केंद्रीय बजट 2026-27 से पहले उद्योग ने सीमा शुल्क विशेष मूल्यांकन शाखा (एसवीबी) को खत्म करने की मांग की है। यह विशेष इकाई जांच करती है कि संबंधित पक्षों के बीच आयात मूल्य कहीं उनके संबंधों से प्रभावित तो नहीं है। संबंधित पक्षों में विदेशी मूल कंपनी और उनकी भारतीय इकाइयां आदि शामिल होती हैं।
कारोबारियों का तर्क है कि एसवीबी का गठन कम मूल्यांकन और राजस्व चोरी को रोकने के लिए किया गया था, लेकिन इसके कामकाज से बहुत ज्यादा देरी होती है, शुल्क देयता में अनिश्चितता आती है और इससे अनुपालन लागत में बढ़ोतरी होती है। मौजूदा ढांचे के तहत आयातकों को बिल ऑफ एंट्री की फाइलिंग के समय संबंधित पक्ष से लेनदेन का खुलासा करना पड़ता है।
अगर पोर्ट सीमा शुल्क अधिकारी को भरोसा होता है कि संबंधों के कारण कीमत प्रभावित हो सकती है तो मामले को एसवीबी के पास भेज दिया जाता है। इसके बाद एसवीबी मूल्य निर्धारण, लागत संरचना और संविदात्मक व्यवस्थाओं की विस्तृत जांच करता है, जबकि बॉन्ड के हिसाब से अनंतिम मूल्यांकन के तहत आयात को मंजूरी दी जाती है। दिशानिर्देशों के मुताबिक एसवीबी जांच 2 महीने में पूरी की जानी चाहिए, लेकिन निर्यातकों का कहना है कि व्यावहारिक तौर पर रिपोर्ट एक या दो साल बाद ही आती है।
ईवाई में पार्टनर सुरेश नैयर ने कहा, ‘इस अवधि के दौरान सभी संबंधित आयात का आकलन अनंतिम रूप से होता है और अंतिम सीमा शुल्क की देनदारी को खुला रखा जाता है।’
पिछले साल के बजट में अनंतिम आकलन को अंतिम रूप देने की वैधानिक समय सीमा 2 साल तय करके इस मसले का समाधान करने की मांग की गई थी, जिसे एक साल और बढ़ाया जा सकता था।
डेलॉयट में पार्टनर हरप्रीत सिंह ने कहा, ‘उद्योग का तर्क है कि इससे देरी की समस्या का समाधान नहीं हो सकता है, क्योंकि इसे पूरा करने की प्रक्रिया में बहुत वक्त लगता है।’