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स्मार्टफोन सिक्योरिटी पर सख्ती: सोर्स कोड शेयरिंग से कंपनियों में बेचैनी, Apple-Samsung ने जताई आपत्ति

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन ने बताया कि इंडस्ट्री की कोई भी सही चिंता को वे खुले मन से सुनेंगे और उस पर काम करेंगे

Last Updated- January 11, 2026 | 6:26 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

भारत सरकार स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियों से उनके फोन के सोर्स कोड को शेयर करने की मांग कर रही है। ये सब सिक्योरिटी को मजबूत बनाने के लिए है, लेकिन एप्पल और सैमसंग जैसी बड़ी कंपनियां इसका पीछे से विरोध कर रही हैं। सरकार ने कुल 83 सिक्योरिटी स्टैंडर्ड्स तैयार किए हैं, जिनमें कंपनियों को बड़े सॉफ्टवेयर अपडेट्स के बारे में पहले से सरकार को बताना भी शामिल है। ये प्लान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वो कोशिश का हिस्सा है, जिसमें यूजर्स के डेटा को सुरक्षित रखना है, क्योंकि ऑनलाइन फ्रॉड और डेटा लीक के मामले बढ़ते जा रहे हैं। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन मार्केट है, जहां करीब 75 करोड़ फोन इस्तेमाल हो रहे हैं।

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन ने बताया कि इंडस्ट्री की कोई भी सही चिंता को वे खुले मन से सुनेंगे और उस पर काम करेंगे। उन्होंने ये भी कहा कि अभी इसमें ज्यादा कुछ पढ़ना जल्दबाजी होगी। मिनिस्ट्री के एक स्पोक्सपर्सन ने कहा कि टेक कंपनियों से बातचीत चल रही है, इसलिए ज्यादा कमेंट नहीं कर सकते। एप्पल, सैमसंग, गूगल, शाओमी और इंडियन इंडस्ट्री ग्रुप MAIT ने इस पर कोई जवाब नहीं दिया।

सरकार और कंपनियों के बीच पुरानी खींचतान

पहले भी भारत सरकार के नियमों से टेक कंपनियां परेशान हो चुकी हैं। जैसे, पिछले महीने सरकार ने एक ऑर्डर वापस लिया था, जिसमें फोन्स पर एक सरकारी साइबर सेफ्टी ऐप लगाना जरूरी था। वो ऐप सर्विलांस की चिंता से जुड़ा था। लेकिन पिछले साल सिक्योरिटी कैमरों पर सख्त टेस्टिंग के नियम लागू करने में सरकार ने कंपनियों की लॉबिंग को नजरअंदाज कर दिया, क्योंकि चाइनीज स्पाइंग का डर था।

मार्केट की बात करें तो शाओमी का 19% शेयर है, सैमसंग का 15% और एप्पल का 5%, ये काउंटरपॉइंट रिसर्च के आंकड़े हैं। शाओमी और सैमसंग के फोन गूगल के एंड्रॉयड पर चलते हैं। नई इंडियन टेलीकॉम सिक्योरिटी अश्योरेंस रिक्वायरमेंट्स में सबसे संवेदनशील चीज सोर्स कोड का एक्सेस है। सोर्स कोड वो बेसिक प्रोग्रामिंग इंस्ट्रक्शन्स हैं जो फोन को चलाते हैं। सरकार चाहती है कि ये कोड इंडियन लैब्स में चेक और टेस्ट किया जाए।

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सॉफ्टवेयर में बदलाव और कंपनियों की चिंताएं

सरकार के प्लान में कंपनियों को कुछ सॉफ्टवेयर चेंजेस भी करने होंगे। जैसे, फोन में पहले से इंस्टॉल ऐप्स को यूजर्स आसानी से हटा सकें। साथ ही, ऐप्स को बैकग्राउंड में कैमरा या माइक्रोफोन इस्तेमाल करने से रोकना, ताकि कोई गलत इस्तेमाल न हो। दिसंबर में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) मंत्रालय के एक डॉक्यूमेंट में मीटिंग्स के डिटेल्स हैं, जहां एप्पल, सैमसंग, गूगल और शाओमी के साथ बात हुई। इंडस्ट्री ने कहा कि दुनिया में कहीं भी ऐसे सिक्योरिटी रूल्स नहीं लगाए गए हैं।

ये स्टैंडर्ड्स 2023 में ड्राफ्ट हुए थे, लेकिन अब सरकार इन्हें कानूनी तौर पर लागू करने की सोच रही है। मंगलवार को इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) मंत्रालय और टेक एक्जीक्यूटिव्स की मीटिंग होनी है, जहां और चर्चा होगी। कंपनियां कह रही हैं कि सोर्स कोड की रिव्यू और एनालिसिस मुमकिन नहीं है। एप्पल ने 2014 से 2016 तक चीन की सोर्स कोड की मांग को ठुकरा दिया था, और अमेरिका में लॉ एनफोर्समेंट भी इसे हासिल नहीं कर पाया।

भारत के प्लान में “वुल्नरेबिलिटी एनालिसिस” और “सोर्स कोड रिव्यू” है, जिसमें कंपनियों को पूरा सिक्योरिटी असेसमेंट करना होगा। फिर इंडियन टेस्ट लैब्स उनके क्लेम्स को सोर्स कोड चेक करके वेरिफाई करेंगे। MAIT ने एक सीक्रेट डॉक्यूमेंट में कहा कि ये प्राइवेसी और सीक्रेसी की वजह से नहीं हो सकता। यूरोप, नॉर्थ अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के बड़े देशों में ऐसे रूल्स नहीं हैं। MAIT ने पिछले हफ्ते मिनिस्ट्री से ये प्रपोजल ड्रॉप करने को कहा।

नियम जो बैटरी और स्टोरेज पर डाल सकते हैं असर

सरकार चाहती है कि फोन्स में ऑटोमैटिक और रेगुलर मालवेयर स्कैनिंग हो। साथ ही, कंपनियों को बड़े सॉफ्टवेयर अपडेट्स और सिक्योरिटी पैचेस के बारे में नेशनल सेंटर फॉर कम्युनिकेशन सिक्योरिटी को पहले बताना होगा। ये सेंटर उन अपडेट्स को टेस्ट कर सकता है। MAIT के डॉक्यूमेंट में लिखा है कि रेगुलर मालवेयर स्कैनिंग से फोन की बैटरी जल्दी खत्म हो जाएगी। और अपडेट्स के लिए सरकार की मंजूरी लेना प्रैक्टिकल नहीं है, क्योंकि अपडेट्स जल्दी रिलीज करने पड़ते हैं।

एक और रूल है कि फोन के लॉग्स, जो सिस्टम एक्टिविटी के डिजिटल रिकॉर्ड्स हैं, को कम से कम 12 महीने तक डिवाइस पर स्टोर रखना। MAIT ने कहा कि फोन में इतनी जगह नहीं है कि एक साल के लॉग्स रख सकें। ये सब चीजें कंपनियों को परेशान कर रही हैं, क्योंकि उनका कहना है कि इससे उनके प्रोप्राइटरी डिटेल्स लीक हो सकते हैं और ग्लोबल प्रैक्टिस से अलग है। सरकार का मकसद यूजर डेटा को सुरक्षित रखना है, लेकिन इंडस्ट्री इसे अपनी प्राइवेसी पर हमला मान रही है। बातचीत अभी चल रही है, देखना होगा कि क्या कोई बीच का रास्ता निकलता है।

(रॉयटर्स के इनपुट के साथ)

First Published - January 11, 2026 | 6:14 PM IST

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