भारत की आर्थिक स्थिति पर की गई सभी टिप्पणियों में इस बात पर सहमति जताई गई है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि गति बढ़ाने या उसे बरकरार रखने के लिए निजी निवेश की रफ्तार जरूर बढ़नी चाहिए और राजकोषीय रूप से जिम्मेदार सरकार इस दिशा में प्रयास कर सकती है।
निर्यात करने वाली कंपनियों में निवेश की बात छोड़ दें क्योंकि इनकी अपनी विशेष चुनौतियां होती हैं जैसे कि विनिर्माण में लागत प्रतिस्पर्धात्मकता और सेवाओं के लिए बेहतर गुणवत्ता वाले प्रतिभाशाली लोगों की उपलब्धता आदि। अर्थशास्त्रियों का लंबे समय से यह कहना रहा है कि घरेलू स्तर पर कारोबार करने वाली कंपनियों की एक दिक्कत यह है कि उन्हें यह स्पष्ट तौर पर नहीं दिख रहा है कि आगे कितनी मांग होगी जिसके कारण वे नया निवेश करने से हिचकिचा रही हैं। सवाल यह है कि आखिरकार कंपनियां किस तरह की मांग की तलाश में हैं जिसे वे भारत के घरेलू मांग के किसी भी पहलू में पैसा लगाने का फैसला लेने से पहले देखना चाहती हैं?
देश के कॉरपोरेट जगत के सार्वजनिक और निजी बयानों से भारत की अर्थव्यवस्था और घरेलू खपत की कहानी में मजबूत भरोसा और आत्मविश्वास दिखाई देता है। साथ ही आज के सकारात्मक बुनियादी सिद्धांतों और भविष्य के कारकों के संकेत देने वाली रिपोर्टें, जो आर्थिक और उपभोक्ता दोनों संकेतकों पर आधारित हैं, उन्हें नियमित रूप से वित्तीय बाजार के बड़े सार्वजनिक और निजी खिलाड़ियों द्वारा जारी किया जाता है और उसे मीडिया के दिग्गज दोहराते हैं और कंपनियों द्वारा इसकी पुष्टि की जाती है। विदेश में भारत के विश्लेषकों से पर्याप्त सत्यापन मिलता है कि देश आर्थिक और राजनीतिक रूप से दुनिया में वास्तव में बेहद संभावनाओं से भरा है।
क्या आम अर्थव्यवस्था, गहराई से शेयर बाजार जैसा ही उत्साह महसूस नहीं करते हैं? या क्या ऐसी दूसरी भावनाएं हैं जो निवेश के इस सुस्त व्यवहार की व्याख्या करती हैं और अति उत्साह को खत्म कर रही हैं? जैसे कि नीति स्थिरता में विश्वास या कारोबार करने में आसानी और निष्पक्षता या अधिक विनियमन या नौकरियों के बारे में एक अनकही चिंता या फिर उपभोग के लिए बढ़ता घरेलू ऋण जिसका ‘हैरी पॉटर’ के वोल्डेमॉर्ट की तरह नाम नहीं लिया जाना चाहिए?
कंपनियों के नतीजे भी खराब नहीं हैं, खासतौर पर तब जब कंपनियां प्रतिस्पर्धा और नई दुनिया के माहौल से जुड़ी अपरिहार्य चुनौतियों को स्वीकार करती हैं। क्या कंपनियां पुराने दिनों (जो अब खत्म हो चुके हैं) की वापसी का इंतजार कर रही हैं जब कम प्रतिस्पर्धा वाले नए बाजारों से उच्च वृद्धि होती थी और जहां सालाना 20 फीसदी राजस्व वृद्धि ‘सामान्य’ थी? क्या भारतीय मांग की संरचना को देखते हुए उन्हें बड़े पैमाने पर वैसे रिटर्न हासिल करने का भरोसा नहीं है, जिनकी उन्हें आदत है (और जिससे शेयर बाजार निराश होगा)?
शायद कंपनी रणनीति पर अधिक विश्लेषण की आवश्यकता है। कंपनियों को राजस्व वृद्धि को बढ़ावा देने में फर्म की रणनीति की भूमिका बनाम सरकार की भूमिका के बारे में अपने दृष्टिकोण को फिर से दुरुस्त करने की आवश्यकता है। यही बात इस तर्क पर भी लागू होती है कि विनिर्माण में क्षमता उपयोग अब भी केवल मध्यम रूप से अधिक है ऐसे में रणनीतिक विकल्प बनाम मांग के माहौल की भूमिका क्या है?
चूंकि अधिकांश बड़ी कंपनियां अपनी घोषित रणनीतिक पसंद के अनुसार अपने से जुड़े बाजार को भारत के खास वर्ग के रूप में परिभाषित करना पसंद करती हैं और यह इस स्तर तक चला जाता है कि वास्तव में ‘प्रीमियमीकरण’ ही रणनीति का मुख्य आधार बन जाता है। ऐसे में वे प्रभावी रूप से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 50 फीसदी और भारत के 20 से 30 फीसदी घरों को सेवा दे रही हैं। इन परिवारों के उपभोग के रुझान अब परिपक्वता के एक अलग चरण में हैं और उनकी बढ़ी हुई आय का निवेश उसी उपभोग में अधिक नहीं हो रहा है भले ही घरों का आकार छोटा हो रहा है और निवेश के अवसर बढ़ रहे हैं।
जरूरी नहीं है कि यह वैल्यू समान रूप से वितरित हो। संभव है कि यह विभिन्न खास श्रेणियों में गैर आनुपातिक तरीके से बंट गई हो जैसे बच्चों की पढ़ाई, विदेश यात्रा, लक्जरी घर, नए अनुभव और परंपरागत तौर पर बड़ी कंपनियों जैसे खर्च की कुछ खास श्रेणियों में ही ज्यादा केंद्रित हो गई हो। ऐसी कंपनियों को अपनी रणनीति के आधार पर दोबारा सोचने की जरूरत है।
क्या अब प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को बड़े पैमाने पर बचाव के लिए आगे आना होगा? पिछले तीन दशकों में पश्चिमी देशों की कंपनियों ने भारत में उतना निवेश नहीं किया, जितनी यहां कुल मांग के चलते मौके बन रहे थे। इसकी एक वजह वे विचार थे जिसे सीके प्रहलाद ‘कॉरपोरेट साम्राज्यवाद’ कहते हैं। इसका मतलब है कि वे चाहते थे कि जिस देश में वे जाएं, वह उनके हिसाब से चले बजाय इसके कि वे अपने तरीकों को नई दुनिया के हिसाब से ढालें।
वे अपनी मौजूदा रणनीतियों, उत्पाद डिजाइन और खोज के लिए बाजार में विस्तार चाहते थे खासतौर पर ऐसी कीमत पर जिससे उनका वैश्विक मुनाफा कम न हो। उनके लिए भारत, पूरे भारत का एक छोटा सा लेकिन अमीर हिस्सा था। वहीं दूसरी तरफ, कोरिया और चीन की कंपनियों ने ‘भारत के लिए उत्पाद बनाओ’ की नीति अपनाई और उन्हें इसका फायदा भी मिला। पश्चिमी देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियां जो अब भी एफडीआई का बड़ा स्रोत हैं, उन्हें अपनी सोच बदलने की जरूरत है। उन्हें समझना होगा कि दुनिया बदल गई है और हर देश की अपनी जरूरतें हैं इसलिए उन्हें हर देश के लिए अलग रणनीति बनानी होगी।
हमें एफडीआई से जुड़ी एक ऐसी रणनीति बनानी होगी जो लंबे समय तक चले और जिसमें धैर्य रखना जरूरी हो। हमें ‘मेड-फॉर-इंडिया’ की रणनीति को बढ़ावा देना होगा ताकि शुरू में अधिक निवेश करने पर आने वाले वर्षों में अच्छा और निश्चित मुनाफा मिल सके, जो समय के साथ बढ़ता जाए। द इकॉनमिस्ट में छपे एक लेख में कहा गया है कि जर्मनी के छोटे और मध्यम आकार के उद्यम (मिटेलस्टैंड) चीन के बाद भारत को एक बड़े मौके के तौर पर देख रहे हैं।
उन्हें भारत के छोटे कारोबार के साथ मिलकर काम करने और निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करना एफडीआई पाने का एक अच्छा तरीका हो सकता है। इससे छोटे कारोबारों को पैसा, ज्ञान और बेहतर साझेदारियां मिलेंगी, जिससे वे मजबूत होंगे।
देश की कंपनियों को भी शेयर बाजार के हिसाब से अपनी कारोबारी रणनीति नहीं बनानी चाहिए बल्कि लंबी अवधि के बारे में सोचना चाहिए और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
(लेखिका ग्राहक-आधारित व्यवसाय रणनीति के क्षेत्र में एक व्यवसाय सलाहकार हैं)