ज्यादा टूट गया।
कील इंस्टीट्यूट ने जनवरी 2024 से नवंबर 2025 के बीच दुनिया भर के 2.5 करोड़ से ज्यादा व्यापारिक सौदों और करीब 4 ट्रिलियन डॉलर के कारोबार का विश्लेषण किया। अध्ययन में सामने आया कि वैश्विक स्तर पर लगाए गए टैरिफ का सिर्फ 4 प्रतिशत बोझ निर्यातकों ने झेला, जबकि पूरे 96 प्रतिशत की कीमत अमेरिकी नागरिकों को चुकानी पड़ी।
रिपोर्ट बताती है कि भारत पर अगस्त में अचानक टैरिफ बढ़ाए गए। 7 अगस्त को 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया और 27 अगस्त को इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया। इसी तेज और अप्रत्याशित बढ़ोतरी ने भारत को अध्ययन का अहम उदाहरण बना दिया।
संस्थान के मुताबिक इसके पीछे कई ठोस वजहें थीं। भारत ने उन सामानों के लिए दूसरे बाजार खोज लिए, जो अमेरिका में महंगे हो गए थे। साथ ही 50 प्रतिशत टैरिफ का असर खत्म करने के लिए कीमतों में करीब 33 प्रतिशत की कटौती करनी पड़ती, जिससे निर्यातकों को सीधा नुकसान होता। इसके अलावा अमेरिका के कई आयातकों के विदेशी सप्लायरों से पुराने कारोबारी रिश्ते हैं, जिन्हें बदलना आसान नहीं है।
कील इंस्टीट्यूट का कहना है कि टैरिफ असल में अमेरिकी जनता पर लगाया गया टैक्स है। यह दावा कि विदेशी देश या निर्यातक टैरिफ चुकाते हैं, आंकड़ों के सामने टिक नहीं पाया। टैरिफ से कीमतें नहीं बदलतीं, बल्कि व्यापार की मात्रा घटती है। सप्लाई चेन पर इसका भारी बोझ पड़ता है और इससे अमेरिका को कोई अतिरिक्त संपत्ति नहीं मिलती।
नतीजा साफ है। अमेरिका की टैरिफ नीति ने भारतीय निर्यातकों को झुकाया नहीं, लेकिन अमेरिकी उपभोक्ताओं की जेब पर गहरी चोट जरूर की।