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लेखक : रमा बिजापुरकर

आज का अखबार, लेख

भारत में क्विक कॉमर्स का बढ़ता असर, किराना स्टोर कैसे करेंगे मुकाबला?

किराना दुकानें एक ऐसी प्रजाति हैं जो सन 1991 के बाद उभरे नए खुदरा कारोबारी स्वरूपों से मिल रही तमाम चुनौतियों के बीच भी फलती-फूलती रही हैं। लेकिन अब क्विक कॉमर्स के उभार के साथ उनको असली चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। फ्लिपकार्ट मिनट्स जो इस क्षेत्र में सबसे नया प्रवेशकर्ता है उसका […]

आज का अखबार, लेख

MSMEs की महत्वाकांक्षाओं को न दबाएं: मानकों से समझौता किए बिना अनुपालन को सरल बनाना जरूरी

मीडिया एवं पेशेवर संगठनों द्वारा सूक्ष्म, छोटे और मझोले उद्योग (एमएसएमई) से संबंधित गैर-वित्तीय नियामकीय सुधारों से जुड़ी उच्चस्तरीय समिति की कुछ सिफारिशों की व्यापक चर्चा हुई है। ये सिफारिशें कुछ हद तक स्वागतयोग्य और कुछ हद तक चिंताजनक हैं। किसी भी प्रयास से यदि प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाए, समय, लागत कम करने के […]

आज का अखबार, लेख

आर्थिक अनुमानों में विरोधाभास! क्या वाकई सुरक्षित है भारत का ‘मिडिल क्लास’ और घरेलू बजट?

पश्चिम एशिया के संघर्ष और वैश्विक स्तर पर ऊर्जा के मोर्चे पर अनिश्चितता के बावजूद, नीति-निर्माता यह स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि घरेलू खपत इस उथल-पुथल के बीच हमारी सबसे बड़ी मजबूत कड़ी बनेगी। शेयर बाजार चढ़ता और गिरता रहा है और इसको लेकर एक कथ्य यह है कि ये केवल अस्थायी झटके हैं […]

आज का अखबार, लेख

डिजिटल आंकड़ों के दौर में वास्तविक संवाद न हो दरकिनार

जब मैंने मुख्यधारा के एक समाचार पत्र में एक खास किस्म का लेख पढ़ा तो ग्राहकों के हितों को उठाने वाले और उसी अनुरूप व्यवहार करने वाले एक व्यक्ति के रूप में मुझे काफी खुशी हुई। इस लेख में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारियों से आग्रह किया गया था कि वे अपने कार्यालयों से […]

आज का अखबार, लेख

MSME की उड़ान पर न लगे ब्रेक: नियमन में ढील से ज्यादा, बेहतर गवर्नेंस और प्रोत्साहन की जरूरत

मीडिया एवं पेशेवर संगठनों द्वारा सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योग (एमएसएमई) से संबंधित गैर-वित्तीय नियामकीय सुधार से जुड़ी उच्चस्तरीय समिति की कुछ सिफारिशों की व्यापक चर्चा हुई है। ये सिफारिशें कुछ हद तक स्वागतयोग्य और कुछ हद तक चिंताजनक हैं। किसी भी प्रयास से यदि प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाए, समय, लागत कम करने के […]

आज का अखबार, लेख

विकास का इंजन बदला: ‘पीपल इंडिया’ और मिडिल इंडिया को मिली ज्यादा ताकत

भारत की महाशक्ति यहां के लोग हैं। यह सच है कि हम सभी में कमियां हैं। यहां बड़ी-बड़ी बातें करने वाले, नियम तोड़ने वाले, व्यवस्था से खिलवाड़ करने वाले, पदानुक्रम की धौंस जमाने वाले लोगों की कोई कमी नहीं हैं। मगर इन बातों के बावजूद भारतीय बहुत मेहनती हैं। बेशक, छुपी हुई बेरोजगारी मौजूद है […]

आज का अखबार, लेख

भारत की डिमांड स्टोरी ‘मास बनाम क्लास’ से आगे, कई ‘मिनी इंडिया’ से चल रही है उपभोग अर्थव्यवस्था

भारत में घरेलू उपभोग को लेकर पिछले 20 वर्षों से बहस कुछ ही मुद्दों पर अटकी हुई है और उनके जवाब भी किसी से छुपे नहीं हैं। अब थोड़ा साहस दिखाने और यह कहने का समय आ गया है कि ‘यह वह धारणा या आंकड़े नहीं हैं जो हम पसंद करते हैं मगर आइए इन्हें […]

आज का अखबार, लेख

मजबूत आशावाद के बावजूद भारतीय कंपनी जगत निवेश में देरी क्यों कर रहा है?

भारत की आर्थिक स्थिति पर की गई सभी टिप्पणियों में इस बात पर सहमति जताई गई है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि गति बढ़ाने या उसे बरकरार रखने के लिए निजी निवेश की रफ्तार जरूर बढ़नी चाहिए और राजकोषीय रूप से जिम्मेदार सरकार इस दिशा में प्रयास कर सकती है। निर्यात करने वाली […]

आज का अखबार, लेख

‘हम तो ऐसे ही हैं’ के रवैये वाला भारत: जटिल, जिज्ञासु और मनमोहक

पिछले महीने ‘दीवाली कब है’ का भ्रम देश के कई हिस्सों में था क्योंकि पंचांग के अनुसार अमावस्या की तिथि 20 और 21 अक्टूबर दोनों दिन पड़ रही थी। इस भ्रम के बीच फ्रांसीसी दूतावास से दीवाली की शुभकामनाओं वाला एक आकर्षक वीडियो (हालांकि, इन दिनों किसी डिजिटल सामग्री के बारे में पुख्ता तौर पर […]

आज का अखबार, लेख

खपत के रुझान से मिल रहे कैसे संकेत? ग्रामीण उपभोग मजबूत, शहरी अगले कदम पर

हम उपभोग में क्या अभूतपूर्व उछाल की कगार पर हैं? यह लेख इस बात का आकलन करने के लिए है कि उपभोक्ताओं के नजरिये से क्या हो सकता है। उपभोक्ता आधारित आकलन वास्तव में कंपनी के प्रदर्शन आधारित या सूचीबद्ध कंपनियों के प्रदर्शन आधारित आकलनों की तुलना में इस तरह के घटनाक्रम को बेहतर ढंग […]

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