MSME की उड़ान पर न लगे ब्रेक: नियमन में ढील से ज्यादा, बेहतर गवर्नेंस और प्रोत्साहन की जरूरत
मीडिया एवं पेशेवर संगठनों द्वारा सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योग (एमएसएमई) से संबंधित गैर-वित्तीय नियामकीय सुधार से जुड़ी उच्चस्तरीय समिति की कुछ सिफारिशों की व्यापक चर्चा हुई है। ये सिफारिशें कुछ हद तक स्वागतयोग्य और कुछ हद तक चिंताजनक हैं। किसी भी प्रयास से यदि प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाए, समय, लागत कम करने के […]
विकास का इंजन बदला: ‘पीपल इंडिया’ और मिडिल इंडिया को मिली ज्यादा ताकत
भारत की महाशक्ति यहां के लोग हैं। यह सच है कि हम सभी में कमियां हैं। यहां बड़ी-बड़ी बातें करने वाले, नियम तोड़ने वाले, व्यवस्था से खिलवाड़ करने वाले, पदानुक्रम की धौंस जमाने वाले लोगों की कोई कमी नहीं हैं। मगर इन बातों के बावजूद भारतीय बहुत मेहनती हैं। बेशक, छुपी हुई बेरोजगारी मौजूद है […]
भारत की डिमांड स्टोरी ‘मास बनाम क्लास’ से आगे, कई ‘मिनी इंडिया’ से चल रही है उपभोग अर्थव्यवस्था
भारत में घरेलू उपभोग को लेकर पिछले 20 वर्षों से बहस कुछ ही मुद्दों पर अटकी हुई है और उनके जवाब भी किसी से छुपे नहीं हैं। अब थोड़ा साहस दिखाने और यह कहने का समय आ गया है कि ‘यह वह धारणा या आंकड़े नहीं हैं जो हम पसंद करते हैं मगर आइए इन्हें […]
मजबूत आशावाद के बावजूद भारतीय कंपनी जगत निवेश में देरी क्यों कर रहा है?
भारत की आर्थिक स्थिति पर की गई सभी टिप्पणियों में इस बात पर सहमति जताई गई है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि गति बढ़ाने या उसे बरकरार रखने के लिए निजी निवेश की रफ्तार जरूर बढ़नी चाहिए और राजकोषीय रूप से जिम्मेदार सरकार इस दिशा में प्रयास कर सकती है। निर्यात करने वाली […]
‘हम तो ऐसे ही हैं’ के रवैये वाला भारत: जटिल, जिज्ञासु और मनमोहक
पिछले महीने ‘दीवाली कब है’ का भ्रम देश के कई हिस्सों में था क्योंकि पंचांग के अनुसार अमावस्या की तिथि 20 और 21 अक्टूबर दोनों दिन पड़ रही थी। इस भ्रम के बीच फ्रांसीसी दूतावास से दीवाली की शुभकामनाओं वाला एक आकर्षक वीडियो (हालांकि, इन दिनों किसी डिजिटल सामग्री के बारे में पुख्ता तौर पर […]
खपत के रुझान से मिल रहे कैसे संकेत? ग्रामीण उपभोग मजबूत, शहरी अगले कदम पर
हम उपभोग में क्या अभूतपूर्व उछाल की कगार पर हैं? यह लेख इस बात का आकलन करने के लिए है कि उपभोक्ताओं के नजरिये से क्या हो सकता है। उपभोक्ता आधारित आकलन वास्तव में कंपनी के प्रदर्शन आधारित या सूचीबद्ध कंपनियों के प्रदर्शन आधारित आकलनों की तुलना में इस तरह के घटनाक्रम को बेहतर ढंग […]
भारत के मास मार्केट संभावनाओं को खोलने के लिए जरूरी है रचनात्मक नीतिगत पहल
हाल की विदेशी चुनौतियों के कारण हमारा ध्यान अब घरेलू खपत पर गया है ताकि यह अंदाजा लगाया जा सके कि क्या यह सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि को बरकरार रख सकता है। सभी की नजरें और उम्मीदें मांग बढ़ाने वाली पारंपरिक नीतियों पर टिकी हैं। आयकर दरों में पहले की गई कटौती से, […]
आकांक्षाओं से थकी हुई: मध्य वर्ग की बदलती प्रकृति को समझना जरूरी
अर्थशास्त्री सुबीर गोकर्ण (अब दिवंगत) ने 2007 के आसपास इस अखबार में ‘मिडल क्लास ओरिजिन्स’(मध्य वर्ग की उत्पत्ति) शीर्षक से एक ऐतिहासिक लेख लिखा था। उसमें कही गईं बातें आज लगभग 20 साल बाद और भी ज्यादा प्रासंगिक हैं। मध्य वर्ग की उत्पत्ति अथवा वह प्रक्रिया जिससे यह वर्ग उभरा, बहुत मायने रखती है। इस […]
ग्राहक-केंद्रित बनें, ग्राहक-उन्मत्त नहीं: कंपनियां सोच-समझकर चुनें अपना रास्ता
एक समय में ‘कस्टमर सेंट्रिक’(ग्राहक-केंद्रित) शब्दावली बेहद लोकप्रिय थी लेकिन अब उसकी जगह तेजी से एक अधिक प्रभावशाली शब्द ‘कस्टमर अबसेस्ड’(ग्राहक-जुनूनी या ग्राहक आसक्त) ले रहा है। यह शब्द अब बोर्डरूम प्रेजेंटेशन में, ‘मोट’ (बाजार में मजबूत पकड़) और ‘पिवट’ (दिशा बदलना) जैसे शब्दों के साथ, सबसे पसंदीदा बन गया है। गौर करने वाली बात […]
बोर्ड के लिए ‘लक्ष्मण रेखा’ का सम्मान जरूरी
भारतीय कंपनियों के निदेशकमंडल (बोर्ड) कई बदलाव से होकर गुजरे हैं। नए नियमों, बाजार की गतिविधियों, नए अनुभव एवं वैश्विक संचालन मानकों के कारण बोर्ड में ये बदलाव दिख रहे हैं। स्वयं हमारे एवं अपने प्रतिस्पर्धियों के तजुर्बे के आधार पर अब हम एक ऐसे पहलू की तरफ ध्यान खींचना चाहते हैं जिसे लेकर भारतीय […]









