भारत की शहरी आवास संबंधी चुनौती केवल अपर्याप्त ऋण उपलब्धता या गृह-स्वामित्व योजनाओं से ही संबंधित नहीं है। हमारे शहर इस तरह की परिस्थितियां बनाने में विफल हो रहे हैं जहां किफायती घर बनाना आर्थिक रूप से व्यवहार्य हो। इसके परिणामस्वरूप परिवारों को अनौपचारिक बस्तियों में रहना पड़ता है, लंबी दूरी तय करनी पड़ती है और कर्ज का भारी बोझ उठाना पड़ता है। किफायती आवास पर नीति आयोग की नई रिपोर्ट इस संकट के कारण सामने रखती है।
जमीन का महंगा होना, प्रतिबंधात्मक नियोजन मानदंड, किराया बाजार का कमजोर होना, नियामकीय देरी और राजकोषीय प्रोत्साहनों को वापस लिया जाना। इसके परिणामस्वरूप किफायती आवास, डेवलपर्स और फाइनैंस करने वाले दोनों के लिए भारी जोखिम और कम लाभ वाला प्रस्ताव बन गया है। पिछले दशक में आवासीय निजी इक्विटी में 8 फीसदी से भी कम निवेश आया है, जबकि इस क्षेत्र में विदेशी फंडों का योगदान केवल 10.2 फीसदी रहा है।
नाइट फ्रैंक और नैशनल रियल एस्टेट डेवलपमेंट काउंसिल (नारेडको) के हालिया आंकड़े समस्या की गंभीरता को रेखांकित करते हैं। भारत के आठ प्रमुख शहरों में 50 लाख रुपये से कम कीमत वाले घरों के लिए आपूर्ति और मांग का अनुपात 2019 के 1.05 से घटकर 2025 की पहली छमाही में 0.36 हो गया। इस बीच, नई आपूर्ति में किफायती आवास का हिस्सा 2018 में 50 फीसदी से अधिक से गिरकर अब केवल 17 फीसदी रह गया है, जो बताता है कि रियल एस्टेट डेवलपर्स इस क्षेत्र से पीछे हट रहे हैं। शहरी किफायती आवास की कमी का अनुमान 94 लाख इकाइयों का है, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस), निम्न-आय वर्ग (एलआईजी) और मध्यम-आय वाले परिवारों की संयुक्त मांग वर्ष 2030 तक 3 करोड़ इकाइयों तक पहुंचने का अनुमान है।
नीति आयोग के प्रस्ताव किफायती आवास नीति में लंबे समय से प्रतीक्षित बदलाव के समान हैं। इसके केंद्र में आयकर अधिनियम की धारा 80-आईबीए को नए सिरे से जीवित करने का सुझाव है, जिसने 2016 से 2022 के बीच डेवलपर्स को स्वीकृत किफायती आवास परियोजनाओं से होने वाले लाभ पर पूर्ण कर छूट प्रदान की थी। इसे वापस लाने से परियोजना की अर्थव्यवस्था बेहतर होगी और नीति की निश्चितता का एक स्तर बहाल होगा, जिसकी निजी डेवलपर्स को सख्त कमी महसूस हुई है।
रिपोर्ट में यह सिफारिश भी की गई है कि किफायती आवास रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (रीट) के लिए किराये की आय और पूंजीगत लाभ को कर से मुक्त किया जाए। यह कदम उस श्रेणी में संस्थागत पूंजी आकर्षित करने के उद्देश्य से है, जो लंबे समय से वित्तीय संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि नैशनल हाउसिंग बैंक (एनएचबी) को कर-मुक्त बॉन्ड जारी करने की अनुमति दी जाए, जिनसे प्राप्त धनराशि ईडब्ल्यूएस और एलआईजी श्रेणी के लिए रियायती ऋण में लगाई जा सके। इसके साथ ही, एनएचबी और आवास एवं शहरी विकास निगम द्वारा समर्थित एक नए दीर्घकालिक कोष की स्थापना का प्रस्ताव है।
रिपोर्ट कहती है कि बड़ी आवासीय और वाणिज्यिक परियोजनाओं में 10 से 15 फीसदी ईडब्ल्यूएस और एलआईजी श्रेणी के आवास होने चाहिए। अतिरिक्त उपायों में स्टाम्प शुल्क और पंजीयन शुल्क में रियायत, भूमि उपयोग परिवर्तन शुल्क में रियायत और कम से कम आधे फ्लोर एरिया रेशियो को किफायती इकाइयों के लिए उपयोग करने पर प्रोत्साहन शामिल हैं। सबसे अहम बात यह है कि रिपोर्ट किराये के आवास को वाणिज्यिक के बजाय आवासीय मानने की सिफारिश करती है, जिससे बिजली और पानी के शुल्क कम हो सकें।
इन सुधारों की सफलता राज्यों और शहरों द्वारा क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। केन्या में थ्री डी प्रिंटेड घरों से लेकर नेपाल में सामुदायिक भागीदारी और सहयोगी वित्तपोषण मॉडल तक, वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएं यह दर्शाती हैं कि विविध रणनीतियों को बढ़ाया जा सकता है ताकि आवास किफायती बने। सार्वजनिक भूमि का उपयोग सार्वजनिक आवास परियोजनाओं के लिए करना, फ्लोर स्पेस इंडेक्स पर मानदंडों को युक्तिसंगत बनाना, आसपास के क्षेत्रों में परिवहन और बुनियादी ढांचे में निवेश करना, और विश्वसनीय, प्रौद्योगिकी-सक्षम आवास डेटा प्रणालियां बनाना प्रस्तावित प्रोत्साहनों के पूरक के रूप में होना चाहिए।