सरकार ने नई नैशनल इलेक्ट्रिसिटी पॉलिसी (National Electricity Policy) का मसौदा जारी किया है, जिसके अंतर्गत देश के बिजली क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश और सुधारों की योजना बनाई गई है। पॉलिसी के अनुसार, 2032 तक 50 लाख करोड़ रुपये और 2047 तक 200 लाख करोड़ रुपये का निवेश पावर प्रोडक्शन, ट्रांसमिशन और डिस्ट्रिब्यूशन सेक्टर्स में किया जाएगा।
इस नई पॉलिसी का मकसद पावर सेक्टर को वित्तीय रूप से मजबूत बनाना, इसे व्यावसायिक रूप से सस्टेनेबल करना और 2047 तक प्रति व्यक्ति बिजली खपत को 4,000 यूनिट (kWh) तक पहुंचाना है। इसके साथ ही बिजली आपूर्ति में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और गैर-जीवाश्म ऊर्जा की हिस्सेदारी को तेजी से बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
ड्राफ्ट पॉलिसी में कहा गया है कि देश की बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) पर इस समय करीब 6.9 लाख करोड़ रुपये का घाटा है और उनका कुल बकाया कर्ज 7.18 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। पॉलिसी में यह भी माना गया है कि मौजूदा बिजली दरें लागत के अनुरूप नहीं हैं और क्रॉस-सब्सिडी के कारण उद्योगों को महंगी बिजली मिल रही है, जिससे भारतीय उद्योगों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा कमजोर हो रही है।
नई National Electricity Policy के अंतर्गत सरकार ने पावर डिस्ट्रिब्यूशन सेक्टर में एकाधिकार को खत्म करने का प्रस्ताव रखा है। इसके लिए एक ही इलाके में एक से ज्यादा बिजली सप्लायरों को अनुमति देने, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) को बढ़ावा देने और स्ट्रिब्यूशन कंपनियों को शेयर बाजार में लिस्ट करने की योजना है।
ड्राफ्ट में यह भी कहा गया है कि हर वित्त वर्ष की शुरुआत से पहले टैरिफ ऑर्डर जारी होना अनिवार्य होगा। पिछले साल के खर्चों का समायोजन उसी वित्त वर्ष में किया जाएगा और डिस्ट्रिब्यूशन व सप्लाई टैरिफ को अलग-अलग दिखाया जाएगा। नियामकीय प्रक्रिया को 120 दिनों के भीतर पूरा करने की व्यवस्था का भी प्रस्ताव है।
पॉलिसी के मुताबिक, FY27 से बिजली दरें पूरी तरह लागत आधारित होंगी और रेगुलेटरी एसेट बनाने से बचा जाएगा। अगर राज्य नियामक आयोग समय पर टैरिफ तय नहीं करता है, तो दरों में ऑटोमैटिक सालाना संशोधन लागू किया जा सकेगा।
इसके अलावा, बिजली खरीद लागत में बढ़ोतरी को हर महीने सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचाने और कीमतों में उतार-चढ़ाव को संभालने के लिए स्टेबलाइजेशन फंड बनाने का सुझाव दिया गया है। फिक्स्ड लागत की वसूली डिमांड चार्ज के जरिए बढ़ाने पर भी जोर है।
नई National Electricity Policy में यह भी प्रस्ताव है कि NaBFID और NIIF के तहत विशेष ऊर्जा क्षेत्र के फंड बनाए जाएं, ताकि नॉन-फॉसिल और ग्रीन एनर्जी परियोजनाओं के लिए पूंजी जुटाई जा सके। बिजली परियोजनाओं में निवेश बढ़ाने के लिए फर्स्ट-लॉस गारंटी, रिजर्व फंड और मल्टीलेटरल डेवलपमेंट बैंकों से मिलने वाली गारंटी जैसे उपायों को अपनाने की बात कही गई है।