Copper Prices: वैश्विक बाजारों में चांदी इस समय रिकॉर्ड के करीब बनी हुई है। भू-राजनीतिक तनाव, बॉन्ड बाजार की उथल-पुथल और सुरक्षित निवेश की मांग ने इसे मजबूती दी है। लेकिन इसी माहौल में एक और धातु है, जिसकी कहानी ज्यादा गहरी और ज्यादा दमदार बनती जा रही है। हम बात कर रहे हैं कॉपर की। जहां चांदी को सुरक्षित निवेश का सहारा मिला है, वहीं कॉपर की तेजी की वजह सप्लाई संकट और बढ़ती औद्योगिक जरूरतें हैं।
टाटा म्युचुअल फंड की ताजा कमोडिटी रिपोर्ट साफ कहती है कि कॉपर की सप्लाई गंभीर दबाव में है। चिली और पेरू में बार-बार हो रहे विरोध प्रदर्शनों ने खनन गतिविधियों को झटका दिया है। इंडोनेशिया की ग्रासबर्ग खदान, जो दुनिया में कॉपर का बड़ा हिस्सा पैदा करती है, वहां काम रुक गया है और कंपनी ने फोर्स मेज्योर की घोषणा कर दी है। फोर्स मेज्योर का मतलब होता है ऐसी मजबूरी, जिस पर किसी का बस नहीं चलता। जब कोई कंपनी या सरकार किसी प्राकृतिक आपदा, हादसे, युद्ध, बाढ़, आग, भूकंप, दंगे या बड़े तकनीकी फेलियर की वजह से अपना काम नहीं कर पाती, तो वह कहती है कि यह फोर्स मेज्योर की स्थिति है।
कांगो में बाढ़ और चिली में खदान हादसों ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। नतीजा यह है कि 2025 में शुरू हुआ संकट अब 2026 की सप्लाई तस्वीर को भी तंग करता दिख रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक 2026 में रिफाइंड कॉपर बाजार में करीब डेढ़ लाख टन की कमी रह सकती है। पुरानी खदानें अब पहले जैसा प्रोडक्शन नहीं दे पा रहीं और नई खदानें शुरू करना महंगा और समय लेने वाला काम है। यानी सप्लाई बढ़ने की उम्मीद फिलहाल धुंधली है।
दूसरी तरफ मांग की कहानी लगातार मजबूत होती जा रही है। डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक वाहन, रिन्यूएबल एनर्जी और पावर ग्रिड विस्तार में कॉपर की जरूरत तेजी से बढ़ रही है। कंस्ट्रक्शन सेक्टर की सुस्ती भी इस मांग को कमजोर नहीं कर पा रही।
अमेरिका ने कॉपर को क्रिटिकल मिनरल की लिस्ट में शामिल कर दिया है। इससे रिफाइंड कॉपर पर टैरिफ बढ़ने की आशंका बढ़ी है। डॉलर की कमजोरी, अमेरिका में मौद्रिक नरमी और चीन से नए प्रोत्साहन पैकेज की उम्मीद ने कीमतों को और सहारा दिया है।
कॉपर के भंडार लगातार घट रहे हैं। पिछले साल के मुकाबले इन्वेंट्री काफी नीचे है। मांग-सप्लाई का अंतर बढ़ता जा रहा है और बाजार पर इसका असर साफ दिखने लगा है।
कमोडिटी एक्सपर्ट अनुज गुप्ता का कहना है कि कॉपर की स्थिति तेजी से मजबूत हो रही है। EV और ग्रीन एनर्जी सेक्टर में बढ़ती खपत के चलते कॉपर की मांग तेज है, जबकि सप्लाई सीमित होती जा रही है। उनके मुताबिक यह असंतुलन आगे कीमतों पर दबाव बनाए रख सकता है।