अगर आप अपने दोस्तों से जानना चाहेंगे कि साल 2025 कैसा रहा तो इसके अलग-अलग जवाब मिल सकते हैं। किसी के लिए वह सुनहरा साल था तो किसी के लिए पिछला वर्ष बस उम्मीदों से भरा। सोने ने तो कमाल कर दिया और वर्ष 1979 के बाद इसने सबसे ज्यादा 64 फीसदी का सालाना मुनाफा दिया। हालांकि चांदी इससे भी आगे निकल गई और इसमें 150 फीसदी से ज्यादा की उछाल देखी गई।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक बहुत अच्छी स्थिति में है जिसे ‘गोल्डीलॉक्स पीरियड’ कहा जा सकता है। इसका मतलब है कि देश का विकास सामान्य गति से हो रहा है और सतत वृद्धि के साथ-साथ महंगाई भी कम है। यह एक आदर्श स्थिति है क्योंकि अर्थव्यवस्था न तो ऐसी स्थिति में है जिससे महंगाई बढ़ सकती है और न ही ऐसी स्थिति में है कि मंदी का खतरा हो। इस संतुलन से रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं, परिसंपत्तियों की कीमतें स्थिर हैं और आर्थिक परिस्थितियां भी अनुकूल हैं। इससे निवेश करने के लिए सहायक माहौल है और लोगों के आत्मविश्वास में वृद्धि हो रही है।
तेज वृद्धि और कम महंगाई के अलावा, पिछले साल कई और रिकॉर्ड भी बने। उदाहरण के तौर पर 2025 में 103 आईपीओ आए, जिनसे 1.76 लाख करोड़ रुपये जुटाए गए। हालांकि, 2000 में ‘डॉट कॉम बूम’ के दौरान आईपीओ की संख्या इससे ज्यादा थी लेकिन उस साल सिर्फ 2,953 करोड़ रुपये ही जुटाए जा सके थे। इसके अलावा, नवंबर तक के पिछले 11 महीनों में, म्युचुअल फंड में एसआईपी के जरिये 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश आया जो अब तक सबसे अधिक रकम है।
हालांकि, बाजार से जुड़े सभी आंकड़े सकारात्मक नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर विदेशी संस्थागत और पोर्टफोलियो निवेशकों ने इस साल 1.6 लाख करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी की, जो अब तक सबसे अधिक है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कंपनियों के शेयर के दाम बहुत ज्यादा बढ़ गए थे और उनकी कमाई उम्मीद से कम थी। दुनिया में राजनीतिक अस्थिरता थी, और सबसे बड़ी वजह यह कि अमेरिका ने भारत के निर्यात पर अधिक कर लगा दिया।
अब हम 2026 में भारत के वित्तीय तंत्र के सामने आने वाली कुछ चुनौतियों पर ध्यान देते हैं। पिछले साल आरबीआई ने ब्याज दरों को 1.25 फीसदी घटा दिया (6.5 फीसदी से 5.25 फीसदी), इसके बावजूद 10 साल के सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाला रिटर्न सिर्फ 15 आधार अंक ही गिरा और यह 6.76 फीसदी से 6.61 फीसदी तक हो गया। ये उस साल हुआ जब आरबीआई ने खुले बाजार के जरिये (ओएमओ) कम से कम 7 लाख करोड़ रुपये के बॉन्ड खरीदे थे।
जनवरी और मार्च 2025 के बीच, आरबीआई ने वित्त वर्ष 2025-26 के शुरू होने से पहले 2.83 लाख करोड़ रुपये के बॉन्ड खरीदे थे। अब भी 1.5 लाख करोड़ रुपये के बॉन्ड खरीदे जाने बाकी हैं, जो 5 से 22 जनवरी के बीच होगा। वर्तमान वित्तीय वर्ष का कुल उधार कार्यक्रम 14.72 लाख करोड़ रुपये का है और भुनाए गए बॉन्ड को समायोजित करने के बाद, शुद्ध उधारी लगभग 11.5 लाख करोड़ रुपये की होगी। अगर आरबीआई इतनी ज्यादा खरीदारी नहीं करता तो बॉन्ड पर मिलने वाला रिटर्न 15 आधार अंक भी नहीं गिरता।
आरबीआई इतनी ज्यादा खरीदारी इसलिए कर पाया क्योंकि पिछले कुछ सालों में उसने खुले बाजार के कामकाज (ओएमओ) में ज्यादा हिस्सा नहीं लिया था। क्या वह 2026 में भी ऐसा कर पाएगा? रिकॉर्ड स्तर पर 5.47 लाख करोड़ रुपये के बॉन्ड भुनाए जाने के बदले नए बॉन्ड जारी करने के साथ केंद्र सरकार का वित्त वर्ष 2027 में उधारी लेने का कार्यक्रम इस साल से कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है। इसके अलावा, राज्य सरकारें भी बाजार से उधार लेंगी। जनवरी से मार्च की तिमाही में राज्य विकास ऋण (एसडीएल) की जितनी रकम जुटाई जानी है वह बाजार की उम्मीद से कहीं ज्यादा है।
कुछ और भी कारण हैं, जैसे बॉन्ड से जुड़े वर्गीकरण के नियमों में बदलाव किया गया है। अब बैंकों को साल में एक बार बॉन्ड निवेश को एक श्रेणी से किसी दूसरी श्रेणी में बदलने की अनुमति नहीं है। इसके अलावा, रुपये की कीमत में अस्थिरता से भी बॉन्ड खरीदने वालों की दिलचस्पी घट रही है क्योंकि उसमें जोखिम बढ़ गया है। मई के आखिरी हफ्ते में 10 वर्षीय बॉन्ड पर मिलने वाला रिटर्न गिरकर 6.24 फीसदी तक चला गया था। ये तब हुआ जब आरबीआई ने जून में अपनी मौद्रिक समीक्षा के दौरान रीपो दर को आधा फीसदी कम कर दिया था।
आमतौर पर जब ब्याज दरें कम होने वाली होती हैं, तो यील्ड कम हो जाती है और जब दरों में कटौती हो जाती है तब बाजार मांग और आपूर्ति के हिसाब से चलता है। शायद अब ब्याज दरें कम करने का दौर खत्म होने वाला है। सरकार के उधार लेने के कार्यक्रम की सफलता और 10 वर्षीय बॉन्ड की यील्ड में उतार-चढ़ाव नए साल में एक चुनौती बने रहेंगे।
बाजार की नजर इस बात पर है कि भारतीय सरकारी बॉन्ड, ब्लूमबर्ग ग्लोबल बॉन्ड इंडेक्स में शामिल होता है या नहीं। अगर ऐसा होता है तब इस सूचकांक में भारतीय बॉन्ड को जेपी मॉर्गन इमर्जिंग मार्केट्स बॉन्ड इंडेक्स के समान ही हिस्सा मिलेगा। इससे बाजार में सकारात्मक माहौल बन सकता है। इसके अलावा रुपये में अस्थिरता का भी मुद्दा है।
अमेरिका के साथ शुल्क के मुद्दे पर अभी तक कोई समझौता नहीं हुआ है। व्यापार घाटा और विदेशी पूंजी की निकासी ये सब बताते हैं कि रुपये को लेकर चुनौती बनी रहेगी। बैंकों के सामने तीसरी बड़ी चुनौती है जमा के स्तर को बढ़ाना। 15 दिसंबर तक पिछले साल में बैंकों ने सालाना आधार पर लगभग 12 फीसदी अधिक ऋण दिए लेकिन जमाओं में वृद्धि महज 9.4 फीसदी रही।
ऐसा लगता है कि सरकार विदेशी निवेशकों को सरकारी बैंकों में ज्यादा हिस्सेदारी खरीदने की इजाजत देने की योजना बना रही है। सरकार अपनी हिस्सेदारी 51 फीसदी पर बरकरार रखते हुए, विदेशी निवेशकों के लिए हिस्सेदारी की सीमा 20 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी कर सकती है।
आखिर में, आईडीबीआई बैंक लिमिटेड के निजीकरण की बात है। कैबिनेट कमेटी ने मई 2021 में आईडीबीआई बैंक में सरकारी हिस्सेदारी बेचने की सैद्धांतिक मंजूरी दे दी थी। अगर ये पांच साल की योजना है तब शायद हम इसे इस साल पूरा होते हुए देख सकते हैं।
(लेखक जन स्मॉल फाइनैंस बैंक के वरिष्ठ सलाहकार हैं)