श्रीलंका में भारतीय शांति सेना (आईपीकेएफ) में अपनी सेवाएं दे चुके एक पूर्व सैनिक जोश में बोल पड़े, ‘हो गया! हो गया!’ यह 14 जनवरी की बात है, जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पूर्व सैनिकों के अभिनंदन समारोह में कहा था: ‘तत्कालीन सरकार का श्रीलंका में भारतीय सेना भेजने का निर्णय विवादास्पद है। मैं इसमें नहीं पड़ना चाहता। लेकिन मेरा मानना है कि ऑपरेशन पवन में भाग लेने वाले हमारे आईपीकेएफ सैनिकों के बलिदान का सम्मान किया जाना चाहिए।’
यह पहली बार है जब भारत सरकार ने आईपीकेएफ को एक वास्तविक अभियान बल और ऑपरेशन पवन को अगर हस्तक्षेप नहीं तो एक प्रमुख क्षेत्रीय सैन्य अभियान के रूप में मान्यता देने का सबसे करीबी कदम उठाया है। यह ऑपरेशन उत्तरी और पूर्वी श्रीलंका में जातीय संघर्ष को समाप्त करने के लिए आतंकी समूह लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई) के खिलाफ युद्ध (1987-1990) के लिए किया गया था।
चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, जनरल अनिल चौहान ने 2024 में देहरादून में आईपीकेएफ के पूर्व सैनिकों से कहा था: ‘हम सैकड़ों ऑपरेशन के दौरान लड़े हैं; ऑपरेशन पवन तो बस एक छोटा सा ऑपरेशन था।’ राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में आईपीकेएफ का उल्लेख केवल नाममात्र का है, जबकि श्रीलंका की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखने के लिए 1,157 भारतीय सैनिक शहीद हुए और सभी रैंकों के 3,009 सैनिक घायल हुए।
श्रीलंका से शांति सेना की वापसी की पिछले साल 35वीं वर्षगांठ पर, ऑपरेशन पवन के 150 पूर्व सैनिक और उनके परिवार अपराह्न 3 से 4 बजे के बीच ‘मौन श्रद्धांजलि’ के लिए एकत्रित हुए। ‘मौन’ का अर्थ था कि शहीदों के सम्मान में कोई भी धुन नहीं बजाई गई। कई दशकों से परिवार और सेवानिवृत्त सैनिक ऑपरेशन पवन को ‘आधिकारिक’ मान्यता दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सिंह की टिप्पणियों ने उम्मीदों को नई किरण दिखाई है।
सवाल उठता है कि शांति सेना के शहीदों को आधिकारिक तौर पर मान्यता और सम्मान क्यों नहीं दिया जा रहा है, और इसके पूर्व सैनिकों को केवल मौन श्रद्धांजलि क्यों दी जा रही है? क्या सरकार वाकई अब इस मामले में अपना रुख बदल रही है?
जब शांति सेना श्रीलंका से लौटी, तब तमिलनाडु में द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) की सरकार सत्ता में थी और वह केंद्र में गठबंधन सरकार का हिस्सा थी। वर्ष 2009 में जब एलटीटीई की हार हुई थी, तब द्रमुक फिर से सत्ता में आ गई। संप्रग सरकार में द्रमुक के 29 सांसद होने के कारण भारत की श्रीलंका नीति में यहां के तमिल कारक का गहरा प्रभाव पड़ा।
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकारों ने भी तमिलनाडु में कोई विवाद खड़ा न करने का विकल्प चुना। वाजपेयी सरकार के कार्यकाल के दौरान, आंतरिक और बाहरी चुनौतियों के दबाव के कारण आईपीकेएफ को मान्यता देना सरकार की सबसे अनिवार्य प्राथमिकताओं की सूची में शामिल नहीं था। लेकिन 2014 के बाद जनवरी 2026 में पहली बार सरकार ने यह स्वीकार करने के करीब कदम बढ़ाया कि शांति सेना के योगदान को नजरअंदाज करना एक चूक थी। आज तक ऑपरेशन पवन की सफलता पर असहज सरकारी चुप्पी बनी हुई है, मुख्य रूप से इसलिए कि शांति सेना ने 32 महीनों में अपने कई राजनीतिक और सैन्य उद्देश्य हासिल कर लिए, लेकिन राजनीतिकऔर डिप्लोमैटिक ट्रैक तालमेल नहीं बिठा पाए।
आईपीकेएफ का अंतिम दल त्रिंकोमाली बंदरगाह से आईएनएस मगर नामक पोत पर श्रीलंका से रवाना हुआ और 24 मार्च, 1990 को तत्कालीन मद्रास पहुंचा। वहां उनका स्वागत आईटीकेएफ (इंडियन तमिल किलिंग फोर्स) लिखे बैनरों से किया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह द्रमुक को नाराज करने के डर से शांति सेना का स्वागत करने के लिए मद्रास नहीं गए। उन्हें आईएल76 विमान से दिल्ली के पालम एयरपोर्ट ले जाया गया, जहां सिंह ने उनका अभिनंदन किया।
यह एक तरह से गुपचुप तरीके से उनका सम्मान करना था। तब से लेकर अब तक स्थितियां बहुत बदल चुकी हैं। राजनीतिक और कूटनीतिक जगत के वे अधिकांश नेता, जिन्होंने इतिहास पर अपना दबदबा बनाए रखा, अब हमारे बीच नहीं हैं। जो बचा है वह इतिहास है और उसे बदलना मुश्किल है।
इस महीने की शुरुआत में, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर उनसे यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि श्रीलंका सरकार द्वारा तैयार किए जा रहे नए संविधान के तहत श्रीलंका में रहने वाले तमिलों के अधिकारों की रक्षा की जाए। तमिलनाडु में इस साल के अंत में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं। उससे पहले, राज्य में श्रीलंका से जुड़े मुद्दों को फिर से उठाने का सक्रिय प्रयास किया जा रहा है।
द्रमुक खुद को दुनिया भर में तमिल भाषी लोगों के प्रतिनिधि के रूप में पेश करती रहती है, लेकिन तमिलनाडु में एक ऐसा वर्ग है जो राज्य में एलटीटीई और अन्य समूहों की गतिविधियों को कानून-व्यवस्था के लिए खतरा मानता है। जयललिता ने तो यहां तक मांग की थी कि एलटीटीई का समर्थन करने के लिए द्रमुक सरकार को बर्खास्त किया जाए और उस पर लगे प्रतिबंध को बढ़ाया जाए। संभवतः राजनाथ सिंह भाजपा की ओर से आईपीकेएफ के प्रति अधिक सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाने की अपील इसी वर्ग को ध्यान में रखकर कर रहे हैं।
भारत के सैन्य इतिहास में आईपीकेएफ को उसका उचित स्थान मिलेगा या नहीं, यह तो सरकार में बैठे लोगों को तय करना है, लेकिन यहां राजनीति सर्वोपरि है।