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अर्थव्यवस्था 7% की रफ्तार से बढ़ सकती है, आगे के सुधारों से वृद्धि दर में और तेजी संभव: CEA वी अनंत नागेश्वरन

वी अनंत नागेश्वरन ने कहा कि घरेलू उद्योग को हमेशा के लिए संरक्षण नहीं मिल सकता लेकिन निर्यात प्रदर्शन और नवाचार के बदले में उन्हें सुरक्षा मिल सकती है

Last Updated- January 30, 2026 | 10:56 PM IST
Chief Economic Advisor (CEA) V Anantha Nageswaran

संसद में आ​र्थिक समीक्षा पेश होने के एक दिन बाद सरकार के मुख्य आ​र्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने कहा कि घरेलू उद्योग को हमेशा के लिए संरक्षण नहीं मिल सकता लेकिन निर्यात प्रदर्शन और नवाचार के बदले में उन्हें सुरक्षा मिल सकती है। रुचिका चित्रवंशी के साथ वर्चुअल बातचीत में नागेश्वरन ने कहा कि अभी के हालात में अर्थव्यवस्था लगातार 7 फीसदी वृद्धि हासिल करने में सक्षम है तथा आगे और सुधारों से वृद्धि में तेजी संभव है। संपादित अंश :

आ​र्थिक समीक्षा में स्वदेशी पर जोर देने की बात कही गई है। स्वदेशी, आत्मनिर्भर भारत से कैसे अलग है?

इसमें कोई फर्क नहीं है। यह एक सिद्धांत है। अवधारणा में अंतर यह है कि हमें पहले यह तय करना होगा कि किन कामों को पहले करें। व्यवहार्यता, वांछनीयता के समीकरण को ठीक से व्यवस्थित करना होगा। हमें इस बारे में स्पष्टता होनी चाहिए कि हम पहले किन चीजों पर जाना चाहते हैं। कुछ जरूरी हैं, कुछ बहुत जरूरी हैं और कुछ ऐसी हैं जो हों तो अच्छा है।

कुछ वैक​ल्पिक हैं जिनका बाजार ध्यान रख सकता है और कुछ ऐसी चीजें हैं जिनके लिए हमारे पास दूसरे स्रोत या साधन उपलब्ध हैं। हम उद्योगों से कुछ पारस्परिक दायित्व चाहते हैं। इसलिए हमेशा के लिए कोई सुरक्षा नहीं है लेकिन नवाचार, निर्यात प्रदर्शन, कीमतों और गुणवत्ता के मामले में संरक्षण दिया जा सकता है।

समीक्षा में मध्यम अव​धि में 7 फीसदी वृद्धि क्षमता का अनुमान लगाया गया है। तो क्या यह सामान्य तरीके से हासिल हो सकता है? या इसे हासिल करने के लिए और ज्यादा सुधारों की दरकार है?

वर्ष2023 और जनवरी 2026 के बीच हुए सुधारों के आधार पर हमने वृद्धि के अनुमान को बढ़ाया है। मौजूदा स्थिति के अनुसार अर्थव्यवस्था 7 फीसदी की निरंतर वृद्धि हासिल करने में सक्षम है। अगर हम और सुधार करते हैं तो इसे और आगे ले जाने में खुशी होगी।

आपने कहा है कि रुपया अपनी क्षमता से कम प्रदर्शन कर रहा है। क्या रुपये को लेकर थोड़ी चिंता है?

हमने सिर्फ तथ्य बताए हैं। जब पूंजी प्रवाह कमजोर होता है तो मुद्रा पर इसका असर पड़ता है। हमने कुछ सुझाव भी दिए हैं कि कैसे लंबे समय में हम मुद्रा में ​स्थिरता हासिल कर सकते हैं। कब मुद्रा में गिरावट चिंता का सबब बन जाएगा इसे पहले से बताना संभव नहीं है। यह सब परिस्थिति पर निर्भर करता है। कोई विशेष स्तर नहीं है कि उसके ऊपर जाने पर चिंता होनी चाहिए। इसे इस तरह से नहीं देखना चाहिए।

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समीक्षा में ‘सरकारी कंपनी’ को नए सिरे से परिभाषित करने और केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों में सरकार की हिस्सेदारी 26 फीसदी तक लाने का सुझाव राजस्व बढ़ाने का उपाय है या इससे कंपनियों में ज्यादा स्वायत्तता और दक्षता आएगी?

यह दोनों उद्देश्यों को पूरा करेगा। यह दोनों का संयोजन है। दोनों मकसद को अलग-अलग करना मुश्किल है।

इस साल अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौता संभव है। ऐसे में क्या आपने अनुमानित वृद्धि दर में इसके प्रभाव को शामिल किया है?

हमने ऐसा नहीं किया है। अगर ऐसा होता है तो इससे वृद्धि की संभावनाओं को खासा बढ़ावा मिलेगा। वित्त वर्ष 2027 के लिए हमने 6.8 से 7.2 फीसदी के दायरे में वृद्धि दर का अनुमान लगाया है जिसमें अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार करार का प्रभाव शामिल नहीं है।

समीक्षा में प्रौद्योगिकी और एआई-इन्फ्रा निवेश के चल रहे मौजूदा दौर को लेकर सावधानी बरतने की बात कही गई है। एआई जोखिम के संदर्भ में सरकार कैसे नीतिगत उपाय करे?

फिलहाल तो ये सब बातें काल्पनिक हैं। सबसे पहले, आपको यह आकलन करने की आवश्यकता है कि अगर दुनिया में इस तरह के विकास होते हैं तो भारत पर उसका क्या असर पड़ेगा और तरलता तथा निवेशकों की भावना पर क्या प्रभाव पड़ेगा। और सरकार को किस तरह के उपाय करने पड़ सकते हैं। मुझे लगता है कि इस स्तर पर इसके बारे में बात करना शायद जल्दबाजी होगी।

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क्या समीक्षा राजकोषीय कुप्रबंधन के मामले में राज्यों पर थोड़ा कठोर रहा है?

समस्या यह है कि आप मान कर चल रही हैं कि समीक्षा कठोर है। मैं आपकी बात से सहमत नहीं हूं। चैप्टर 16, के भाग 2 में हमने विनियमन खत्म करने की पहल पर राज्यों की बहुत प्रशंसा की है।

आपने राज्यों द्वारा नकद अंतरण और मुफ्त की चीजों के मुद्दे का उल्लेख किया है?

उस मानदंड पर कुछ राज्यों में सुधार की गुंजाइश है क्योंकि राज्य के उपाय अल्पावधि में खपत को बढ़ावा देते हैं मगर दीर्घावधि में रोजगार बाजार की स्थिति को बदल देते हैं। और यह बॉन्ड के लिए पूंजीगत व्यय में निवेश करने का भी मौका है, जिसका आय, रोजगार और क्रय शक्ति के मामले में कई गुना असर पड़ता है। और तीसरी बात, इसने केंद्र सरकार की कुल उधार लागत पर भी असर डाला है। तो उस लिहाज से राज्यों के राजकोषीय घाटे पर कुल असर के मामले में नॉमिनल सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में तेज वृद्धि को देखते हुए इसका कुल घाटा अनुपात पर कोई असर नहीं पड़ रहा है लेकिन यह खर्च की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है।

First Published - January 30, 2026 | 10:17 PM IST

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