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पाकिस्तान से ‘आजादी’ हासिल करने का वक्त: हर मोर्चे पर भारत से बढ़ता फासला

पाकिस्तान ज्यादातर क्षेत्रों में भारत की बराबरी करने की हालत में नहीं है। दोनों देशों के बीच अंतर बढ़ने ही वाला है

Last Updated- January 18, 2026 | 9:44 PM IST
Pakistan
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

इस शीर्षक का उपयोग करने में कई जोखिम हैं। इस पर क्लिकबेट पत्रकारिता में लिप्त होने का आरोप लगने से लेकर मानसिक चिकित्सक को दिखाने तक की सलाह मिल सकती है। मैं विनती करता हूं, कृपया मेरी बात सुनें। 

पाकिस्तान किसी भी क्षेत्र में भारत की बराबरी नहीं कर सकता है। चाहे वह सैन्य शक्ति हो, अर्थव्यवस्था हो, संस्कृति और सॉफ्ट पावर हो, या वैश्विक छवि। वह अवसर 1983 में ही खत्म हो गया था, जब पाकिस्तान ने भारत को हजारों घाव देकर कमजोर करने की नीति अपनाई थी। यह जनरल जिया-उल-हक का पाकिस्तान था, जो अफगान जिहाद की ऊंचाई पर था और हमारे पंजाब में समस्याएं बढ़ रही थीं। यही वह मोड़ था जिसने पाकिस्तान को निरंतर पतन की राह पर धकेल दिया था। 

बाद के दशकों में उसका और तेजी से पतन हुआ। आज उसका प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) भारत के 55 फीसदी के बराबर है। हर तिमाही के साथ यह अंतर बढ़ता ही जा रहा है। पाकिस्तान की आबादी भारत के पांचवें हिस्से के बराबर है लेकिन उसका जीडीपी भारत के जीडीपी के 10वें हिस्से के बराबर है। साक्षरता, जीवन प्रत्याशा, उच्च शिक्षा आदि के क्षेत्र में भारत और पाकिस्तान के बीच अंतर लगातार बढ़ता ही जा रहा है। 

हाल ही में इस बात को लेकर उत्साह देखने को मिला कि पाकिस्तानी शेयर बाजार दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाले बाजारों में शामिल हैं जबकि भारत का बाजार लगभग 18 महीनों से ठहरा हुआ है। यह एक तथ्य है। लेकिन हकीकत यह भी है कि कराची स्टॉक एक्सचेंज (केएसई) का कुल बाजार पूंजीकरण, 18 महीने की लगातार तेजी के बाद भी, लगभग 70 अरब डॉलर है। यह नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के केवल 1.35 फीसदी के बराबर है।

आज सात ऐसी भारतीय कंपनियां हैं जो अकेले ही कराची स्टॉक एक्सचेंज से अधिक मूल्यवान हैं। रिलायंस साढ़े तीन गुना है, एचडीएफसी, भारती एयरटेल और टीसीएस लगभग दो गुना या उससे भी अधिक हैं। 14 भारतीय कंपनियों का मूल्यांकन 50 अरब डॉलर से अधिक है। पाकिस्तान का अमेरिका के साथ व्यापार भारत के व्यापार का दसवां हिस्सा भी नहीं है। चीन से उसका आयात केवल करीब 16 अरब डॉलर है जबकि चीन उसका सबसे मूल्यवान सहयोगी, संरक्षक और सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। इसमें 85फीसदी उसका सैन्य साजो-सामान आयात शामिल है।

भारत का चीन से आयात कुल 116 अरब डॉलर है और इसमें हथियार शामिल नहीं है। लगभग हर आर्थिक संकेतक पर पाकिस्तान भारत से पीछे है। पाकिस्तान की दो सबसे बड़ी विमानन कंपनियों के पास 44 विमान हैं, जबकि इंडिगो और एयर इंडिया के पास मिलकर 700 विमान हैं और वे हर सप्ताह एक नया विमान जोड़ रहे हैं। यह पाकिस्तान की तुलना में लगभग 16 गुना अधिक है।

हमारे पड़ोसी एकदम अलग लीग में बल्लेबाजी कर रहे हैं। लाखों करोड़ डॉलर के महत्त्वपूर्ण खनिज या भारी भरकम तेल भंडार की संभावनाएं केवल कपोल कल्पना हैं। इस समय इसे तथाकथित स्वयंभू फील्ड मार्शल की धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या से भी बल मिल रहा है, जिनका मानना है कि चूंकि पाकिस्तान इस्लामी कलमा के आधार पर मदीना के बाद बना दूसरा राष्ट्र है, इसलिए उसकी जमीन के नीचे भी सऊदी अरब की तरह तेल और खनिज होने चाहिए। जैसा कि ग़ालिब ने कहा है, ‘दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।’

पाकिस्तान के पास न केवल भारत की बराबरी करने का कोई अवसर नहीं है, बल्कि वह अंतर को बढ़ते हुए भी देखेगा। समय-समय पर उसके नेता अपनी जनता को वही झूठे वादे अलग-अलग रूपों में पेश करेंगे। महत्त्वपूर्ण खनिज, हाइड्रोकार्बन, सोना, और नवीनतम इस्लामी दुनिया और उसके गैर-राज्य लड़ाकों के लिए जेएफ-17 विमानों का जखीरा।

सच्चाई यह है कि भारत के साथ अंतर को कम करने का एकमात्र क्षेत्र पाकिस्तान के लिए जनसंख्या है। यहां उसकी वृद्धि भारत की तुलना में लगभग दोगुनी है। क्या आप यही चाहते हैं? मुनीर सहित पाकिस्तानी कुलीन वर्ग जानते हैं कि वे पीछे छूट चुके हैं। मुनीर की डंपर ट्रक बनाम चमकदार मर्सिडीज वाली टिप्पणी इसका उदाहरण है जिसमें उन्होंने भारत को तेज और नाजुक मर्सिडीज और पाकिस्तान को मजबूत और धीरे चलने वाला डंपर कहा था। पाकिस्तान कभी युद्ध नहीं जीत सकता, यहां तक कि एक छोटी झड़प भी नहीं। उसके पास केवल एक शक्ति है। भारत की गति को धीमा करने की शक्ति, और परमाणु उपमहाद्वीप को लेकर महाशक्तियों की चिंताओं को हवा देने की शक्ति।

भारत को इस नकारात्मक दबाव का मुकाबला करना सीखना होगा। सबसे पहले विचार करें कि क्या हमने पिछले दशक में पाकिस्तान को अपने मन में उसकी योग्यता से अधिक जगह दे दी है? क्या हमने अपनी राजनीति में उसे अनुचित महत्त्व दे दिया है? क्या हमने अपनी ध्रुवीकृत राजनीति में आर्थिक और रणनीतिक रूप से पराजित पाकिस्तान के लिए अनावश्यक रूप से जगह बना दी है?

नरेंद्र मोदी की शांति संबंधी पहल पठानकोट एयरबेस पर हुए आतंकी हमले से नष्ट हो गई थी। उसके बाद से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राजनीति तेजी से हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण पर निर्भर होती चली गई। इसमें दो राय नहीं है कि ‘सबका साथ/सबका विकास’ कल्याणकारी वितरण का काम करता है और किसी को भी उसकी पहचान के कारण लाभ से वंचित नहीं किया जाता। लेकिन भावनात्मक अपील केवल हिंदू मतदाता तक सीमित है और इसके लिए पाकिस्तान से खतरा जरूरी है।

बांग्लादेश के साथ चल रहे घटनाक्रम से समझा जा सकता है कि यह हमारे सामरिक हितों और हालात को कैसे प्रभावित करता है। भारत को शेख हसीना वाजेद के रूप में एक मित्र से वंचित किया गया, इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत को वहां कोई मित्र नहीं मिलेगा। चाहे जमात हो, या फिर मोहम्मद यूनुस पाकिस्तान के बारे में कुछ भी सोचते हों, बांग्लादेश तीन तरफ से भारत से घिरा हुआ है। भारत एक आवश्यक और बड़ा पड़ोसी है जिसके साथ अपरिहार्य संबंध हैं।

ध्रुवीकृत राजनीति, विशेषकर पश्चिम बंगाल और असम के चुनाव नजदीक होने के कारण, भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल और बिगड़ेंगे, इससे पहले कि भारत वहां की नई निर्वाचित सरकार के साथ सुधार शुरू करे। भले ही नई सरकार पाकिस्तान के साथ मित्रवत हो, पाकिस्तान बहुत दूर है और उसके पास कोई संसाधन नहीं हैं। बांग्लादेश को अपनी राजनीति और अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए भारत की सद्भावना की आवश्यकता होगी। जहां तक चीनी हथियारों की बात है तो हसीना ने भी अधिकांश हथियार चीन से ही खरीदे थे। इसलिए इसमें कोई अंतर नहीं है।

हमें मुस्तफिजुर रहमान के आईपीएल खेलने को लेकर हुए विवाद को इससे जोड़कर देखना होगा। आजकल कुछ लोग सॉफ्ट पावर का उल्लेख होते ही उत्तेजित हो जाते हैं। लेकिन क्रिकेट भारत की हार्ड पावर है, क्योंकि उपमहाद्वीप में इस खेल का महत्त्व अत्यधिक है।

जरा सोचिए क्या अफगान क्रिकेट टीम की मेजबानी और उसे संरक्षण देना सॉफ्ट पावर का प्रदर्शन है या हार्ड पावर का? क्या आप इसे पाकिस्तान को वर्तमान अफगान सरकार द्वारा दी जा रही परेशानियों से अलग करके देखेंगे? यही कारण है कि पाकिस्तानियों से हाथ न मिलाना, भले ही आप उनके साथ खेल रहे हों, और उस गुस्से को केवल क्रिकेट तक सीमित रखना, या आईपीएल फ्रैंचाइजी द्वारा चुने गए अकेले बांग्लादेशी खिलाड़ी को बाहर करना, भारत के पड़ोस में पाकिस्तान के लिए और अधिक जगह बनाता है। यह सॉफ्ट पावर का नुकसान है या हार्ड पावर का? यह हमारी सामरिक नीति को सोशल मीडिया के हवाले कर देता है।

यह कोई जल्दबाजी में किया गया सामान्यीकरण नहीं है। उसी अवधि में जब ‘हाथ न मिलाने’ और ‘पाकिस्तानी से ट्रॉफी न लेने’ की प्रवृत्ति उभरी, हमने जूनियर सुल्तान ऑफ जोहोर कप हॉकी लीग मैच (14 अक्टूबर, 2025) खेला, जहां खिलाड़ियों ने न केवल हाथ मिलाए बल्कि 3-3 की बराबरी से पहले हाई-फाइव भी किया। बेशक, भारत फाइनल में पहुंचा, पाकिस्तान नहीं।

क्या हॉकी खिलाड़ी कम देशभक्त थे? क्या सरकार ने कुछ कहा? कुछ नहीं। हॉकी की परवाह किसे है? जैसे एक चैंपियन हेवीवेट मुक्केबाज, अपने पंच के जैसे ही अपने फुटवर्क से भी लड़ता है। पाकिस्तान को भारत की जगह सीमित करनी है। भारत उस जाल में नहीं फंस सकता। फिलहाल, पाकिस्तानी कुछ संयमित दिखते हैं। लेकिन किसी समय, मुनीर कुछ न कुछ करेंगे। भारत को इसे नकारने के लिए अपने पड़ोस में संबंधों को फिर से बनाना होगा, चीन के साथ संबंधों को स्थिर करना होगा, और आंतरिक सामाजिक एकता बनाए रखनी होगी।

इसके अलावा रक्षा पर बड़े पैमाने पर खर्च शुरू करना होगा। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की हालत खराब है। उसे नए हथियारों की दौड़ में उलझाइए, और यह उसे और पीछे धकेल देगा। यह पड़ोसी को भिखारी बनाने जैसा लगता है? लेकिन उस पड़ोसी के साथ और क्या किया जा सकता है जिसका एकमात्र उद्देश्य आपको धीमा करने की कोशिश करना है।

हमें पाकिस्तान को अपनी राजनीति और अपने मन में गैर जरूरी स्थान देना बंद करना होगा।

First Published - January 18, 2026 | 9:44 PM IST

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