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भू-राजनीतिक तनाव में क्यों उछल जाते हैं कच्चे तेल के दाम? 50 साल का इतिहास क्या कहता है

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ईरान और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बढ़ते तनाव के बीच तेल बाजार में जोखिम प्रीमियम जुड़ने की आशंका, लेकिन सप्लाई हालात फिलहाल स्थिर

Last Updated- February 27, 2026 | 2:23 PM IST
Crude Oil Prices

Crude Oil Price: पिछले 50 सालों में जब भी दुनिया में बड़ा युद्ध या भू-राजनीतिक संकट हुआ है, कच्चे तेल की कीमतें 25 प्रतिशत से लेकर 300 प्रतिशत तक उछली हैं। अक्सर ऐसा हुआ कि असली सप्लाई में कमी थोड़े समय के लिए थी, लेकिन बाजार ने पहले ही डर के कारण कीमतें तेज कर दीं। बाद में जब व्यापार के रास्ते बदले और सप्लाई सामान्य हुई, तो दाम भी धीरे-धीरे नीचे आ गए। विशेषज्ञ कहते हैं कि असली चुनौती यह नहीं है कि दाम कितने बढ़ेंगे, बल्कि यह है कि यह बढ़ोतरी कितने समय तक टिकेगी।

रूस-यूक्रेन युद्ध से क्या सबक मिला?

2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, तब कच्चा तेल 80 डॉलर से बढ़कर 120 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चला गया। बाजार को लगा था कि लंबे समय तक तेल 100 डॉलर से ऊपर रहेगा। लेकिन बाद में रूसी तेल दूसरे देशों जैसे भारत को बेचा जाने लगा। सप्लाई के नए रास्ते बने और 6 महीने के भीतर कीमतें सामान्य स्तर के करीब लौट आईं। यानी युद्ध जारी रहने के बावजूद तेल के दाम स्थायी रूप से बहुत ऊंचे नहीं रहे।

ईरान की भूमिका क्यों अहम?

इक्विरिस सिक्योरिटीज की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान आज वैश्विक तेल उत्पादन का करीब 3 प्रतिशत हिस्सा देता है। यह हिस्सा पहले से कम है। लेकिन असली ताकत उसकी भौगोलिक स्थिति में है। ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास स्थित है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और बड़ी मात्रा में गैस की सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है। अगर यहां रुकावट आती है, तो सऊदी अरब, इराक, कुवैत और यूएई जैसे देशों की सप्लाई भी प्रभावित हो सकती है। हाल में पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बीच कच्चे तेल की कीमतों में करीब 10 प्रतिशत की तेजी आई है। बाजार को डर है कि अगर हालात बिगड़े, तो सप्लाई प्रभावित हो सकती है।

यह भी पढ़ें | अमेरिका-ईरान तनाव से तेल के 110 डॉलर तक उछलने की आशंका, एनालिस्ट ने बताई पूरी बात

Crude Oil Price: इतिहास क्या कहता है?

1970 का दशक:

अरब देशों ने तेल निर्यात पर रोक लगाई, तो कीमतें 3 डॉलर से बढ़कर 12 डॉलर तक पहुंच गईं। बाद में दूसरे देशों ने सप्लाई बढ़ाई, लेकिन संतुलन बनने में 2-3 साल लगे।

1990 – इराक-कुवैत युद्ध:

तेल 15 डॉलर से बढ़कर 40 डॉलर तक गया। लेकिन सऊदी अरब ने उत्पादन बढ़ाया और कीमतें फिर नीचे आ गईं।

2003 – दूसरा इराक युद्ध:

कीमतें कुछ महीनों में 40 प्रतिशत बढ़ीं, लेकिन असली सप्लाई में कमी कम थी, इसलिए दाम फिर गिर गए।

2022 – रूस-यूक्रेन युद्ध:

50 प्रतिशत की तेजी आई, लेकिन वैकल्पिक खरीदार मिलने के बाद दाम सामान्य हुए।

2025 – पश्चिम एशिया तनाव:

ईरान पर हमले की खबरों से कीमतें लगभग 15 प्रतिशत बढ़ीं, जबकि सप्लाई पर सीधा असर नहीं पड़ा था।

अगर ईरान की सप्लाई रुक जाए तो क्या होगा?

रिपोर्ट के मुताबिक, मान लें कि ईरान के 3.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन उत्पादन में रुकावट आती है। यह वैश्विक सप्लाई का लगभग 3 प्रतिशत है। अगर हर 1 प्रतिशत सप्लाई झटके पर कीमत 3 से 5 प्रतिशत बढ़ती है, तो तेल में 9 से 15 प्रतिशत तक तेजी आ सकती है। 70 डॉलर के आधार पर यह करीब 6 से 11 डॉलर की बढ़ोतरी है। यानी दाम 76 से 81 डॉलर तक जा सकते हैं। लेकिन बाजार सिर्फ गणित से नहीं चलता। अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खतरा हुआ, तो कीमतों में 20 से 40 डॉलर प्रति बैरल तक अतिरिक्त ‘जोखिम प्रीमियम’ जुड़ सकता है। ऐसी स्थिति में तेल 95 से 110 डॉलर या उससे ऊपर भी जा सकता है।

फिलहाल हालात क्या कहते हैं?

रिपोर्ट कहती है, अभी ओपेक प्लस और दूसरे देशों का उत्पादन बढ़ रहा है। भंडार पर्याप्त हैं और सप्लाई का अनुमान स्थिर है। इसलिए सामान्य परिस्थितियों में ब्रेंट कच्चा तेल 60 से 70 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में रह सकता है। लेकिन अगर भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, खासकर होर्मुज जैसे अहम रास्तों पर असर पड़ता है, तो कीमतें अचानक तेज हो सकती हैं। तेल बाजार का इतिहास यही बताता है – पहले डर कीमतें बढ़ाता है, फिर समय के साथ हालात उन्हें संतुलित करते हैं।

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First Published - February 27, 2026 | 2:12 PM IST

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