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भारत की डिमांड स्टोरी ‘मास बनाम क्लास’ से आगे, कई ‘मिनी इंडिया’ से चल रही है उपभोग अर्थव्यवस्था

घरेलू उपभोग अच्छी स्थिति में है या नहीं यह बहस मीडिया में काफी प्रचलित है, खासकर जब बड़ी एवं पसंदीदा सूचीबद्ध कंपनियां विश्लेषकों के पूर्वानुमानों से कम नतीजे दर्ज करती हैं

Last Updated- January 12, 2026 | 10:19 PM IST
consumption growth

भारत में घरेलू उपभोग को लेकर पिछले 20 वर्षों से बहस कुछ ही मुद्दों पर अटकी हुई है और उनके जवाब भी किसी से छुपे नहीं हैं। अब थोड़ा साहस दिखाने और यह कहने का समय आ गया है कि ‘यह वह धारणा या आंकड़े नहीं हैं जो हम पसंद करते हैं मगर आइए इन्हें स्वीकार करते हैं।’ उदाहरण के लिए पारिवारिक आय, औपचारिक वेतनभोगी रोजगार। अब समय आ गया है कि हम ‘कई धारणाएं और सभी अपनी जगह दुरुस्त’ वाला विशिष्ट भारतीय विचार अपनाएं। उदाहरण के लिए विशाल जन समुदाय और खास वर्ग दोनों के बाजार आकर्षक रूप से बड़े और तेजी से बढ़ रहे हैं। आधुनिक पीढ़ी में स्टार्टअप संस्थापक और सरकारी नौकरी चाहने वाले दोनों शामिल हैं और बुजुर्ग व युवा दोनों ही महत्त्वपूर्ण जनसांख्यिकी लाभ के स्रोत हैं। इन्हें जेहन में रखते हुए ही हम आगे बढ़ सकते हैं।

घरेलू उपभोग अच्छी स्थिति में है या नहीं यह बहस मीडिया में काफी प्रचलित है, खासकर जब बड़ी एवं पसंदीदा सूचीबद्ध कंपनियां विश्लेषकों के पूर्वानुमानों से कम नतीजे दर्ज करती हैं। निजी अंतिम उपभोग व्यय (पीएफसीई) की वृद्धि धीमी हो गई है मगर यह समय के साथ लगातार बढ़ रही है। यह एक ऐसा रुझान है जिस पर हम भविष्य में सुरक्षित दांव लगा सकते हैं। जैसा कि इस स्तंभ में अक्सर जिक्र किया जाता है कि भारत में दुनिया में ऐसे लोगों की तादाद सबसे अधिक है जो उपभोग करने के लिए बहुत उत्सुक हैं और जिनकी आय धीरे-धीरे और निरंतर बढ़ रही है।

सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की मामूली वृद्धि दर के साथ भी पीएफसीई व्यय कंपनियों को बढ़ने के लिए पर्याप्त गुंजाइश प्रदान करता है। यह वृद्धि कहां और कैसे हासिल की जाए यह एक कारोबारी रणनीति से जुड़ा सवाल है न कि एक व्यापक उपभोग से जुड़े माहौल का। हम जानते हैं कि हमारे सभी परिभाषित आंकड़े समग्र स्तर पर बड़े मगर प्रति व्यक्ति स्तर पर छोटे हैं। अधिकांश चीजों के उपभोग के पूर्ण आंकड़े भारी भरकम हैं, खासकर दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में, मगर आम लोगों तक पहुंच फिर भी अधिक नहीं है। हम जानते हैं कि एक बड़े आंकड़े का एक छोटा फीसदी भी काफी बड़ा होता है इसलिए सभी व्याख्याएं सही हैं।

अक्सर होने वाली इस बहस की भी कोई आवश्यकता नहीं है कि आने वाले समय में मांग को किन क्षेत्रों से ताकत मिलेगी या उपभोग को ग्रामीण या शहरी, टियर 1 या टियर 2 और टियर 3 शहर, उत्तर प्रदेश या कर्नाटक बढ़ावा देंगें या युवा या फिर बुजुर्ग इसकी कमान संभालेंगे। यह सिद्ध हो चुका है कि मांग हर जगह मौजूद है और यहां तक कि धनी एवं संपन्न परिवार भी व्यापक और वृहद स्तर पर मौजूद हैं। इसका कोई आदर्श या मानक उत्तर खोजने के बजाय जिस कारण पर काम करने की जरूरत है वह कई ‘मिनी इंडिया’ की अवधारणा से जुड़ा है। इन कई ‘मिनी इंडिया’ में प्रत्येक की अपनी मिनी अर्थव्यवस्थाएं हैं जो विभिन्न कारकों से प्रभावित होती हैं। इन कारकों में अमेरिकी शुल्कों से लेकर मॉनसून, राजनीति, प्राकृतिक आपदाएं, बुनियादी ढांचा आदि शामिल हैं। लिहाज ध्यान इस बात पर केंद्रित होना चाहिए कि आय को प्रभावित करने वाली सकारात्मक और नकारात्मक खबरें कहां से आ सकती हैं। इसे ध्यान में रखते हुए उपभोग की उत्कृष्ट, निगरानी और पूर्वानुमान मॉडल का निर्माण किया जाना चाहिए।

क्रिसिल के डीआरआईपी (दिवंगत अर्थशास्त्री सुबीर गोकर्ण द्वारा तैयार) मॉडल का उपयोग मॉनसून की प्रगति के साथ-साथ वास्तविक समय में कृषि आय की निगरानी और पूर्वानुमान के लिए किया जा सकता है। एक अन्य मॉडल जिसका उपयोग किसी ग्रामीण ऋणदाता द्वारा किया जाता है वह भारत के जटिल उपभोक्ता तंत्र में किसी भी समय खपत स्वास्थ्य का पूर्वानुमान लगाने के लिए जिलों में कृषि, निर्माण,खनन,बुनियादी ढांचा निर्माण और राजनीतिक गतिविधियों या सरकारी कार्यों की लगातार निगरानी करता है।

घरेलू नकदी प्रवाह के मौलिक कारकों पर सक्रिय तौर पर नजर रखने के लिए और इन कई ‘मिनी इंडिया’ में उपभोग से जुड़े बदलाव स्वीकार करने से समय के साथ इसकी मजबूती लगातार बढ़ती जाएगी जिससे हर तिमाही में होने वाली अटपटी समीक्षा और अटकलों से बचा जा सकेगा। ‘आम जन समुदाय या वर्ग’, भारत की ‘वास्तविक’ उपभोग क्षमता कहां निहित है’ इस मुद्दे पर लंबे समय से चली आ रही बहस अपनी समय सीमा पूरी कर चुकी है। तथ्य हमारे सामने हैं यानी सबसे अमीर 20 फीसदी परिवारों के पास भारत की घरेलू आय का आधा से अधिक हिस्सा है और ऊंची वृद्धि, कोविड महामारी से पूर्व की अवधि में भी यह 44 से 46 फीसदी से नीचे कभी नहीं गया।

बाकी लोग भी अपनी आय लगातार बढ़ा रहे हैं और कम आय स्तर पर भी पर्याप्त कुल मांग रखते हैं। हम जानते हैं कि भारतीय उपभोग, मूल्य और प्रदर्शन बिंदुओं की एक श्रृंखला पर आधारित हैं। कंपनियों को यह तय करना है कि वे इस ढांचे में कहां दांव लगाना चाहती हैं और कितनी तेजी के साथ। यह इस बात पर निर्भर करता है कि वे नवाचार कर सकती हैं या लागत नियंत्रित रख आय बढ़ाने में सक्षम रहती हैं। ऐसी कंपनियां जो व्यापक बाजारों में सेवा नहीं देना या उतरना चाहती हैं, वे एक बड़ी मांग का लाभ उठाने में अक्षम रहती हैं जहां बड़ी संभावनाएं तैयार की जा सकती हैं और जहां दीर्घकालिक मूल्य, मात्रा और मूल्य-बिंदु विकास समय के साथ स्वतः होते हैं। वांछित नफा-नुकसान मूल्यांकन के आधार पर ऐसी कंपनी विशिष्ट विकल्पों को गायब होते मध्यम वर्ग या खत्म होती मांग के रूप में प्रतिबिंबित करना गलत है।

उपभोग को बेहतर ढंग से समझने के लिए हमें व्यवसाय की अधिक गहराई से समझ की आवश्यकता है जिससे आय के लिए जोखिम मूल्यांकन ढांचा तैयार हो सके यानी यह समझने में मदद मिले कि भारतीय उपभोग पर खर्च करने (और उपभोग करने के लिए उधार लेने और उसे चुकाने) के लिए वास्तव में पैसा कैसे कमाते हैं। हम मौजूदा आंकड़ों से कह सकते हैं कि उपभोक्ताओं का एक बड़ा हिस्सा स्व-रोजगार से जुड़ा है या वे छोटे व्यवसाय करते हैं।

हम जानते हैं कि कई गिग नौकरियां करने का चलन खासकर युवाओं में बढ़ रहा है। हमें उपभोक्ताओं के कार्यों, किसी व्यक्ति की कुल आय के प्रत्येक घटक के हिस्से और उससे जुड़े अनुमान और प्रतिकूल हालात से उबरने की क्षमता के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण वर्गीकरण से परे जाकर गहन विश्लेषण करने की आवश्यकता है। इससे वास्तविक मध्यम वर्ग के आकार को स्थापित करने में भी मदद मिलेगी और इसके वास्तविक आकार पर बेकार की बहस से बचा जा सकेगा।

हमें समान रूप से बारीक और सूक्ष्म स्तर पर विभिन्न आय, व्यवसाय, शिक्षा खंडों की प्राथमिकताओं (जीवन दृष्टिकोण, लक्ष्य, चिंताएं) को समझने की आवश्यकता है जो खर्च के तौर-तरीकों के बारे में उनकी सोच को आकार देते हैं और उनके खर्च को चलाते हैं। शायद उत्पादकता वृद्धि सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू बना हुआ है जो खपत को चलाता है। शायद नई आकांक्षा जीवन के भविष्य के लिए पूंजीगत व्यय में निवेश करने के बजाय जीवन की अच्छाइयों के साथ प्रयोग और उनका अनुभव करना है।


(लेखिका ग्राहक-आधारित कारोबारी रणनीति के क्षेत्र में व्यावसायिक सलाहकार हैं)

First Published - January 12, 2026 | 9:57 PM IST

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