भारत-मॉरीशस कर संधि को लेकर हालिया घटनाक्रम ने एक बार फिर सीमा पार कराधान के बुनियादी सिद्धांतों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। हाल ही के एक निर्णय में यह जोर दिया गया है कि कर प्राधिकरण संधि लाभों को अस्वीकार करने के लिए कर-निवास प्रमाणपत्र (टीआरसी) से आगे भी देख सकते हैं, जिससे वैश्विक निवेशकों में नई चिंता पैदा हुई है। गहरी समस्या भारत के पूंजी कराधान पर बदलते रुख और कानून के शासन को बनाए रखने में निहित है। इस घटना की गंभीरता को समझने के लिए हमें रोजाना की खबरों से परे बुनियादी बातों पर ध्यान देना होगा यानी इस पर कि कर नीति कैसे आर्थिक वृद्धि को आकार देती है।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार में हमने मूल्यवर्धित कर (वैट) के माध्यम से बौद्धिक स्पष्टता हासिल की है। वैट गंतव्य सिद्धांत पर काम करता है। निर्यात शून्य-कर वाले होते हैं, जिससे भारतीय इस्पात हमारी सीमाओं से घरेलू करों से मुक्त होकर, केवल बाजार मूल्य के साथ और सभी अप्रत्यक्ष करों से रहित होकर बाहर जाता है। आयात पर घरेलू वस्तुओं के समान दर से कर लगाया जाता है। यह तटस्थता सुनिश्चित करता है। यह कर प्रणाली भारतीय उत्पाद और विदेशी उत्पाद के बीच चयन को प्रभावित नहीं करती।
इसी तरह का दर्शन कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (सीबीएएम) में देखा जाता है। प्रत्येक देश अपनी कार्बन कर दर चुनता है, लेकिन इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार विकृत नहीं होता। ऐसी तटस्थता वैश्वीकरण का लाभ उठाने के लिए आवश्यक है। जब इस तर्क को वित्त पर लागू किया जाता है, तो ऐसी तटस्थता के लिए निवास आधारित कराधान आवश्यक होता है। पूंजी से होने वाली आय पर कर प्राप्तकर्ता पर, उसके निवास देश में लगाया जाता है, न कि उस स्रोत पर जहां निवेश किया गया है। यदि अमेरिका का कोई पेंशन फंड भारत में निवेश करता है, तो उसके रिटर्न पर कर अमेरिका में लगाया जाना चाहिए, भारत में नहीं।
यह केवल एक सैद्धांतिक प्राथमिकता नहीं है। यह पूंजी की कमी वाली अर्थव्यवस्था के लिए एक रणनीतिक आवश्यकता है। भारत को आर्थिक विकास को वित्तपोषित करने के लिए भारी पूंजी की आवश्यकता है, जिसके लिए विदेशी पूंजी जरूरी है। वैश्विक पूंजी सबसे अधिक कर-पश्चात जोखिम-समायोजित रिटर्न चाहती है। यदि भारत स्रोत-आधारित कराधान लागू करता है। यानी विदेशी निवेशकों पर हमारी सीमाओं पर कर लगाता है तो हम उनके कर-पश्चात रिटर्न को कम कर देते हैं। इस कर लागत की भरपाई के लिए, वैश्विक निवेशक भारतीय परिसंपत्तियों से अधिक कर-पूर्व रिटर्न की मांग करते हैं।
इस तरह, निवेश परियोजनाएं जो 10 फीसदी पूंजी लागत पर व्यवहार्य होतीं, वे 14 फीसदी पर भी अव्यवहार्य हो जाती हैं। स्रोत-आधारित कराधान पूंजी पर एक शुल्क की तरह कार्य करता है, जो सीमा पर ही अवरोध पैदा करता है, निवेश को धीमा करता है, भारतीय कंपनियों के लिए लागत बढ़ाता है और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि को धीमा करता है। आदर्श रूप से, भारत को घरेलू स्तर पर पूंजी पर कम या शून्य कर दर रखनी चाहिए ताकि पूंजी आवक में गहराई आए। लेकिन इसके बिना भी, विदेशी निवेशकों के लिए निवास-आधारित कराधान का पालन करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। कई वर्षों तक हमने इस परिणाम को एक बेहतरीन संस्थागत व्यवस्था के माध्यम से हासिल किया। हमने कर संधियों का उपयोग करके वास्तविक रूप से निवास-आधारित कराधान प्राप्त किया।
सार्वजनिक मामलों में पाखंड की एक स्वस्थ भूमिका होती है। चुनावी लोकतंत्रों में लोकलुभावन बयानबाजी अक्सर यह मांग करती है कि राज्य ‘अमीरों पर कर लगाए’ या ‘विदेशियों पर कर लगाए।’ हालांकि समझदार लोग यह जानते हैं कि हमें आर्थिक दक्षता के लिए परिस्थितियां निर्मित करनी होती हैं। यही वजह है कि वैश्विक पूंजीवाद की इमारत अक्सर कर निरपेक्ष माध्यमों के जरिए प्राप्त कुशल कराधान पर आधारित होती है।
सफल देशों ने आम तौर पर एक अच्छी चालाकी अपनाई है, जिसमें वे सार्वजनिक तौर पर लोकप्रिय बातें कहते हैं, जबकि यह भी पक्का करते हैं कि ऐसे तरीकों से दुनिया की अर्थव्यवस्था ठीक से व्यवस्थित हो। इसी तरह से देखें तो, मॉरीशस मार्ग ने भारत को निवास-आधारित कराधान अपनाने की अनुमति दी, जिससे घरेलू कर नीति की अनिश्चितताओं के बावजूद भारत में पूंजी की लागत कम बनी रही।
इस संतुलन के लिए कानूनी निश्चितता आवश्यक थी। इस निश्चितता की नींव आजादी बचाओ आंदोलन मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय और न्यायमूर्ति बीएन श्रीकृष्ण द्वारा व्यक्त सिद्धांत थे। मानक एकदम स्पष्ट था। मॉरीशस सरकार द्वारा जारी एक वैध टीआरसी अपने आप में संपूर्ण था। भारतीय कर अधिकारी इस दस्तावेज से आगे जाकर निवेशक की स्थिति पर प्रश्न नहीं उठा सकते थे। लेकिन यह ढांचा 2016 में टूटने लगा। कर संधि में लिमिटेशन ऑफ बेनिफिट्स (एलओबी) प्रावधान शामिल करने के लिए संशोधन किया गया। वैसे तो इसका घोषित उद्देश्य दुरुपयोग को रोकना था, लेकिन इस संशोधन ने काम करने के नियमों को पूरी तरह से बदल दिया। इसने टीआरसी के वस्तुनिष्ठ मानक की जगह संस्था के वाणिज्यिक सार से संबंधित व्यक्तिपरक परीक्षणों को रख दिया।
इस बदलाव ने कर विभाग को निवास प्रमाणपत्र देखने की शक्ति प्रदान की। हालिया निर्णय इसी बदलाव का परिणाम है, जहां टीआरसी अब कर अधिकारियों की जांच शक्तियों के विरुद्ध ढाल नहीं रहा। वर्ष2016 की गलतियां 2026 में हमें फिर से परेशान कर रही हैं। 2016 के बदलाव के साथ ही निजी निवेश में व्यापक कठिनाइयां भी आई हैं। सूचीबद्ध भारतीय कंपनियों में विदेशी स्वामित्व की संरचना का आंकड़ा उल्लेखनीय है।
विदेशी स्वामित्व 2000-01 के 8.38 फीसदी से बढ़कर 2015-16 में 19.19 फीसदी के शिखर तक पहुंचा। लेकिन तबसे यह आंकड़ा ठहर गया और उलट गया। 2024-25 तक विदेशी स्वामित्व घटकर 16.04 फीसदी रह गया। एक सफल उभरते बाजार में हम उम्मीद करते हैं कि समय के साथ घरेलू आग्रह कम होगा। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था परिपक्व होती है और दुनिया से जुड़ती है, इक्विटी परिसंपत्तियों में विदेशी स्वामित्व का हिस्सा लगातार बढ़ना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
न्यायपालिका को कार्यपालिका के अतिक्रमण पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है। जब अदालतें पहले से तय प्रश्नों को दोबारा उठाती हैं या नए मानकों के पुरानी तारीख से लागू करने की अनुमति देती हैं, तो वे भारत में निवेश के पूर्व जोखिम को बढ़ा देती हैं। आज एक विदेशी निवेशक को केवल व्यापारिक जोखिम ही नहीं बल्कि इस जोखिम को भी ध्यान में रखना पड़ता है कि आज हस्ताक्षरित कर संधि की कल दोबारा व्याख्या की जा सकती है। हम अब ऐसे कर अधिकारियों की व्यवस्था में हैं जिनका आर्थिक वृद्धि का ज्ञान कमजोर है, और एक न्यायिक प्रणाली की भी, जो अनुबंधों की पवित्रता और टीआरसी की प्रधानता को बनाए रखने में विफल रही है। कोई देश अपने विचारकों से बेहतर नहीं हो सकता।
भारतीय आर्थिक विकास की परवाह करने वाले लोगों के एजेंडा में चार नीति परियोजनाएं शीर्ष पर होनी चाहिए। वे हैं: सीमा शुल्क हटाना, माल एवं सेवा कर (जीएसटी) में इनपुट क्रेडिट की रुकावटें हटाना, कार्बन कर लागू करना, और निवास-आधारित कराधान अपनाना। यह समझ अफसरशाही, राजस्व विभाग और न्यायपालिका तक फैलनी चाहिए।
(लेखक क्रमश: एक्सकेडीआर फोरम के शोधकर्ता और ट्रस्टब्रिज रूल ऑफ लॉ फाउंडेशन के प्रबंध निदेशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं)