फोन बजता है और सामने से आवाज आती है कि “आपकी एक पुरानी इंश्योरेंस पॉलिसी है, जो अब बड़ी रकम बन चुकी है।” सुनते ही दिल खुश हो जाता है, है न? लेकिन यहीं से खेल शुरू होता है। ये एक तेजी से फैल रहा स्कैम है, जिसमें लोग फोन पर कहते हैं कि आपकी कोई पुरानी इंश्योरेंस पॉलिसी, जिसे आप भूल गए थे, अब काफी बड़ी रकम में बदल गई है। बस एक ‘छोटी-सी प्रक्रिया’ पूरी करनी है, और पैसा आपके हाथ में आ जाएगा।
बता दें कि कोई भी कंपनी या सरकारी संस्था खुद से फोन करके अनक्लेम्ड इंश्योरेंस का पैसा देने की बात नहीं करती। बीमा लोकपाल (Insurance Ombudsman) का काम सिर्फ बीमाकर्ता और ग्राहक के बीच झगड़े सुलझाना है, वो भी तब जब ग्राहक खुद उनसे संपर्क करे। बीमा लोकपाल पुरानी पॉलिसी ट्रैक नहीं करता, न ही पेआउट कैलकुलेट करता है, और न ही अनसॉलिसिटेड फोन कॉल पर रिफंड का वादा करता है।
कोई भी सरकारी या बीमा से जुड़ी ऑफिस वाली कॉल, जिसमें अनक्लेम्ड पैसा लौटाने की बात हो, सीधे-सीधे फ्रॉड है।
ठग बहुत अच्छी तैयारी करके आते हैं। वे अक्सर जानते हैं:
ये जानकारी पुराने डेटाबेस या डेटा लीक से मिल जाती है, जिससे बात बहुत असली लगती है। कॉल करने वाले आत्मविश्वास से बोलते हैं और ऑफिशियल जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं, ताकि भरोसा बन जाए।
साथ ही ये ठग एक आम तरीके का इस्तेमाल करते हैं जो है ‘जल्दबाजी’। वे कहते हैं कि रिफंड की समय सीमा खत्म हो रही है या कुछ दिनों में एक्शन लेना होगा। मकसद ये है कि आप खुद जाकर चेक न कर पाएं। जल्दबाजी करवाना कोई संयोग नहीं, बल्कि बड़ा खतरे का संकेत है।
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कोई वैध इंश्योरेंस प्रक्रिया ऐसी नहीं है जिसमें पुरानी पॉलिसी का पैसा निकालने के लिए नई पॉलिसी खरीदनी पड़े।
अगर कोई नई पॉलिसी खरीदने को कहे, ‘प्रोसेसिंग फीस’ मांगे या पैसे ट्रांसफर करने को बोले ताकि रिफंड मिले तो समझ लीजिए, ये 100% ठगी है। पैसे देने के बाद वो गायब हो जाते हैं और वादा किया पैसा कभी नहीं आता।
सचाई इन कॉलों जितनी ड्रामेटिक नहीं है। ट्रेडिशनल पॉलिसी जैसे एंडोमेंट या मनी-बैक प्लान अगर जल्दी लैप्स हो जाएं और सरेंडर वैल्यू न बनी हो, तो प्रीमियम जब्त हो जाते हैं और रिफंड कुछ नहीं मिलता।
यूनिट-लिंक्ड प्लान में लैप्स होने पर फंड वैल्यू खत्म नहीं होती। वो डिसकंटिन्यूएशन फंड में चली जाती है और 5 साल बाद निकाली जा सकती है, कुछ चार्ज कटने के बाद। किसी भी केस में छोटा प्रीमियम अचानक बड़ी कमाई में नहीं बदलता।
अगर आपको पुरानी पॉलिसी के बारे में शक है, तो खुद कंपनी से संपर्क करें। कंपनी की ऑफिशियल वेबसाइट से नंबर या ईमेल से ही संपर्क करें। पॉलिसी का स्टेटस पूछें और देखें कि कोई अमाउंट मिल सकता है या नहीं।अनसॉलिसिटेड कॉल पर ध्यान न दें। कभी डॉक्यूमेंट, OTP या बैंक डिटेल्स शेयर न करें। और बातों-बातों में पैसे देने का फैसला कभी न लें।