भारत और अमेरिका के रिश्तों में व्याप्त असहजता कम होती नहीं दिख रही है। हाल के दिनों में अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और उनके प्रशासन के सदस्यों द्वारा भारत के बारे में दिए गए बयान निराश करने वाले हैं। भारत की प्रतिक्रिया इस बारे में उचित ही संयमित रही है। ट्रंप ने पिछले सप्ताह एक ऐसे विधेयक का समर्थन किया जो उन्हें उन देशों पर कम से कम 500 फीसदी का शुल्क लगाने का अधिकार देगा जो रूस के यूरेनियम और पेट्रोलियम उत्पाद खरीद रहे हैं। इस विधेयक को द्विदलीय समर्थन प्राप्त है और संभवतः आने वाले दिनों में इसे पारित होने में अधिक कठिनाई नहीं होगी।
यह विधेयक निकट भविष्य में अमेरिका के साथ व्यापार समझौते तक पहुंचने की भारत की संभावनाओं पर गंभीर असर डालेगा। इस प्रकार, भले ही अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय कानूनी आधार पर ट्रंप द्वारा लगाए गए शुल्क को खारिज कर दे लेकिन यदि प्रस्तावित विधेयक पारित हो जाता है तो भारत लाभान्वित नहीं होगा।
ट्रंप प्रशासन ने भारत को रूसी तेल खरीदने के कारण पहले ही 25 फीसदी के अतिरिक्त शुल्क से दंडित कर रखा है। भारत से होने वाले आयात के करीब 55 फीसदी हिस्से पर वह 50 फीसदी शुल्क लगा रहा है। ध्यान रहे कि रूस से सबसे अधिक तेल खरीदने और गहरे व्यापारिक रिश्ते रखने के बावजूद अमेरिका ने चीन को निशाना नहीं बनाया है। ऐसा इसलिए किया गया है क्योंकि चीन जवाबी कार्रवाई कर सकता है। ऐसे में यह संभव है कि नए कानून के साथ ट्रंप प्रशासन भारत पर और अधिक दबाव बनाए। रिपोर्ट के अनुसार भारत द्वारा रूस से आयात किए जाने वाले तेल की मात्रा में काफी कमी की गई है। खबरों के मुताबिक जनवरी के आरंभ में भारत की तेल खरीद 7.29 करोड़ यूरो की रही जबकि जुलाई 2023 में यह 18.90 करोड़ यूरो की थी।
चूंकि कच्चे तेल की कीमतें कमोबेश कम रही हैं इसलिए शायद भारतीय आयातक आसानी से रूसी तेल से दूरी बना सकें। जो कुछ दांव पर लगा है उसे और ट्रंप प्रशासन के रिकॉर्ड को देखते हुए भारतीय तेल आयातकों को सरकार से उचित सलाह मिलनी चाहिए। जैसा कि एक विशेषज्ञ ने इसी समाचार पत्र से कहा था, 500 फीसदी की शुल्क दर प्रभावी रूप से भारत के अमेरिकी निर्यात को ठप कर देगी।
साल 2024 में भारत ने अमेरिका को 87.3 अरब डॉलर का निर्यात किया जिसमें उसे 45.8 अरब डॉलर का अधिशेष हासिल हुआ। उसी वर्ष भारत ने 41.6 अरब डॉलर मूल्य की सेवाओं का भी निर्यात किया जिसमें मामूली घाटे का सामना करना पड़ा। यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिकी सरकार सेवाओं पर कैसे कर लगाएगी? यह कहा गया है कि इससे संभवतः अतिरिक्त करों के रूप में भारतीय सेवाओं का आयात करने वाली अमेरिकी कंपनियों पर दबाव पड़ सकता है।
अमेरिका द्वारा 500 फीसदी शुल्क लगाए जाने की आशंका भारतीय अर्थव्यवस्था पर बहुत गहरा असर डाल सकती है और इसका असर पिछले सप्ताह शेयर बाजार की घबराहट में भी दिखाई दिया। इसलिए भारत के लिए यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण होगा कि वह ट्रंप और उनके प्रशासन को अपनी स्थिति के बारे में समझाए। अमेरिका को निर्यात पर कोई भी अतिरिक्त शुल्क भारत को विभिन्न प्रकार के जोखिमों के सामने ला सकता है।
उदाहरण के लिए, अमेरिका को निर्यात में बाधाएं विदेशी निवेश प्रवाह (पोर्टफोलियो और प्रत्यक्ष दोनों) को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती हैं। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 2025 में लगभग 19 अरब डॉलर मूल्य के भारतीय शेयर बेचे, जो रुपये पर दबाव का एक कारण रहा।
व्यापक व्यापार मोर्चे पर, भारत आने वाले हफ्तों में यूरोपीय संघ के साथ एक समझौता करने की उम्मीद कर रहा है। हालांकि, ईयू के साथ जुड़ाव भारतीय नीति-निर्माताओं को अमेरिका से ध्यान भटकाने वाला नहीं होना चाहिए। अतिरिक्त शुल्क के खतरे को हटाना और निकट भविष्य में अमेरिका के साथ एक व्यापार समझौता करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण बना रहेगा।