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वीबी-जी राम जी का बड़ा बदलाव: ग्रामीण बीमा से मैनेज्ड इन्वेस्टमेंट की ओर कदम

सरकार ने इसे आधुनिकीकरण के तौर पर पेश किया है जिसमें अधिक रोजगार दिवसों की गारंटी, टिकाऊ संपत्ति बनाने पर जोर, कड़ी निगरानी और विकास प्राथमिकताओं के साथ बेहतर तालमेल जरूरी है

Last Updated- January 13, 2026 | 9:53 PM IST
VB-G RAM G Scheme

लगभग दो दशकों से, भारत की नीतिगत व्यवस्था में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की एक खास जगह थी। इसका आर्थिक महत्त्व एक सरल लेकिन महत्त्वपूर्ण संस्थात्मक विचार में था कि ग्रामीण संकट की स्थिति में इसे राज्य से मदद पाने के अधिकार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। कोई भी ग्रामीण परिवार जो शारीरिक श्रम करने को तैयार हो वह 100 दिन तक रोजगार की मांग कर सकता था और प्रशासन को समय पर यह दायित्व पूरा करना होता था।

नागरिक की दावेदारी और राज्य के दायित्व के इस फर्क ने इस कार्यक्रम को सिर्फ एक बजट से जुड़ा हस्तक्षेप नहीं रहने दिया। इसने श्रम बाजार के निचले स्तर पर अस्थिरता से बचाव के लिए एक बीमा के तौर पर काम किया, भले ही यह परिपूर्ण न हो। वित्त वर्ष 2024-25 में, मनरेगा ने 2.9 अरब कार्य दिवस का रोजगार दिया जिसमें कुल लाभार्थियों में महिलाओं की हिस्सेदारी 58.15 फीसदी थी।

अब, इस व्यवस्था में अचानक बदलाव लाकर विकसित इसे भारत-गारंटी फॉर रोजगार ऐंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) (वीबी-जी राम जी) अधिनियम, 2025 कर दिया गया है जो इस ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम को एक पुनर्गठित संस्थागत ढांचे में बदल देता है। सरकार ने इस सुधार को आधुनिकीकरण के तौर पर पेश किया है जिसमें अधिक रोजगार दिवसों की गारंटी, टिकाऊ संपत्ति बनाने पर जोर, कड़ी निगरानी और विकास प्राथमिकताओं के साथ बेहतर तालमेल जरूरी है। लेकिन, इससे एक अलग बदलाव दिखता है और वह बदलाव यह है कि अनिश्चितता के दौर के लिए डिजाइन की गई योजना अब नियंत्रण से जुड़े बदलाव में तब्दील हो गई है।

यह अधिनियम ग्रामीण परिवार की प्रति वर्ष रोजगार पात्रता को 100 से बढ़ाकर 125 दिन करता है। सैद्धांतिक रूप में, यह परिवारों के लिए आय सुरक्षा को बढ़ाता है। लेकिन, कानूनी सीमा शायद ही कभी बाध्यकारी रही है। प्रति परिवार को दिया गया औसत रोजगार 2024-25 में 50.24 दिन ही था और पिछले चार वर्षों में भी लगभग ऐसा ही था, जिससे पता चलता है कि प्रभावशीलता इस बात से अधिक तय होती है कि मांग की फंडिंग कैसे की जाए, स्वीकृति कैसे मिले, इसे काम में कैसे बदला जाए न कि दिनों की संख्या से। इन बुनियादी तंत्रों में बदलाव किए बिना, कानूनी पात्रता दिनों को बढ़ाना काफी हद तक प्रतीकात्मक रहेगा।

अधिनियम बनाई गई संपत्तियों की असमान गुणवत्ता और टिकाऊपन की समस्या को भी हल करना चाहता है। वीबी-जी राम जी जल संरक्षण, जलवायु अनुकूलन और बुनियादी ढांचे से जुड़े कामों को एकत्रित करने का प्रस्ताव करती है और उन्हें ग्राम विकास योजनाओं से जोड़ती है। भारत में, जहां जलवायु झटके कृषि उत्पादन और ग्रामीण आय को तेजी से बाधित कर रहे हैं, पानी की उपलब्धता को स्थिर करने या बाढ़ और सूखे से बचाने वाले निवेश तत्काल मजदूरी की प्रेरणा से परे लाभ दे सकते हैं।

मांग-संचालित रोजगार गारंटी योजना को तेजी से लागू होने वाला साधन बने रहना चाहिए। इसकी ताकत श्रम का जल्दी उपयोग करने में होनी चाहिए खासतौर पर तब जब परिवारों को निजी झटकों का सामना करना पड़ता है। इसके विपरीत, उच्च-गुणवत्ता वाले बुनियादी ढांचे के लिए तकनीकी डिजाइन, सही क्रम और लंबी अवधि की आवश्यकता होती है। वीबी-जी राम जी के तहत पूरा जोर अधिक जटिल परिसंपत्तियों पर है तो इसमें जो​खिम यह है कि यह संकट के समय कम लचीली हो सकती है। इस बदलाव से यह योजना बीमा की तरह कम और निवेश की तरह ज्यादा हो जाएगी। इससे शायद औसतन ज्यादा फायदा हो लेकिन जब सबसे ज्यादा जरूरत होगी तब ये उतनी जल्दी काम नहीं आएगी।

हालांकि, इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण वित्तीय बदलाव है। मनरेगा के तहत, फंडिंग मांग पर आधारित थी। जब ग्रामीण संकट बढ़ा यानी सूखा पड़ने, बाढ़ आने या आर्थिक झटकों के बाद इसका व्यय अपने आप बढ़ गया। इसने मनरेगा को पूरी तरह से नहीं बल्कि एक व्यापक आर्थिक स्थिरता के कारक के तौर पर काम करने दिया। नए अधिनियम के तहत, इस तर्क को मौलिक रूप से कमजोर कर दिया गया है। वीबी-जी राम जी के तहत राज्य-वार मानक आवंटन की पेशकश की गई है जिसमें अतिरिक्त मांग की फंडिंग राज्यों को करने की आवश्यकता होगी।

इसका मतलब है कि केंद्र सरकार से वित्तीय जोखिम लेकर उन राज्यों को दिया जा रहा है जो उसे झेलने में कम सक्षम हैं। इससे राज्यों पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा। मुश्किल समय में, गरीब राज्य खर्च बढ़ाने के बजाय काम कम कर सकते हैं, योजनाओं को मंजूरी देने में देरी कर सकते हैं या नियमों को और सख्त कर सकते हैं। इससे उप-राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक अस्थिरता का खतरा बढ़ सकता है, जिससे संकट के समय राहत कार्य उल्टी दिशा में जा सकते हैं। मनरेगा के तहत जो योजना मांग के अनुसार मदद करने के लिए बनाई गई थी, वह वीबी-जी राम जी के तहत एक सीमित योजना बनकर रह सकती है।

इस योजना में 60 दिन का जो मौसमी ब्रेक दिया गया है वह भी ठीक नहीं लगता। यह इस गलत सोच पर आधारित है कि बोआई और कटाई के समय हर जगह श्रम बाजार में कामगारों की कमी हो जाती है। भारत में, ग्रामीण श्रम बाजार अलग-अलग हिस्सों में बंटा हुआ है और अक्सर काम की कमी के साथ-साथ परिवारों की आर्थिक स्थिति भी नाजुक होती है।

अनुभवजन्य रिपोर्ट से पता चला है कि भूमिहीन परिवारों, महिला श्रमिकों और स्वास्थ्य या कर्ज से जूझ रहे लोगों के लिए, मनरेगा खेत में काम का विकल्प नहीं था, बल्कि ये एक सुरक्षा कवच था, जब आय के अन्य स्रोत विफल हो जाते थे। वीबी-जी राम जी का कैलेंडर आधारित काम का निलंबन उन परिस्थितियों को सीमित करता है जिनमें यह योजना कारगर हो सकती है जिससे परिवारों को एक साथ कई झटकों का सामना करने पर इसकी मदद करने की क्षमता कम हो जाती है।

सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि वीबी-जी राम जी ज्यादा कार्यदिवस देगी या बेहतर परिसंपत्तियों का सृजन करेगी बल्कि यह है कि यह किस तरह के राज्य की कल्पना करता है और बनाता है। नया ढांचा प्रशासनिक दूरदर्शिता और नियंत्रण को लेकर ज्यादा आश्वस्त दिखता है। लेकिन यह आत्मविश्वास गलत भी हो सकता है। ऐसी अर्थव्यवस्था में जहां झटके अधिक बार और असमान हो रहे हैं वहां लचीलापन पहले से योजना बनाने से ज्यादा, संकट आने के बाद तुरंत और बड़े पैमाने पर प्रतिक्रिया देने की क्षमता पर निर्भर करता है।

एक ग्रामीण रोजगार व्यवस्था जो बदलाव के मुकाबले निश्चितता को अधिक महत्त्व देती है वह सामान्य समय में तो ठीक से काम कर सकती है, लेकिन मुश्किल समय आने पर दबाव में आ सकती है। वीबी-जी राम जी की असली परीक्षा यह होगी कि क्या यह योजना बुरे समय में भी स्थिरता का सहारा बनती है या सिर्फ अच्छे समय में अधिक कुशलता से काम करती है।


(लेखक भारतीय प्रबंध संस्थान, रांची में अर्थशास्त्र और लोक नीति के एसोसिएट प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published - January 13, 2026 | 9:49 PM IST

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