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टैक्स बदलाव से ज्यादा व्यय और राजकोषीय सुधारों पर केंद्रित होता आम बजट

केंद्रीय बजट में अब केवल कर संबंधी बदलाव ही नहीं देखने को मिलते, बल्कि अब यह व्यय पुनर्गठन पर अधिक केंद्रित है। विस्तार से बता रहे हैं एके भट्टाचार्य

Last Updated- January 15, 2026 | 9:27 PM IST
Budget
इलस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

बीते कुछ साल में केंद्रीय बजट की प्रकृति में परिवर्तन आया है। अब उनमें करों पर कम और सरकार के राजकोषीय रुख, योजनाओं और व्यय पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। बजट का मुख्य ध्यान सरकार की उन योजनाओं पर है जिनका उद्देश्य ऋण या राजकोषीय घाटे को कम करना, क्षेत्रीय नीतियों में बदलाव करना, नई योजनाएं शुरू करना और अपने व्यय की गुणवत्ता में सुधार करना है। अब बजट को सरकार के वार्षिक आर्थिक नीति वक्तव्य के रूप में देखा और आंका जाता है। इसे समर्थन देने के लिए बजट में वित्तीय आंकड़े भी जारी किए जाते हैं। जाहिर है अधिकांश बजटों में कर को लेकर कुछ बदलाव होते हैं लेकिन बीतते सालों के दौरान इनमें कमी आई है।

यह स्वागतयोग्य बदलाव है। अर्थव्यवस्था के विकास के साथ करों में बार-बार बदलाव अच्छी बात नहीं है। कर दरों में बड़े समायोजन न होने का एक अर्थ यह भी है कि आम बजट में लोगों की रुचि कम होती जाती है। स्पष्ट है कि बीते कई सालों के कराधान सुधारों ने भी इस प्रक्रिया में योगदान किया है।

वर्ष 2017 में माल एवं सेवा कर यानी जीएसटी की शुरुआत के बाद से केंद्र सरकार के सकल कर संग्रह का करीब एक चौथाई हिस्सा केंद्रीय वित्त मंत्री द्वारा पेश किए जाने वाले बजट के दायरे से बाहर हो गया है। अप्रत्यक्ष करों में बदलाव पहले बजट में रुचि का मुख्य कारण हुआ करता था। लेकिन अब वस्तुओं और सेवाओं के लिए जीएसटी दरों में बदलाव बजट के बाहर जीएसटी परिषद की समय-समय पर होने वाली बैठकों के माध्यम से किया जाता है। बजट केवल ऐसे परिवर्तनों के प्रभाव को राजस्व संग्रह के संदर्भ में दर्ज करता है।

केवल दो प्रमुख अप्रत्यक्ष कर यानी केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क का निर्धारण केंद्रीय वित्त मंत्रालय द्वारा किया जा रहा है। परंतु यहां भी उत्पाद शुल्क संबंधी बदलावों की घोषणा बजट से बाहर की जाती है। सिगरेट पर उत्पाद शुल्क में इजाफा और पान मसाला पर नए उपकर की घोषणा दिसंबर 2025 में यानी बजट के ठीक पहले की गई। इसके लिए उत्पाद शुल्क कानून में परिवर्तन तथा एक नए कानून की मदद ली गई। नई उत्पाद शुल्क दरें और उपकर, जो सरकार के लिए पर्याप्त अतिरिक्त राजस्व उत्पन्न करेंगे, वे आगामी 1 फरवरी से प्रभावी होंगे। उसी दिन बजट पेश किया जाना है। पुराने दिनों में, सिगरेट पर कर दरें बजट प्रस्तुति के साथ ही घोषित की जाती थीं, जिससे काफी उत्साह पैदा होता था और बेईमान तबके द्वारा सिगरेट की जमाखोरी कर अतिरिक्त लाभ कमाने की कोशिश के कारण उसकी कमी हो जाती थी। अब ऐसा कोई उत्साह नहीं होता।

सीमा शुल्क में जरूर उत्साह का तत्त्व बचा हुआ है। किन चीजों पर अधिक सीमा शुल्क लग सकता है या किन पर कम कर लगाया जा सकता है, यह अब भी एक बड़ी वजह है कि व्यापार और उद्योग बजट घोषणाओं पर गहरी नजर रखते हैं। पिछले दो बजटों में सीमा शुल्क को तर्कसंगत बनाया गया था। उम्मीद
है कि आगामी बजट में भी यही प्रवृत्ति जारी रहेगी।

बजट में रुचि में कमी का एक कारण यह भी है कि भारत ने व्यक्तियों और कंपनियों दोनों के लिए एक स्थिर प्रत्यक्ष कर व्यवस्था को अपना लिया है। पिछले बजट में लगभग 12 लाख रुपये से कम वार्षिक आय वाले लोगों के लिए बड़ी कर राहत की घोषणा के बाद, आगामी बजट में लोगों के लिए बहुत अधिक उम्मीदें नहीं हैं। कंपनियां भी अपनी कर दरों में बड़े फेरबदल की उम्मीद नहीं कर सकतीं। नई पूंजीगत लाभ कर व्यवस्था, जो कुछ वर्ष पहले लागू की गई थी, उसको बाजारों ने बड़े पैमाने पर स्वीकार कर लिया है और सरकार वहां कोई और बदलाव करके बाजार भावना को प्रभावित करने का जोखिम नहीं उठा सकती। निवेश या बचत को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न प्रत्यक्ष कर प्रावधानों में अब भी बदलाव हो सकते हैं, लेकिन ये मामूली बदलाव होंगे और इसलिए हाल ही में हुए अप्रत्यक्ष कर या प्रत्यक्ष कर दरों में वृद्धि या कमी जैसी अपील नहीं करेंगे। किसी भी स्थिति में, 2026-27 में प्रत्यक्ष कर दरों में बड़ी राहत देना एक चुनौती होगी, क्योंकि इस वर्ष कर संग्रह की वृद्धि दर धीमी हो गई है।

दूसरा अहम बदलाव केंद्र की राज्यों के साथ राजकोषीय भागीदारी की प्रकृति में देखा जा सकता है। 16वें वित्त आयोग की सिफारिशें सरकार के पास हैं और ये इस बात में परिलक्षित होंगी कि राज्यों के साथ राजकोषीय संसाधन किस प्रकार साझा किए जाएंगे। करीब एक दशक पहले, अरुण जेटली के वित्त मंत्री रहते 2015-16 में दूसरे बजट में 14वें वित्त आयोग की एक प्रमुख सिफारिश को स्वीकार किया गया था।

इसके तहत राज्यों का हिस्सा केंद्रीय कर संग्रह में 32 फीसदी से बढ़ाकर 42 फीसदी कर दिया गया था। यह अब तक की सबसे बड़ी वृद्धि थी। इस बदलाव का मतलब था कि राज्यों को करों के हस्तांतरण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। यद्यपि, केंद्र सरकार ने उपकर और अधिभार बढ़ाना शुरू कर दिया, जिन्हें राज्यों के साथ साझा नहीं किया जाता। इसके चलते राज्यों को हस्तांतरण में सीमित इजाफा हुआ है।

2026-27 का बजट 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों को शामिल करेगा, जिन्हें अप्रैल 2026 से पांच साल तक लागू किया जाएगा। आयोग के द्वारा राज्यों का हिस्सा केंद्रीय करों में 41 फीसदी से कम किए जाने के आसार नहीं है, क्योंकि यह अप्रैल 2020 से 15वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुरूप तय किया गया था। लेकिन आयोग द्वारा अपनाए गए कर हस्तांतरण सूत्र के कारण केंद्र और राज्यों दोनों के संसाधनों पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है। वास्तविक असर तो यकीनन 1 फरवरी को ही पता चलेगा।

तीसरा और बड़ा बदलाव इस बात में देखा जा सकता है कि केंद्र अपने संसाधनों को केंद्र प्रायोजित और केंद्रीय क्षेत्र की योजनाओं पर किस प्रकार खर्च करता है। चालू वर्ष में केंद्रीय बजट के कुल व्यय का लगभग 24 फीसदी हिस्सा 54 केंद्र प्रायोजित योजनाओं और 260 केंद्रीय क्षेत्र की योजनाओं के लिए निर्धारित किया गया है। इन योजनाओं की समीक्षा की गई है ताकि यह तय किया जा सके कि इन्हें अगले पांच साल यानी अप्रैल 2026 से किस रूप में और कैसे जारी रखा जाए।

इनमें से कई योजनाओं का आकार कम किया जा सकता है, विलय किया जा सकता है या फिर उन्हें समाप्त भी किया जा सकता है। संसद के पिछले सत्र में किए गए विधायी बदलाव के माध्यम से संशोधित और पुनः नामित ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में राज्यों का भार बढ़ा दिया गया है। संभावना है कि जिन योजनाओं को बनाए रखा जाएगा, उनमें राज्यों को अधिक योगदान देना पड़ेगा। केंद्रीय मंत्रालयों को भी इन योजनाओं को अब तक के क्रियान्वयन की गुणवत्ता के आधार पर संशोधित या यहां तक कि छोटा करना होगा।

अपेक्षा है कि इन योजनाओं की समीक्षा से उत्पन्न बचत संघीय बजट को अपने पूंजीगत व्यय कार्यक्रम के तहत अधिक संसाधन आवंटित करने की गुंजाइश देगी। आगामी बजट में इन योजनाओं का पुनर्गठन सरकार के कुल वार्षिक खर्च के लगभग एक चौथाई हिस्से को प्रभावित करने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण व्यय सुधार उपायों में से एक हो सकता है। यह एक बार फिर दिखाएगा कि वार्षिक बजट केवल कर परिवर्तनों तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि अब राजकोषीय और व्यय सुधारों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

First Published - January 15, 2026 | 9:22 PM IST

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