सर्वोच्च न्यायालय ने मुफ्त योजनाओं के बढ़ते चलन पर पिछले हफ्ते नाराजगी जताई। अदालत की चिंता जायज है और इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों की सामूहिक प्रतिक्रिया जरूरी है। तमिलनाडु विद्युत वितरण निगम से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि अंधाधुंध मुफ्त योजनाओं के जरिये वितरण देश की आर्थिक नींव को कमजोर कर सकता है।
यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि कई प्रदेश राजस्व घाटे का सामना कर रहे हैं, जिसका मतलब है कि वे सब्सिडी देने के लिए कर्ज ले रहे हैं या किसी न किसी योजना के तहत नकद राशि बांट रहे हैं। अदालत के पीठ ने यह भी कहा कि ऐसी योजनाओं की घोषणा अक्सर चुनाव से पहले की जाती है। गौरतलब है कि अदालत ने माना कि राज्य का उन लोगों की मदद करने का दायित्व है जिन्हें शिक्षा और आवश्यक जन उपयोगी सेवाओं तक पहुंच नहीं है, लेकिन यह सहायता लक्षित होनी चाहिए।
सोलहवें वित्त आयोग ने भी सार्वजनिक वित्त पर इसके प्रभावों को रेखांकित करते हुए इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की है। वित्त आयोग द्वारा 21 राज्यों के विश्लेषण से पता चला कि 2025-26 में कुल सब्सिडी और हस्तांतरण के लिए 9.73 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा गया था, जबकि 2018-19 में यह महज 3.86 लाख करोड़ रुपये था। संयुक्त राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के प्रतिशत के रूप में, सब्सिडी पर व्यय 2018-19 के 2.2 फीसदी से बढ़कर 2023-24 में 2.7 फीसदी हो गया।
चालू वर्ष में नकद हस्तांतरण के लिए लगभग 2 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। अब राज्यों की सब्सिडी और हस्तांतरण योजनाओं में इसका हिस्सा 20 फीसदी है। सबसे बड़ा हिस्सा बिजली सब्सिडी का है, जो 27 फीसदी है। वर्ष 2023-24 के लिए कुल बिजली सब्सिडी बिल 2.60 लाख करोड़ रुपये था। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि बिल में राज्यों द्वारा प्रदान की गई वास्तविक सब्सिडी का स्तर कम करके दर्शाया गया है।
इसका कुछ हिस्सा राज्य बिजली वितरण कंपनियों के बही-खातों में दर्ज है, जो उनके संचित घाटे और ऋण में परिलक्षित होता है। राज्य सरकारों के अलावा, केंद्र सरकार भी विभिन्न प्रकार की सब्सिडी प्रदान करती है। महामारी के दौरान आवंटन में वृद्धि हुई, लेकिन बाद के वर्षों में इसमें कमी आई और चालू वर्ष में यह सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.76 फीसदी है। सब्सिडी आवंटन का अधिकांश हिस्सा खाद्य पदार्थों और उर्वरक के लिए जाता है।
वित्त आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि यह चिंताजनक है कि एक बार लागू होने के बाद सब्सिडी या नकद हस्तांतरण योजना स्थायी रूप से प्रभावी रहती है। चूंकि सरकारी व्यय का एक बड़ा हिस्सा सब्सिडी में जाता है, खासकर ऐसे समय में जब सार्वजनिक ऋण सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 80 फीसदी है, इस विषय पर गंभीर राष्ट्रीय बहस की आवश्यकता है।
प्रतिस्पर्धी राजनीतिक माहौल में, प्रत्याशियों का अक्सर सब्सिडी और नकद हस्तांतरण की राशि बढ़ाने पर जोर रहता है। इसलिए, कठोर राजकोषीय नियम बनाना आवश्यक है और सरकारी वित्त को मजबूत स्तर पर बनाए रखने के लिए तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है।
यहां कई मुद्दे हैं। पहला, जरूरी और गैर-जरूरी सब्सिडी को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने की आवश्यकता है। दूसरा, राज्यों द्वारा सब्सिडी और नकद हस्तांतरण पर खर्च की जाने वाली राशि पर स्पष्ट सीमा तय की जानी चाहिए, विशेष रूप से उन राज्यों के लिए जो राजस्व घाटे में चल रहे हैं और जिन पर भारी कर्ज है।
तीसरा, भारत को इस बात पर आम सहमति की आवश्यकता है कि सरकारी खर्च का कितना हिस्सा सब्सिडी और नकद हस्तांतरण में जाना चाहिए। यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सब्सिडी पर अधिक सरकारी खर्च राजकोषीय क्षमता को सीमित करता है, और अधिक उधार लेने की आवश्यकता निजी निवेश को कम कर देती है। सब्सिडी पर लगातार अधिक खर्च का सीधा असर दीर्घकालिक विकास संभावनाओं पर पड़ेगा।