पिछले कुछ दशकों में नई तकनीक को आकार एवं ढंग देने वाले मानदंड एवं मानक पारंपरिक बहुपक्षीय निकायों के हाथों से छिटक गए हैं। इनमें संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (आईएसओ), इंटरनेशनल इलेक्ट्रोटेक्निकल कमीशन और अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ जैसे निकाय शामिल हैं। इन मानदंडों एवं मानकों का निर्धारण अब तेजी से बढ़ते छोटे एवं प्रभावशाली समूह कर रहे हैं।
इंटरनेट संचालन की कमान वर्ल्ड वाइड वेब कंसोर्टियम और इंटरनेट कॉरपोरेशन फॉर असाइंड नेम्स ऐंड नंबर्स जैसे निकायों के हाथों में है। इसी तरह, साइबर सुरक्षा की कमान फाइव आइज और उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के नियंत्रण में है। मोबाइल मानक जैसे 4जी और 5जी थर्ड जेनरेशन पार्टनरशिप प्रोजेक्ट के अंतर्गत आ गए हैं। हालांकि, इनमें से किसी में संगठन या समूह में भारत की कोई अहम भूमिका नहीं रही है।
इस परिप्रेक्ष्य में फरवरी 2026 में ‘इंडिया-एआई इम्पैक्ट समिट’ की मेजबानी करने की अहमियत भारत के लिए केवल राजनयिक रूप से मील का पत्थर होने तक ही सीमित नहीं है। स्वतंत्रता के बाद पहली बार भारत एक उभरती हुई तकनीक पर वैश्विक विमर्श में संयोजक की भूमिका निभाने जा रहा है। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) पर पिछले तीन शिखर सम्मेलनों में सक्रिय भागीदारी को ध्यान में रखते हुए दिल्ली शिखर सम्मेलन भारत के बढ़ती तकनीकी और भू-राजनीतिक कद को दर्शाता है।
यह भारत की अगुआई में बढ़ते अंतरराष्ट्रीय विश्वास का भी परिचायक है। शिखर सम्मेलन से पहले के कार्यक्रमों में राष्ट्राध्यक्षों, मंत्री-स्तरीय प्रतिनिधिमंडलों और वैश्विक सीईओ के एक बड़े समूह की अभूतपूर्व उपस्थिति देखी गई है जो वैश्विक एआई से जुड़ी कार्य योजना को निर्णायक रूप से आगे बढ़ाने के लिए वैधता और राजनीतिक पूंजी प्रदान करते हैं। भारत के लिए शिखर सम्मेलन को वास्तव में सार्थक बनाने के लिए नीचे छह परिणाम-उन्मुख रणनीतियों का जिक्र किया गया है।
एआई में ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में भारत: भारत के लिए दुनिया के विकासशील एवं पिछड़े देशों (ग्लोबल साउथ) के हितों को आगे बढ़ाना अनिवार्य हो गया है। भारत के लिए ग्लोबल साउथ की इस अपेक्षा पर खरा उतरना जरूरी है। भारत को विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बीच एक विश्वसनीय पुल के रूप में स्वयं को स्थापित करना चाहिए। शिखर सम्मेलन के तीन मार्गदर्शक सूत्र लोग, धरती और प्रगति वसुधैव कुटुंबकम के दर्शन को परिलक्षित करते हैं। ये तीनों ही सामूहिक प्रगति को इस शिखर सम्मेलन की कार्य सूची के केंद्र में रखते हैं और एक जरूरी संतुलित भूमिका निभाने के लिए भारत को एक मजबूत बुनियाद भी उपलब्ध कराते हैं।
शिखर सम्मेलन के ढांचे के अंतर्गत समर्पित कार्य समूहों के माध्यम से ग्लोबल साउथ की भागीदारी को संस्थागत बनाते हुए भारत को उन सिद्धांत-आधारित ढांचे का भी समर्थन करना चाहिए जो वैश्विक मानदंडों के साथ तालमेल स्थापित कर घरेलू नीतिगत गुंजाइश सुरक्षित करते हैं। इससे ग्लोबल साउथ के मुद्दे जैसे कंप्यूट तक पहुंच, डेटा की कमी और अनौपचारिक अर्थव्यवस्थाएं चर्चा के केंद्र में रहेंगे। डेटा भेदभाव पर बहस में नस्ल और नारी-पुरुष विभेद से आगे जाकर जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा को शामिल करना चाहिए। भारत अपने डिजिटल सार्वजनिक ढांचे (डीपीआई), सुरक्षा उपकरण और साझा कंप्यूट संसाधनों की पेशकश कर भरोसा पुख्ता कर सकता है।
बयानों से क्रियान्वयन की तरफ कदम बढ़ना: इस शिखर सम्मेलन को व्यावहारिक, साझा मंचों के एक छोटे समूह की शुरुआत पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जिसका उपयोग विकासशील देश एक साथ कर सकते हैं। इससे अलग-अलग देशों द्वारा किए जाने वाले प्रयासों की जरूरत नहीं रह जाएगी। विशेष रूप से यह विधि छोटी आबादी वाले देशों के लिए महत्त्वपूर्ण है जो स्वास्थ्य या स्थानीय भाषा की आम समस्याओं को हल करने की कोशिश कर रहे हैं। यहां तक कि 5-10 देशों के साथ शुरुआत करना भी पर्याप्त रहेगा और इस पहल की अहमियत सामने के साथ अन्य देश भी जुड़ते चले जाएंगे।
भारत शुरू में इन मंचों को 5,000-10,000 ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (जीपीयू) के साथ समर्थन दे सकता है और सामूहिक वित्त पोषण के जरिये यह पहल आगे बढ़ा सकता है। यह प्रयास उभरती अर्थव्यवस्थाओं की जरूरतों को प्रतिबिंबित करने वाला तथा पैमाने, स्टार्टअप और डीपीआई में भारत की ताकत का उपयोग करने वाला होना चाहिए। इन प्लेटफार्मों के लिए कुछ सुझावों में कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए ओपन-सोर्स एआई मॉडल, स्टार्टअप के लिए साझा कंप्यूट पहुंच और भाषिणी द्वारा संचालित बहुभाषी डेटासेट शामिल हो सकते हैं।
केवल विचार नहीं, नतीजे भी जरूरी: भारत को स्पष्ट, साक्ष्य-आधारित उदाहरणों के माध्यम से विस्तार योग्य, समावेशी एआई का प्रदर्शन करना चाहिए। पेरिस में भारत ने दृष्टिकोण पर ध्यान केंद्रित किया था और अब उसे प्रभाव पर रोशनी डालनी चाहिए। सरकार द्वारा तय की गई पांच प्रमुख पहल- अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के साथ ऊर्जा के लिए एआई, विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ स्वास्थ्य देखभाल, यूएन वीमेन इंडिया के साथ स्त्री-पुरुष केंद्रित एआई, एक शिक्षा उदाहरण तथा महाराष्ट्र सरकार और विश्व बैंक के साथ मिलकर कृषि, अच्छी तरह से सोचे-समझे गए हैं।
इन सार-संग्रहों में अपने स्वयं के व्यावहारिक, विस्तार योग्य और दोहराने योग्य एआई समाधानों का प्रदर्शन कर भारत एक वैश्विक विकास एआई कार्य योजना स्थापित कर सकता है। इस कार्य योजना को अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समर्थन मिलेगा।
अपनी एआई प्रतिभा का प्रदर्शन करे भारत: भारत का ध्यान अब एक प्रतिभा आपूर्तिकर्ता से एक वैश्विक एआई क्षमता भागीदार के रूप में स्वयं को स्थापित करने पर होना चाहिए। वैश्विक चुनौतियों, अनुसंधान मंचों और लगभग 100 घरेलू एआई ऐप्लीकेशन के प्रदर्शन के माध्यम से शिखर सम्मेलन भारतीय शोधकर्ताओं, स्टार्टअप इकाइयों और चिकित्सकों को समस्या-समाधानकर्ता के रूप में पेश करने का प्रस्ताव रख रहा है।
शिखर सम्मेलन से पूर्व आयोजित कार्यक्रमों ने पहले ही हजारों नवाचारकर्ता जुटा लिए हैं। यह रफ्तार बनाए रखने की जरूरत है। शिखर सम्मेलन भारतीय कौशल को वैश्विक जरूरतों से जोड़ने वाले ग्लोबल एआई टैलेंट कॉरिडोर और सह-वित्त पोषित एआई कौशल कार्यक्रमों पर भी विचार कर सकता है। प्रतिभावान लोगों की आवाजाही, वीजा सुविधा और संयुक्त कौशल की पहल पर अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ द्विपक्षीय समझौता अहम हो सकता है।
एआई में निवेश सुनिश्चित करें: स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा और प्रशासन में इस्तेमाल के लिए तैयार एआई का प्रदर्शन करने वाली एक विशेष प्रदर्शनी सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से कंप्यूट, डेटा केंद्रों और बुनियादी ढांचे में निवेश आकर्षित कर सकती है। निवेशक अनुरूप और स्टार्टअप पर केंद्रित सत्र निवेश के वादों को वास्तविक सौदों में बदल सकते हैं। सह-वित्त पोषित, बहुराष्ट्रीय एआई निवेश इकाइयों की घोषणा करना (संभवतः गिफ्ट सिटी में) स्पष्ट नीति संकेतों के साथ दीर्घकालिक पूंजी जुटा सकता है।
घरेलू एआई तंत्र को बढ़ावा: आखिर में, शिखर सम्मेलन को प्रमुख नियामकीय सुधारों को आगे बढ़ाकर भारत के घरेलू एआई तंत्र के लिए एक बड़ी छलांग लगाने की गुंजाइश तैयार करनी चाहिए। इन सुधारों में डेटा भंडारण का मानकीकरण, डेटा की निर्बाध साझेदारी सुनिश्चित करना और कंप्यूट, नए प्रयोग उपकरणों तक पहुंच बढ़ाना और सुरक्षित माहौल का निर्माण करना आदि शामिल हैं। सरकार की अगुआई में बड़ा सम्मेलन और एआई तकनीक की सुनिश्चित खरीद नवाचार को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकते हैं। शिखर सम्मेलन वैश्विक एआई संवाद का नेतृत्व करने का भारत के लिए वास्तविक मौका है। महज शब्दों में नहीं बल्कि वास्तविक धरातल पर!
अगर भारत इस अवसर का लाभ उठाता है तो वह 2035 तक वैश्विक एआई केंद्र बन सकता है। इस तरह के अवसर बार-बार नहीं आते हैं। भारत के पास एक नायाब अवसर है जिसका उसे फायदा उठाना चाहिए।
(लेखक यूपीएससी के अध्यक्ष और भारत के पूर्व रक्षा सचिव हैं। ये उनके निजी विचार हैं)