भारत में पवन ऊर्जा (Wind Energy) की शुरुआत के दौर को याद करते हुए सुजलॉन एनर्जी के वाइस चेयरमैन गिरीश तांती ने कहा कि कभी लोग विंडमिल (पवन चक्कियां) को “बड़े पंखे” कहकर मजाक उड़ाते थे और मानते थे कि ये बिजली बनाने के बजाय ज्यादा खपत करेंगे। लेकिन आज भारत दुनिया की कुल पवन ऊर्जा मांग का करीब 10 प्रतिशत हिस्सा निर्यात के जरिए पूरा करने की स्थिति में है।
दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की वार्षिक बैठक के दौरान पीटीआई से बातचीत में तांती ने कहा कि 30 साल पहले जब सुजलॉन ने अपना सफर शुरू किया था, तब पवन ऊर्जा को व्यवहारिक विकल्प नहीं माना जाता था। आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है और भारत की करीब 50 प्रतिशत ऊर्जा जरूरतें रिन्यूएबल सोर्स से पूरी हो रही हैं। उन्होंने कहा कि देश 2070 तक 100 प्रतिशत कार्बन न्यूट्रल बनने के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है।
सुजलॉन अब अपने अगले विकास चरण के लिए तैयार है। कंपनी Wind 2.0 के जरिए अपने कोर विंड एनर्जी बिजनेस को नए सिरे से मजबूत कर रही है, जबकि Suzlon 2.0 के तहत पवन ऊर्जा से जुड़े और उससे आगे के क्षेत्रों में विस्तार की योजना बना रही है। तांती ने कहा कि Wind 2.0 के तहत प्रोडक्ट डेवलपमेंट को अलग डिवीजन के रूप में विकसित किया जा रहा है, साथ ही EPC और सर्विस बिजनेस को भी मजबूत किया जा रहा है। इसमें डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, ग्राहकों को बेहतर वैल्यू और कार्यस्थल पर सुरक्षा पर खास ध्यान दिया जाएगा।
उन्होंने बताया कि सुजलॉन दुनिया की उन गिनी-चुनी पांच कंपनियों में शामिल है, जो अब भी वैश्विक पवन ऊर्जा कारोबार में सक्रिय हैं। इनमें अमेरिका की GE और यूरोप की Siemens, Vestas और Nordex शामिल हैं। सुजलॉन इन कंपनियों में ग्लोबल साउथ से आने वाली इकलौती कंपनी है।
तांती ने कहा कि आज एक अकेला विंड टर्बाइन साल में करीब एक करोड़ यूनिट बिजली पैदा कर सकता है, जो पूरे गांव की जरूरतें पूरी करने के लिए काफी है। उन्होंने बताया कि सुजलॉन के साथ वैल्यू चेन में 2,500 से ज्यादा MSME जुड़े हुए हैं, जो घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को मजबूती दे रहे हैं।
ऊर्जा सुरक्षा पर बात करते हुए तांती ने कहा कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिससे विदेशी मुद्रा पर दबाव और जलवायु संबंधी चुनौतियां बढ़ती हैं। 2047 तक GDP में 10 गुना वृद्धि के साथ ऊर्जा मांग भी तेजी से बढ़ेगी, ऐसे में रिन्यूएबल एनर्जी ही देश को आत्मनिर्भर बना सकती है।
उन्होंने कहा कि अब तकनीक इतनी आगे बढ़ चुकी है कि सोलर और विंड एनर्जी सिर्फ धूप या हवा पर निर्भर नहीं रह गई हैं। स्टोरेज टेक्नॉलजी के कारण अब 24×7 स्थिर पावर सप्लाई संभव है और इसकी लागत पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों से भी कम है।
इलेक्ट्रिक वाहनों और AI के बढ़ते इस्तेमाल पर उन्होंने कहा कि अगर मंशा हो तो EV चार्जिंग और डेटा सेंटर्स को पूरी तरह ग्रीन एनर्जी से चलाना संभव है। भारत में बनने वाले नए डेटा सेंटर्स शुरू से ही ग्रीन एनर्जी आधारित होंगे और उनकी पूरी बिजली जरूरत रिन्यूएबल सोर्स से पूरी की जा सकती है।