facebookmetapixel
राज्यों के पूंजीगत व्यय की धीमी रफ्तार: 9 महीनों में बजट का केवल 46% हुआ खर्च, केंद्र के मुकाबले पिछड़ेअर्थव्यवस्था 7% की रफ्तार से बढ़ सकती है, आगे के सुधारों से वृद्धि दर में और तेजी संभव: CEA वी अनंत नागेश्वरनराजकोषीय मोर्चे पर राहत: चालू वित्त वर्ष के 9 महीनों में बजट अनुमान का 54.5% रहा राजकोषीय घाटाविश्व बैंक का भारत को बड़ा समर्थन: अगले 5 वर्षों में रोजगार के लिए मिलेगा $10 अरब तक सालाना लोनभारत में iPhone 16 बना सबसे ज्यादा बिकने वाला स्मार्टफोन, Apple का दबदबा बढ़ा2026 की खराब शुरुआत: जनवरी में शेयर बाजार 10 साल में सबसे कमजोर, सेंसेक्स-निफ्टी 3% से ज्यादा गिरेजीप इंडिया का मास्टरप्लान: ‘Jeep 2.0’ रणनीति के साथ भारत को ग्लोबल एक्सपोर्ट हब बनाने की तैयारीGold-Silver ETF में सबसे बड़ी एकदिवसीय गिरावट, डॉलर मजबूत होने से निवेशकों में घबराहटमेटल शेयरों की भारी बिकवाली से बाजार लुढ़का, बजट से पहले सेंसेक्स-निफ्टी पर दबावITC का बड़ा दांव: प्रीमियम प्रोडक्ट्स में शामिल हुआ ‘ताजा जायका’, अब सीधे क्लाउड किचन से होगी डिलीवरी

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: मासिक धर्म स्वच्छता अब अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का मौलिक अधिकार

कोर्ट का मानना है कि मासिक धर्म की प्रोडक्ट्स और जरूरी सुविधाएं लड़कियों के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ उनकी कुल भलाई के लिए बेहद जरूरी हैं

Last Updated- January 30, 2026 | 5:49 PM IST
Menstrual
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक फैसला दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि मासिक धर्म की सफाई का हक और मासिक धर्म से जुड़ी चीजों तक पहुंच, संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए जीवन के अधिकार का हिस्सा है।

यह फैसला जस्टिस जे.बी. परदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने सुनाया। मामला केंद्र सरकार की ‘स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक स्वच्छता नीति’ को देशभर में लागू करने से जुड़ा था। कोर्ट ने खासतौर पर सरकारी और सरकारी मदद वाले स्कूलों पर ध्यान दिया। सवाल उठा था कि क्या स्कूलों में ठीक मासिक स्वच्छता की सुविधाएं न होना लड़कियों के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन है।

मासिक स्वास्थ्य को जीवन के अधिकार में शामिल किया

कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार मासिक स्वास्थ्य भी शामिल है। बेंच ने लिखा, “अगर लड़की को सुरक्षित, असरदार और किफायती मासिक स्वच्छता की सुविधाएं मिलें, तो उसका यौन और प्रजनन स्वास्थ्य बेहतर स्तर तक पहुंच सकता है।”

कोर्ट का मानना है कि मासिक धर्म से जुड़े प्रोडक्ट्स और जरूरी सुविधाएं लड़कियों के शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी हैं। बिना इनके लड़कियां कई तरह की परेशानियों से गुजरती हैं।

Also Read: Economic Survey 2026: जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां बढ़ीं, बच्चों में मोटापे का खतरा

सुविधाओं की कमी से शिक्षा का अधिकार भी खतरे में

कोर्ट ने एक अहम सवाल पर गौर किया – क्या स्कूलों में अलग-अलग लड़के-लड़कियों के टॉयलेट और मासिक धर्म के लिए पैड्स जैसी चीजें न होना शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है?

जजों ने देखा कि खराब बुनियादी ढांचा और बेसिक सुविधाओं की कमी से लड़कियां स्कूल जाना छोड़ देती हैं या पूरी पढ़ाई बीच में छोड़ देती हैं। इससे उनकी आगे की पढ़ाई और जिंदगी के मौके प्रभावित होते हैं।

कोर्ट ने कहा कि मासिक स्वच्छता की सुविधाओं तक पहुंच न होना लड़की की गरिमा को नुकसान पहुंचाता है। फैसले में लिखा गया है, “अगर मासिक स्वास्थ्य के साधन नहीं मिलते, तो लड़की की गरिमा कमजोर होती है। असली गरिमा तब होती है जब कोई बिना अपमान, अलग-थलग या अनावश्यक तकलीफ के जीवन जी सके।” संविधान में खासकर बच्चों के लिए गरिमा को बहुत अहम माना गया है।

लड़कियों, माता-पिता को जागरूक और मजबूत बनाने का संदेश

कोर्ट ने इस फैसले को जागरूकता का जरिया बताया। इसका मतलब है कि लड़की छात्राएं, टीचर्स और अभिभावक समझें कि मासिक स्वच्छता उनका कानूनी हक है और वे स्कूलों में अच्छी सुविधाएं मांग सकते हैं।

बेंच ने कहा कि मासिक धर्म के उत्पाद और सुरक्षित शौचालय जैसी सुविधाएं देना जरूरी है, ताकि लड़कियों के लिए पढ़ाई का माहौल समावेशी और सहायक बने।

First Published - January 30, 2026 | 5:31 PM IST

संबंधित पोस्ट