भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) लागू होने के बाद 5 साल में देश से ईयू को निर्यात बढ़कर दोगुना हो सकता है और वस्तुओं का व्यापार 150 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने श्रेया नंदी के साथ बातचीत में कहा कि भारत अब पूरे आत्मविश्वास के साथ व्यापार समझौतों पर बातचीत कर रहा है, जिसमें संतुलन बनाते हुए महत्त्वाकांक्षी बाजार पहुंच के लक्ष्यों के साथ ही डेरी और कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा भी की जा रही है। संपादित अंश:
भारत-ईयू एफटीए के संबंध में आपने क्या व्यापक सिद्धांत और लक्ष्य निर्धारित किए हैं?
भारत आज विकसित देशों के साथ निष्पक्ष और उचित व्यापार के लिए आत्मविश्वास के साथ बात कर रहा है। व्यापार वार्ता में हमारे दो बुनियादी सिद्धांत हैं। पहला, हम मानते हैं कि यह दोनों पक्षों के लिए समान और लाभकारी होना चाहिए। लेकिन हमें उचित, न्यायसंगत और संतुलित समझौता करना होगा जहां हमारे हितधारकों को महत्त्वपूर्ण लाभ मिले, देश में नौकरियां पैदा हों।
एमएसएमई, किसानों, मछुआरों और पशुपालकों को नए अवसर मिल सकें। अधिक से अधिक लोगों को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा, नौकरियां, नवोन्मेषक और स्टार्टअप बनने का अवसर मिले। दूसरा पहलू यह सुनिश्चित करना है कि हम डेरी, पोल्ट्री, अनाज जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा करें। आक्रामक और रक्षात्मक हितों के साथ, हम बहुत मजबूत, दीर्घकालिक समझौते के लिए सक्रिय रूप से काम करते हैं।
यूरोपीय संघ को निर्यात या ईयू से निवेश के मामले में आपने किस तरह के लक्ष्य निर्धारित किए हैं?
कोई विशिष्ट समयसीमा और लक्ष्य निर्धारित करना जल्दबाजी होगी। इस समझौते के लागू होने के बाद अगले 5 वर्षों में यूरोपीय संघ को भारत से निर्यात दोगुना होने की संभावना है। वस्तुओं का निर्यात 150अरब डॉलर पहुंच सकता है। सेवाओं के निर्यात में भी इजाफा होगा क्योंकि समझौते में 144 उप-क्षेत्रों को खोले जाने से जबरदस्त क्षमता दिखती है।
समझौते पर कब तक हस्ताक्षर होने की उम्मीद है?
वर्ष 2026 में ही भारत-ईयू एफटीए पर हस्ताक्षर हो जाएगा।
‘सबसे बड़े व्यापार करार’ पर बातचीत के दौरान आई बाधाओं और कठिनाइयों के बारे में कुछ बता सकते हैं?
मुझे लगता है कि कांग्रेस और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने हमेशा बहुत ही नकारात्मक और कमजोर मानसिकता के साथ बातचीत की। वे आसियान देशों के साथ समझौते करने में सक्षम हुए जबकि वहां हम वास्तव में प्रतिस्पर्धी हैं और हमारे विनिर्माता अनुचित प्रतिस्पर्धा से पीड़ित हैं। उन्होंने चीन के साथ समझौता करने का प्रयास किया। उन्होंने क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसेप) के तहत बातचीत करके भारत को धोखा दिया, जो असल में चीन के साथ एक एफटीए के अलावा और कुछ नहीं था। कांग्रेस ने भारत को उसमें प्रवेश करने के लिए मजबूर किया। उन्होंने हितधारकों से कोई परामर्श नहीं किया था। उस समय, न्यूजीलैंड के साथ हमारा द्विपक्षीय व्यापार मुश्किल से 30 करोड़ डॉलर था।
अगर हम 2014 में सरकार में नहीं आते और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मजबूत नेतृत्व नहीं होता तो यह नहीं कह पाते कि हम आरसेप में शामिल नहीं होंगे। ऐसा नहीं होता तो आज हम एक ऐसे देश बन गए होते जो पूरी तरह से आयात पर निर्भर रहता। कुल मिलाकर यह एक शानदार यात्रा रही है। यह स्पष्ट रूप से कठिन रहा है। अगर एफटीए करना बहुत आसान होता तो पूरी दुनिया ने एफटीए को अंतिम रूप दे दिया होता। लेकिन यह प्रधानमंत्री मोदी का मार्गदर्शन, प्रोत्साहन, समर्थन और यह पता लगाने की उनकी क्षमता है कि राष्ट्र के लिए क्या अच्छा है।
इस बातचीत का सबसे कठिन हिस्सा क्या था?
सब कुछ कठिन था और कुछ भी कठिन नहीं था।
क्या हमारे संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा करना सबसे कठिन मुद्दा था?
ईमानदारी से कहूं तो नहीं। हम किसी भी एफटीए पर बातचीत शुरू करने से पहले इसे बुनियादी नियम के रूप में रखते हैं। दोनों तरफ स्पष्ट रेखाएं खींची गई थीं। अगर हम एक-दूसरे की संवेदनाओं का सम्मान करते हैं तो चर्चाएं बहुत बेहतर, तेज और आसान हो जाती हैं। यह इसलिए संभव हो पाया है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बारे में बहुत स्पष्ट हैं कि देश के लिए क्या अच्छा है, हमें अपने किसानों, अपने मछुआरों के लिए क्या करने की जरूरत है।
अमेरिका के अतिरिक्त शुल्क और 1 जनवरी से लागू हुए ईयू के सीबीएएम को लेकर स्टील और एल्युमीनियम के निर्यात के लिए क्या दृष्टिकोण है? क्या आपको लगता है कि भारत-ईयू एफटीए के तहत सीबीएएम के लिए लचीलापन और सुरक्षा उपाय तंत्र भारतीय निर्यातकों की रक्षा करने के लिए पर्याप्त है?
संयोग से, भारत इन उत्पादों का शुद्ध आयातक है। हम वास्तव में स्टील और एल्युमीनियम उत्पादों के बहुत बड़े निर्यातक नहीं हैं। हम बड़े निर्यातक बनना चाहेंगे, इसलिए हमने इस समझौते में कई पहलू शामिल किए हैं जो यह सुनिश्चित करेंगे कि हमारे पास सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र का दर्जा हो। हमारे पास तकनीकी समिति है जो भारत में भुगतान किए गए किसी भी कार्बन कर की समीक्षा और मूल्य निर्धारण करती रहेगी ताकि इसका लाभ हमारे उत्पादकों को दिया जा सके। इसके साथ ही सत्यापनकर्ता की मंजूरी देने का एक तंत्र भी होगा, जो वास्तविक कार्बन कंटेंट को सत्यापित करेंगे और परिचालन लागत को कम रखेंगे।
यूरोपीय संघ के प्रस्तावित वनों की कटाई के नियमन जैसी अन्य गैर-शुल्क बाधाओं के बारे क्या कहेंगे?
हमारे पास ईयू के साथ त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र है। हमारे पास भी गैर-शुल्क बाधाएं हैं। इसलिए दोनों पक्ष व्यापार को प्रतिबंधित करने के बजाय अधिक व्यापार को प्रोत्साहित करने के तरीके से इन बाधाओं का समाधान करेंगे।
क्या त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र पर्याप्त दमदार होगा?
इसमें तीन स्तर हैं। इसकी क्षमता को इससे समझ सकते हैं कि सीधे मंत्री स्तर तक मामला पहुंच सकता है।
भारत-ईयू एफटीए में विशेष रूप से ईयू वनों की कटाई नियमन (ईयूडीआर) के बारे में बात नहीं की गई है, जिस तरह से सीबीएएम के बारे में बात की गई थी?
कई नियमन हैं जिन्हें विभिन्न देशों ने अपनी गुणवत्ता और टिकाऊ मानकों के लिए तय किए हैं। भारत उसमें काफी अच्छा प्रदर्शन कर रहा है। जैसा कि आप जानते हैं हम जलवायु परिवर्तन के मामले में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले देशों में से एक हैं। वास्तव में, हम इन सभी नियमनों का पालन कर रहे हैं और यूरोपीय संघ के साथ व्यापार अधिशेष है। यूरोपीय संघ को पहले से ही 75 अरब डॉलर की वस्तुओं, 46 अरब डॉलर की सेवाओं का निर्यात किया जा रहा है।
भारत-यूरोपीय संघ एफटीए में निर्यात को बढ़ावा देने और नौकरियां पैदा करने की क्षमता है। मगर इसे जमीनी स्तर पर कारगर बनाने के लिए आप क्या करेंगे?
यह एक सामूहिक प्रयास है। उदाहरण के लिए, अगर किसी कार का निर्यात होगा तो उससे एमएसएमई को भी फायदा होगा। पिछले साल हमने कारों के निर्यात में काफी अच्छा प्रदर्शन किया। उसका फायदा आखिरकार किसे होता है? एमएसएमई को ही होता है। निर्यात बढ़ने पर सभी को फायदा होता है। एमएसएमई हमेशा सबसे बड़े लाभार्थी होंगे।
सेवा उद्योग में यूरोपीय संघ ने 144 उप-क्षेत्रों को खोला है और एक मोबिलिटी करार भी है। इस पर आप क्या कहेंगे?
उनकी सेवाओं का आयात 3 लाख करोड़ डॉलर है। सेवाओं का हमारा निर्यात केवल 46 अरब डॉलर है। इसी से आप विशाल क्षमता का अंदाजा लगा सकते हैं। हमारे पास व्यापक प्रतिभा और कौशल के साथ युवाओं की विशाल आबादी है जबकि उनके पास बूढ़ी होती आबादी है जिसे योग्य लोगों की जरूरत है।
यूरोपीय संघ की कंपनियों द्वारा भारत को अपने बाजार की सेवा के लिए एक केंद्र के रूप में उपयोग किए जाने की संभावना के बारे में आप क्या कहेंगे?
बहुत बड़ी संभावना है। वास्तव में वे कहते हैं जब उन्होंने भारत में किसी उत्पाद का परीक्षण कर लिया है तो उच्च श्रम लागत पर उत्पादन करना और उसे भारत भेजना समझ में नहीं आता है। भारतीय पसंद एवं आवश्यकताओं के अनुसार ढलना, भारत में विनिर्माण करना, और भारत, एशिया, अफ्रीका एवं लैटिन अमेरिका जैसे वैश्विक बाजारों पर कब्जा करना समझ में आता है।
टैरिफ को भू-राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे निपटने के लिए भारत की क्या रणनीति है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमृत काल में 2047 तक भारत को एक विकसित एवं समृद्ध राष्ट्र बनाने का आह्वान किया है जो अब 140 करोड़ भारतीयों का संकल्प बन चुका है। पिछले पांच वर्षों से हम इसी राह पर अग्रसर हैं। यह एक सफर है जिसकी शुरुआत हमने 2021 में की थी और जिसमें हमने 37 देशों को कवर करते हुए 8 मुक्त व्यापार समझौते पहले ही कर लिए हैं और उनमें से हरेक विकसित देश है।
भारतीय उद्योग पहले के एफटीए का पूरा लाभ नहीं उठा पा रहा है। ऐसे में उद्योग जगत को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
मैं सभी व्यवसायियों, एमएसएमई, स्टार्टअप और उद्यमियों से कारोबार को अंतरराष्ट्रीय बनाने पर ध्यान देने की अपील करूंगा। सरकार के स्तर पर हम लोगों को देश के बाहर तलाशने के लिए प्रोत्साहित करेंगे और इसके लिए कार्यशालाओं का आयोजन किया जाएगा।
हाल में हमने 8 एफटीए पर हस्ताक्षर किए हैं और कुल मिलाकर 22 एफटीए हो चुके हैं। हमारा करीब आधा निर्यात एफटीए के जरिये होता है। ऐसे में क्या आपको लगता है कि किसी संस्थागत सुधार की जरूरत है?
वाणिज्य मंत्रालय इससे भलीभांति अवगत है। हम एक व्यापक आउटरीच कार्यक्रम चलाने जा रहे हैं ताकि इन एफटीए से भारतीय उद्योग को होने वाले फायदों के बारे में बताया जा सके, तेजी से बढ़ने में मदद मिल सके और नई नौकरियां पैदा की जा सकें।
क्या आपको लगता है कि टैरिफ को कम करने के लिए व्यापार नीति की समीक्षा करने की जरूरत है?
हम अभी तक उस स्तर पर नहीं पहुंचे हैं। हम विनिर्माताओं को टैरिफ में कुछ राहत देना चाहेंगे। ऐसा करना खास तौर पर उन विनिर्माताओं को देखते हुए जरूरी है जो उचित मूल्य निर्धारण नहीं करते हैं या बेहद आक्रामक कीमतों पर डंपिंग की कोशिश करते हैं। मुझे लगता है कि हम सही राह पर अग्रसर हैं।
क्या सीपीटीपीपी जैसे बड़े क्षेत्रीय व्यापार समझौते में शामिल होने की कोई योजना है?
देखते हैं। हमने अभी-अभी यूरोपीय संघ के साथ एक बेहद सफल समझौते को पूरा किया है। आगे अन्य विकल्पों पर भी गौर करेंगे।
यूरोपीय संघ के साथ एफटीए एक व्यापक समझौता है। क्या हम अमेरिका को भी उस तरह की बाजार पहुंच देने के लिए तैयार हैं?
हर समझौते की अपनी खासियत होती है। देखते हैं कि अमेरिका के साथ क्या तय होता है।
भारत कहता रहा है कि अमेरिका के साथ बातचीत के अगले दौर की जरूरत नहीं है। ऐसे में समझौते को क्या रोक रहा है?
मुझे नहीं लगता कि हमने मीडिया के जरिये कभी व्यापार समझौतों पर बात की है।
क्या आपकी कोई आगामी यात्रा या आगे की बातचीत की योजना है?
अभी हमारा बजट सत्र अभी चल रहा है।
इस वित्त वर्ष में वस्तुओं का निर्यात अब तक अच्छा रहा है, लेकिन निर्यातकों का कहना है कि 50 फीसदी अमेरिकी टैरिफ के साथ इसे बनाए रखना बहुत मुश्किल होगा। इस पर आप क्या कहेंगे?
मुझे नहीं पता कि आपको ऐसा कौन कह रहा है। आंकड़े खुद बोलते हैं। मुझे लगता है कि हमारे निर्यातकों ने शानदार काम किया है। उनमें से बहुत से लोगों ने बाजारों में विविधता लाई है। भविष्य में उनके पास अधिक बाजार होंगे। कुछ क्षेत्रों में थोड़ा दबाव दिख सकता है, लेकिन हमारे लोग परिस्थितियों के अनुकूल ढलने में माहिर हैं।