देश भारत का रियल एस्टेट सेक्टर देश की GDP में करीब 7 फीसदी योगदान देता है और 7 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता है। ऐसे में केंद्रीय बजट 2026-27 इस सेक्टर के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। रियल एस्टेट सेक्टर का कहना है कि बेहतर नीतिगत फैसले से हाउसिंग सेक्टर को रफ्तार मिलेगी और ‘हाउसिंग फार ऑल’ का लक्ष्य तेजी से आगे बढ़ेगा। इंडस्ट्री से जुड़े लोग मानते हैं कि होम लोन से जुड़े नियमों में सुधार पूरे सेक्टर को बूस्ट दे सकता है।
रियल एस्टेट कंसल्टेंसी फर्म नाइट फ्रैंक इंडिया का कहना है कि अगर सरकार सही आर्थिक नीतियां अपनाती है, तो हाउसिंग के जरिए अगला ग्रोथ फेज शुरू हो सकता है और “हाउसिंग फार आल” का लक्ष्य तेजी से आगे बढ़ेगा। फर्म का कहना है कि 50 लाख रुपये से कम कीमत वाले घरों की हिस्सेदारी 2018 में 54% थी, जो 2025 तक घटकर सिर्फ 21% रह गई है। 2025 में इस सेगमेंट की बिक्री में 17% सालाना गिरावट आई है। इस गिरावट की वजह बढ़ती घरों की कीमतें, कम होती डिस्पोजेबल इनकम और सस्ता कर्ज न मिल पाना है।
प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY 2.0) की सीमा बढ़ाने की जरूरत है। PMAY 2.0 के तहत ₹8 लाख तक के लोन पर 4% ब्याज सब्सिडी मिलती है। बशर्ते घर की कीमत ₹35 लाख से ज्यादा न हो। मेट्रो शहरों में यह सीमा हकीकत से बहुत कम है। इसलिए अधिकतम घर मूल्य सीमा को ₹35 लाख से बढ़ाकर ₹75 लाख (या RBI के PSL मानकों के अनुरूप) किया जाना चाहिए।
कंसल्टेंसी फर्म के मुताबिक, इसी तरह, आयकर अधिनियम की धारा 24(b) के तहत होम लोन ब्याज पर मिलने वाली टैक्स छूट को ₹2 लाख से बढ़ाकर ₹5 लाख किया जाना चाहिए। इससे खासकर मिडिल क्लास और अफोर्डेबल हाउसिंग सेगमेंट को सीधा फायदा मिलेगा। दूसरी ओर, सिर्फ घर खरीदने पर नहीं, बल्कि लंबी अवधि की रेंटल हाउसिंग पर भी बजट में फोकस जरूरी है। इसके लिए ₹50 लाख तक के घरों से ₹3 लाख तक के सालाना किराये पर 100% टैक्स छूट दी जानी चाहिए। इससे खाली पड़े निवेश वाले घर किराये पर आएंगे और रेंटल सप्लाई बढ़ेगी।
इसके अलावा सरकारी जमीन पर रेंटल हाउसिंग का इस्तेमाल किया जा सकता है। रेंटल हाउसिंग के लिए टैक्स और फंडिंग सपोर्ट की जरूरत है। पर्पस बिल्ट रेंट हाउसिंग के लिए पहले 5 साल टैक्स हॉलिडे होना चाहिए।
Tier-2 और Tier-3 शहरों में ARHC प्रोजेक्ट्स के लिए केंद्र सरकार की ग्रांट / VGF सपोर्ट, कैपिटल गेन टैक्स (Section 54) में राहत देने की जरूरत है। अभी नियम यह है कि अंडर-कंस्ट्रक्शन घर 3 साल में पूरे होने चाहिए। इसे 3 से बढ़ाकर 5 साल किया जाए क्योंकि बड़े प्रोजेक्ट्स में देरी आम है। RERA के बावजूद टाइमलाइन बढ़ जाती है।
साथ ही पुराने घर बेचने से पहले नया घर खरीदने की समय-सीमा 1 साल से बढ़ाकर 2 साल की जाए। इससे घर बेचने वालों को
दबाव में सस्ती कीमत पर बेचने से राहत मिलेगी। इसके अलावा, ग्रीन और सस्टेनेबल बिल्डिंग्स को बढ़ावा देने के लिए राज्यों की तरह केंद्र सरकार भी ग्रीन बिल्डिंग मटीरियल और टेक्नोलॉजी पर 20–25% सब्सिडी दे। प्रति प्रोजेक्ट सीमा ₹1–2 करोड़ रखी जाए। इससे पर्यावरण-अनुकूल निर्माण को बढ़ावा मिलेगा।
नाइट फ्रैंक इंडिया के चेयरमैन और एमडी शिशिर बैजल ने कहा, “अफोर्डेबल हाउसिंग में स्ट्रक्चरल असंतुलन बढ़ रहा है। अगर समय रहते नीतियों में बदलाव नहीं हुआ, तो इस सेगमेंट में मांग दबाव में ही रहेगी। शहरों की बढ़ती लागत को देखते हुए हाउसिंग इंसेंटिव को नए सिरे से तय करना जरूरी है। साथ ही, भारत को एक मजबूत और औपचारिक रेंटल हाउसिंग इकोसिस्टम की ओर तेजी से बढ़ना होगा। बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और मास ट्रांजिट निवेश से अफोर्डेबल जमीन की उपलब्धता बढ़ेगी और समावेशी शहरीकरण संभव होगा।”
DN ग्रुप के CMD जगदीश प्रसाद नाइक का कहना है, यूनियन बजट 2026 में सरकार को आवास क्षेत्र के लिए सुधारों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, ताकि घर सस्ते हों और लागत का दबाव कम हो। होम लोन से जुड़े नियमों में सुधार, जैसे टैक्स छूट बढ़ाना, ब्याज दरों को स्थिर रखना और लंबी व लचीली किस्तों की सुविधा देना, टियर-2 और टियर-3 शहरों में घर खरीदने वालों की संख्या बढ़ा सकता है।
नाइक का कहना है, रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट्स पर जीएसटी को सरल और कम करना और इनपुट टैक्स क्रेडिट को फिर से लागू करना एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। इससे निर्माण लागत घटेगी, कीमतों में पारदर्शिता आएगी और घर खरीदारों के लिए मकान और सस्ते होंगे, साथ ही डेवलपर्स की नकदी स्थिति भी बेहतर होगी। इसके साथ ही ग्रीन और ऊर्जा बचत वाले घरों के लिए खास प्रोत्साहन, जैसे सोलर पैनल, पानी के दोबारा इस्तेमाल लायक और स्मार्ट एनर्जी सिस्टम, भविष्य के लिए जरूरी हैं और देश के पर्यावरण लक्ष्यों से भी मेल खाते हैं।