कई सेमीकंडक्टर (सेमीकॉन) विनिर्माण संयंत्र इस वर्ष वाणिज्यिक उत्पादन शुरू करने के लिए तैयार हैं और इंडियाएआई मिशन के तहत उन्हें बड़ा प्रोत्साहन दिया जा रहा है। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सुरजीत दास गुप्ता को एक ईमेल साक्षात्कार में भारत को प्रमुख वैश्विक दिग्गज बनने के लिए सरकार की रणनीति के बारे में बताया। बातचीत के मुख्य अंश:
आपने कहा है कि 2032 तक भारत के पास सेमीकंडक्टर निर्माण में विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनने के लिए पर्याप्त क्षमता होगी। भारत के पास किस प्रकार की क्षमता होगी?
आर्टीफिशल इंटेलिजेंस (एआई), इलेक्ट्रिक वाहन, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल फोन से बढ़ती मांग के कारण सेमीकंडक्टर उद्योग तेजी से बढ़ रहा है। हमने 10 इकाइयों के साथ एक मजबूत शुरुआत की है। चार संयंत्र – सीजी सेमी, केयन्स टेक्नॉलजी, माइक्रोन टेक्नॉलजी और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स (असम में) 2026 में वाणिज्यिक उत्पादन शुरू करेंगे।
हमारी डिजाइन पहलों ने अच्छा काम किया है। इसमें 23 स्टार्टअप शामिल हैं। प्रतिभा विकास कार्यक्रम सभी 313 विश्वविद्यालयों में शुरू किए गए हैं। उपकरण निर्माता भी भारत में संयंत्र लगा रहे हैं।
इन सभी कारक से एक ऐसा इकोसिस्टम बन रहा है जो भारत को वर्ष 2028 तक प्रमुख सेमीकंडक्टर दिग्गज के रूप में खड़ा कर देगा। 2028 के बाद की अवधि उस चरण को बताएगी जब सेमीकंडक्टर वृद्धि एक प्रमुख स्तर को पार कर जाएगी। प्रतिभा, डिजाइन और विनिर्माण इकोसिस्टम के साथ भारत वर्ष 2032 तक प्रमुख सेमीकंडक्टर दिग्गजों में से एक होगा। हम तब तक 3-नैनोमीटर चिप का निर्माण कर रहे होंगे।
कई आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली ऐंड टेस्ट (ओएसएटी) कंपनियां यह सुनिश्चित करने के लिए वैश्विक भागीदारों या सेमीकंडक्टर फर्मों के साथ तालमेल कर रही हैं कि भारत में बनाई गई क्षमता का उपयोग किया जाए। सरकार यह कैसे सुनिश्चित करेगी कि भारत की अपनी मांग घरेलू ओएसएटी और फैब्रिकेशन संयंत्रों से पूरी की जाए?
हर नए उद्योग को बाजार स्वीकार्यता की कसौटी से गुजरना पड़ता है और हमारे संयंत्र भी इसका कोई अपवाद नहीं होंगे। उनकी सफलता उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर बनाने की उनकी क्षमता पर निर्भर करेगी। हम उन्हें लगातार इस वास्तविकता की याद दिलाते हैं और उस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
भारतीय एआई वृद्धि वैश्विक प्रौद्योगिकी दिग्गजों की बड़ी घोषणाओं से प्रेरित लगती है। आलोचकों का तर्क है कि इससे भारत को कोई लाभ नहीं होता है क्योंकि पेटेंट और सॉफ्टवेयर नियंत्रण अमेरिका में ही रहते हैं। दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने बड़ी कंपनियों के साथ काम करते हुए सॉवरिन एआई बनाने के लिए 150 अरब डॉलर की प्रतिबद्धता जताई है। इसे देखते हुए भारत कैसे प्रतिस्पर्धा करेगा और वैश्विक डेटा सेंटर हब बनने से उसे कैसे लाभ होगा?
सॉवरिन एआई भारत का राष्ट्रीय लक्ष्य है। हमारे इंजीनियर मॉडल विकसित कर रहे हैं, चिपसेट पर काम कर रहे हैं और ऐप्लीकेशन्स पर ध्यान दे रहे हैं। हमें एआई स्टैक की सभी पांच लेयर -ऐप्लीकेशन, मॉडल, चिपसेट, इन्फ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी में प्रतिस्पर्धी होने की जरूरत है। भारत का सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग विश्व स्तर पर एआई सेवाएं मुहैया कराने के लिए आगे बढ़ रहा है। इंडियाएआई मिशन के साथ काम करने वाली 12 टीमें आधार मॉडल विकसित कर रही हैं। कई डिजाइन टीमें चिपसेट पर काम कर रही हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर में लगभग 70 अरब डॉलर का निवेश किया जा रहा है। हाल में बना सस्टेनेबल हार्नेसिंग ऐंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया ऐक्ट-शांति कानून स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा के प्रावधान का समर्थन करेगा।
इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जों के लिए पीएलआई योजना रफ्तार पकड़ रही है। इससे स्थानीयकरण में कितनी मदद मिलेगी?
भारत की आपूर्ति श्रृंखला बड़े पैमाने पर विकसित होगी। इलेक्ट्रॉनिक्स कलपुर्जा निर्माण योजना को शानदार प्रतिक्रिया मिली है। हम निर्यात के लिए कई पुर्जों का निर्माण करने में सक्षम होंगे और कार्यक्रम समाप्त होने तक अधिकांश पुर्जों के लिए घरेलू मांग पूरी हो जाएगी।