विदेशी निवेश फर्म से जुड़े एक अहम टैक्स विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (15 जनवरी) को बड़ा फैसला दिया। यह मामला टाइगर ग्लोबल से जुड़ा है, जो भारतीय स्टार्टअप्स में सबसे प्रभावशाली विदेशी निवेशकों में से एक रहा है। विवाद 2018 में टाइगर ग्लोबल की फ्लिपकार्ट से आंशिक निकासी से जुड़ा है, जब वॉलमार्ट ने करीब 16 अरब डॉलर में ई-कॉमर्स कंपनी का अधिग्रहण किया था।
इस सौदे के दौरान टाइगर ग्लोबल ने फ्लिपकार्ट में अपनी हिस्सेदारी का एक हिस्सा बेचकर करीब 1.6 अरब डॉलर का कैपिटल गेन कमाया। इसके बाद आयकर विभाग ने कहा कि इस लाभ पर भारत में टैक्स बनता है। टाइगर ग्लोबल ने इसका विरोध किया और भारत-मॉरीशस टैक्स संधि का हवाला देते हुए मॉरीशस से मिला टैक्स रेजिडेंसी सर्टिफिकेट (TRC) पेश किया। यह विवाद आखिरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां कोर्ट ने 2024 के दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें टैक्स डिमांड रद्द कर दी गई थी।
इस केस की जड़ टाइगर ग्लोबल की इन्वेस्टमेंट स्ट्रकचर में है। कई विदेशी निवेशकों की तरह टाइगर ग्लोबल ने भी भारत में अपने निवेश मॉरीशस में बनी कंपनियों के जरिए किए थे। भारत-मॉरीशस डबल टैक्सेशन अवॉयडेंस एग्रीमेंट (DTAA) के तहत, शेयर बेचने से होने वाला कैपिटल गेन आमतौर पर मॉरीशस में टैक्स होता है, भारत में नहीं।
टाइगर ग्लोबल का कहना था कि उसके पास वैध TRC है, इसलिए भारत फ्लिपकार्ट से हुए मुनाफे पर टैक्स नहीं लगा सकता। लेकिन आयकर विभाग ने दलील दी कि ये मॉरीशस की कंपनियां सिर्फ “कागजी” या कंड्यूट कंपनियां हैं और असली नियंत्रण व फैसले कहीं और से लिए जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस मुद्दे की गहराई से जांच जरूरी है और सिर्फ TRC होना ही जांच रोकने का आधार नहीं हो सकता।
TRC एक आधिकारिक दस्तावेज होता है, जिसे किसी देश की टैक्स अथॉरिटी जारी करती है। यह बताता है कि कोई कंपनी या व्यक्ति किसी तय अवधि में उस देश का टैक्स रेजिडेंट है। भारत में टैक्स ट्रीटी का लाभ लेने के लिए TRC जरूरी होता है।
अब तक TRC को अक्सर टैक्स ट्रीटी का फायदा लेने के लिए पर्याप्त माना जाता था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि TRC जरूरी तो है, लेकिन अंतिम सबूत नहीं। अगर टैक्स अधिकारी संदेह करें, तो वे यह जांच कर सकते हैं कि कंपनी असली है या सिर्फ रास्ते के तौर पर बनाई गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि TRC होने का मतलब यह नहीं कि विदेशी निवेशक को टैक्स ट्रीटी का फायदा अपने आप मिल जाएगा। टैक्स अधिकारी अब कागजों के अलावा लेन-देन की असली सच्चाई भी देख सकते हैं।
इससे टैक्स विभाग की ताकत बढ़ेगी और वह ट्रीटी शॉपिंग जैसे मामलों की बेहतर जांच कर सकेगा, जहां टैक्स बचाने के लिए बीच के देशों का इस्तेमाल किया जाता है। टैक्स विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पुराने और नए कई मामलों में टैक्स डिमांड को बनाए रखना या फिर से खोलना आसान हो जाएगा।
करीब दो दशकों तक मॉरीशस के रास्ते भारत में निवेश करना आम बात थी। एक समय ऐसा भी था जब भारत में कुल एफडीआई का 30% से ज्यादा हिस्सा मॉरीशस से आता था। ब्लैकस्टोन, KKR और सिकोइया जैसे बड़े निवेशकों ने इसका फायदा उठाया।
TRC इस व्यवस्था का अहम हिस्सा था और आमतौर पर इसे टैक्स ट्रीटी का पुख्ता सबूत माना जाता था। टैक्स विभाग सवाल उठाता जरूर था, लेकिन अदालतें अक्सर TRC को मान्यता दे देती थीं, जब तक साफ गड़बड़ी न दिखे। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह भरोसा कम हो गया है। सिर्फ कागजात काफी नहीं होंगे, अगर कंपनी की असली गतिविधियां संदिग्ध पाई गईं।
टाइगर ग्लोबल पिछले एक दशक में भारत के टेक सेक्टर में सबसे आक्रामक निवेशकों में रहा है। 2013 से 2021 के बीच इसने ई-कॉमर्स, फिनटेक, लॉजिस्टिक्स और कंज्यूमर इंटरनेट से जुड़ी दर्जनों कंपनियों में निवेश किया।
इसके पोर्टफोलियो में फ्लिपकार्ट, रेजरपे, ड्रीम11, ग्रो, मीशो, स्पिन्नी, शेयरचैट, गपशप और इंफ्रा.मार्केट जैसी कंपनियां शामिल रही हैं। फ्लिपकार्ट से निकासी इसका सबसे बड़ा सौदा था।
2025 के अंत तक टाइगर ग्लोबल के भारत में करीब 20–30 निवेश सक्रिय बताए जाते हैं, जिनकी अनुमानित वैल्यू 2–4 अरब डॉलर है। पिछले साल 2.2 अरब डॉलर का नया फंड भी लॉन्च किया गया, हालांकि यह 2021 में जुटाए गए 12.7 अरब डॉलर से काफी कम है।
इस फैसले के बाद विदेशी निवेशकों की ऑफशोर संरचनाओं पर कड़ी नजर रखी जाएगी। अब सिर्फ टैक्स ट्रीटी वाले देश में कंपनी होना काफी नहीं होगा, बल्कि यह भी दिखाना होगा कि असली फैसले कहां लिए जाते हैं और कंपनी की वास्तविक गतिविधियां क्या हैं।
मर्जर, अधिग्रहण और एग्जिट डील्स में अब टैक्स जोखिम को लेकर ज्यादा सतर्कता बरती जाएगी। इससे सौदों में देरी भी हो सकती है। साथ ही, जिन फंड्स ने पहले इसी तरह की संरचना से भारत से निकासी की है, उन्हें भी भविष्य में दोबारा जांच का सामना करना पड़ सकता है।