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IRFC 2.0: रेलवे से बाहर भी कर्ज देने की तैयारी, मेट्रो और रैपिड रेल में 1 लाख करोड़ का अवसर

आईआरएफसी के सीएमडी मनोज कुमार दुबे ने बताया- बहुपक्षीय ऋण की रीफाइनैंसिंग तेज होगी, गैर-रेल क्षेत्रों में भी मजबूत कर्ज पोर्टफोलियो तैयार किया जाएगा।

Last Updated- January 16, 2026 | 4:12 PM IST
RITES Limited

भारतीय रेलवे को ऋण देने वाली एकमात्र संस्था इंडियन रेलवे फाइनैंस कॉरपोरेशन (आईआरएफसी) इस समय दायरा व्यापक करने के लिए खुद को आईआरएफसी 2.0 के रूप में स्थापित कर रही है। नई दिल्ली में ध्रुवाक्ष साहा के साथ बातचीत में आईआरएफसी के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक मनोज कुमार दुबे ने बहुपक्षीय ऋण के रीफाइनैंसिंग की रणनीति के बारे में बात की। प्रमुख अंश..

रेलवे से जुड़ी परियोजना को ऋण देने की अनिवार्यता के साथ आपकी किस व्यवसाय पर नजर है?

विविधीकरण के चरण में हम रेलवे से इतर क्षेत्रों पर भी ध्यान दे रहे हैं। रेलवे कारोबार में ब्याज से शुद्ध आय (एनआईएम) और लाभ का अनुमान लगाया जा सकता है, लेकिन रेलवे से इतर हमारा एनआईएम और कर के बाद मुनाफा (एनआईएम) बढ़ने की संभावना है। हम शून्य गैर निष्पादित संपत्ति (एनपीए) वाले ऋणदाता हैं और यह दर्जा हमारी पहचान है। ऐसे में हम चयन करने की स्थिति में हैं कि किसे कर्ज देना है। उदाहरण के लिए हम बिजली उत्पादन और पारेषण कंपनियों को ऋण दे सकते हैं, लेकिन वितरण कंपनियों को कर्ज नहीं देंगे। साल के अंत तक हमने 30,000 करोड़ रुपये ऋण देने का लक्ष्य रखा है। अब हम कई ग्राहक वाली कंपनी हैं,ऐसे में हर तिमाही हमारा एनआईएम सुधरेगा।

आपने पूर्वी माल ढुलाई गलियारे के विश्व बैंक के ऋण के रीफाइनैंस के लिए 10,000 करोड़ रुपये का समझौता किया है। आगे की क्या योजनाएं हैं?

माल ढुलाई गलियारे की रीफाइनैंसिंग हमारे लिए बड़ी परियोजना थी, क्योंकि यह अनूठी है। यह वित्त मंत्रालय के माध्यम से विश्व बैंक से डॉलर में मिला ऋण था और इसकी हेजिंग नहीं थी। रुपया गिरने के साथ डॉलर महंगा हो रहा है, ऐसे में ब्याज दर 10 प्रतिशत पार कर गई। हमने यह विचार करना शुरू किया कि यह तबका मामला है, जब डॉलर के मुकाबले रुपया 84 पर था। डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (डीएफसीसीआईएल) ने प्रस्ताव रखा और यह मसला हमने रेलवे बोर्ड के सामने उठाया।

हमने आर्थिक मामलों के विभाग के सामने भी एक प्रस्तुति दी। विश्व बैंक भी बहुत खुश था, क्योंकि वे सामान्यतया परियोजना की शुरुआत के लिए ऋण देते हैं। वे इससे बाहर निकलना चाहते थे, जब वाणिज्यिक परिचालन शुरू हो गया(पूर्वी गलियारा अक्टूबर 2023 में पूरा हुआ था)। वे खुश थे कि घरेलू बाजार से कोई रीफाइनैंस को इच्छुक है। हम न सिर्फ मेक इन इंडिया, बल्कि फंड इन इंडिया में विश्वास करते हैं। आज सरकार के तंत्र में ही बड़ी परियोजनाओं के लिए धन मुहैया कराने की व्यवस्था है।

बहुपक्षीय बैंक द्वारा वित्त पोषित कई अन्य परियोजनाएं हैं। क्या ऐसी अन्य योजना भी है?

हम एक और मॉडल पर विचार कर रहे हैं, जिसमें बहुपक्षीय एजेंसियां हमारे साथ मिलकर धन मुहैया कराने को तैयार हैं। भविष्य में हम एजेंसियों के साथ मिलकर ऋण दे सकते हैं जहां वे बुनियादी ढांचे के लिए धन मुहैया कराएंगी और हम रोलिंग स्टॉक के लिए धन देंगे। वाणिज्यिक संचालन शुरू होने पर हम आखिरकार बुनियादी ढांचे के हिस्से को भी अपने हाथों में लेंगे।

यह अगला चरण है। यह अगला चरण है। रैपिड रेल और मेट्रो में बहुत संभावना है। हर राज्य में क्षमता है। इसके लिए पहले बहुपक्षीय एजेंसियां धन मुहैया कराती थीं, जो प्रौद्योगिकी हस्तांतरण या किसी विशेष देश से अनिवार्य खरीद की शर्तों से जुड़ा था। अब 25-30 वर्षों के अनुभव के बाद शायद बहुपक्षीय एजेंसियों से इस तरह के मार्गदर्शन की हर बार आवश्यकता नहीं होती है।

यह अवसर कितना बड़ा है?

लगभग 25 मेट्रो परियोजनाएं या तो शुरू हो चुकी हैं और चल रही हैं या धन की तलाश में हैं। लगभग 400 किलोमीटर मेट्रो परियोजनाओं की मांग है, जिनके लिए हर साल 1 लाख करोड़ रुपये ऋण देने का मौका है। हम सीधे या बहुपक्षीय एजेंसियों के साथ मिलकर धन मुहैया कराने के लिए तैयार हैं।

बहुपक्षीय एजेंसी की परियोजनाओं की रीफाइनैंसिंग को आप किस तरह देखते हैं?

यह हमारी योजना में है? शायद 2026-27 इस तरह के कारोबार के लिए दरवाजे खोलेगा। इस साल हमने अपनी स्थिति मजबूत की है। इसके आंकड़े देना कठिन है, लेकिन मोटे तौर पर हर साल 10,000 से 15,000 करोड़ रुपये का कारोबार उपलब्ध है।

First Published - January 16, 2026 | 4:12 PM IST

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